रायता पुराण
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
पुराणकथाओं में यदि कभी भारतीय भोजन-संस्कृति का आख्यान रचा गया होता, तो निःसंदेह उसमें रायते को कोई साधारण स्थान नहीं मिलता। यह दधि-जन्मा व्यंजन केवल जिह्वा की तृप्ति का साधन नहीं, भारतीय पंगत का अद्वितीय अलंकार रहा है। मुझे तो विश्वास है कि इसकी उत्पत्ति भी कोई सामान्य पाक-दुर्घटना नहीं रही होगी। कथा कुछ ऐसी रही होगी कि जब सागर-मंथन के उपरांत धन्वन्तरि अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए और देवताओं को अमृत पिलाने में व्यस्त थे, तभी कलश से अमृत की कुछ बूँदें छलककर पृथ्वी पर आ गिरीं। वही अमृतांश धरती पर दधि के रूप में अवतरित हुआ, ताकि मृत्युलोक के असंख्य प्राणियों के कंठ को शीतलता प्राप्त हो सके। फिर किसी पाकशास्त्री ऋषि ने उसमें लवण, हरित-फल, कंद और शाक मिला दिए और इस प्रकार रायते का आदि-रूप प्रकट हुआ। तभी से वह शीतलता का दूत और भोजन से प्रज्वलित जठराग्नि का संहारक माना जाने लगा।
रायते की विविधता भी किसी कल्पतरु की शाखाओं से कम नहीं। कुम्हड़े का रायता पीताभ, स्निग्ध और साधु-स्वभावी है—न किसी से झगड़ा, न स्वाद में कोई उग्रता। लौकी का रायता ग्राम्य गृहिणियों का पुराना विश्वस्त सहयोगी है—सहज उपलब्ध, तृप्तिकारक और बिना किसी दिखावे के अपना कर्तव्य निभाने वाला। फल-रायता आधुनिक भोगियों के भोजन में विलासी अलंकरण की तरह आया, जिसमें सेव, द्राक्ष और अनार के दाने ऐसे चमकते हैं मानो दही में जवाहरात जड़ दिए गए हों। पुदीना-रायता ग्रीष्म ऋतु का वरदान है—शीतल, प्राणवर्धक और तपती देह को सांत्वना देने वाला। पर इन सबमें बूंदी-रायते का महत्व कुछ और ही है। वह बरातों और लंगरों का संकटमोचक है। जहाँ भोजनार्थियों की संख्या अनुमान से अधिक निकल आए, वहाँ बूंदी-रायता मेजबान की पतली हालत देखकर स्वयं भी पतला हो जाता है। जैसे दाल में पानी का अनुपात बढ़ाकर खाद्य-सामग्री की आपूर्ति बनाए रखी जाती है, वैसे ही बूंदी-रायता भी अपने मूल स्वरूप का त्याग कर जलप्रधान अवतार धारण कर भूख से व्याकुल बारातियों और श्रद्धालुओं की क्षुधा-पूर्ति में लग जाता है। त्याग की ऐसी भावना अन्य व्यंजनों में दुर्लभ है।
रायते का वास्तविक गौरव उस युग में था जब विवाह में बुफ़े नहीं, पंगत बैठती थी। पत्तलें बिछती थीं और राजा हो या रंक, सेठ हो या उसका मुनीम, सब एक ही धरातल पर पालथी मारकर भोजन करते थे। सामाजिक समता पर भाषण बाद में आए, पंगत उसे सदियों पहले व्यवहार में उतार चुकी थी। सामने गरमागरम पूड़ियाँ और साथ में कद्दू अथवा रमकुल्या की ऐसी मसालेदार सब्ज़ी कि यहाँ ‘मसालेदार’ का सीधा अर्थ लाल मिर्च समझा जाए। उसके दो ग्रास जिह्वा पर पड़ते ही मुखाग्नि प्रज्वलित हो जाती और तभी रायते की शीतल बौछार अग्निशमन-दल की तरह पहुँचती। जिह्वा पर लगी ज्वाला शांत होती और मनुष्य पुनः अगली पूड़ी का सामना करने योग्य बन जाता।
उस समय रायता खाने की भी अपनी मर्यादा थी। चमचे से रायता खाना लगभग उसका अपमान माना जाता था। दोना दोनों हाथों में ग्रहण कर सीधे होंठों से लगाकर कंठ में उतारना ही उसे भावपूर्ण सम्मान देने की विधि थी। रायता पीते समय आदमी और दोने के बीच किसी तीसरे उपकरण का प्रवेश स्वीकार्य नहीं था। पंगत में बैठे व्यक्ति की दृष्टि भोजन पर कम और रायता परोसने वाले पर अधिक रहती थी। वह दूर से आता दिखाई देता तो आँखें उसी का अनुसरण करतीं। हवा में उड़ते दोने को रायते से और खाली गिलास को पानी से भरना उतना ही आवश्यक था, जितना सरकारी कार्यालय में उड़ती हुई फाइल पर सुविधा-शुल्क का पेपरवेट रख देना। उसके बाद फाइल भी स्थिर और व्यवस्था भी सुचारु!
पंगत के रायता-विज्ञान के कुछ अलिखित नियम थे। रायता परोसने वाला निकट आता दिखाई दे तो पहले ही दोना खाली कर देना चाहिए, अन्यथा भरे हुए दोने को देखकर वह आगे निकल सकता था और ऐसी प्रशासनिक भूल का सुधार अगली परिक्रमा तक संभव नहीं था। दूरदर्शी भोजनार्थी एक अतिरिक्त दोना भी लगवा लेते थे—आज की भाषा में इसे बफर स्टॉक कह सकते हैं—ताकि आपूर्ति में व्यवधान आने पर आत्मनिर्भरता बनी रहे। सामाजिकता का एक और श्रेष्ठ उदाहरण पड़ोसी के खाली दोने से मिलता था। जैसे ही उसका दोना रिक्त दिखाई देता, सज्जन व्यक्ति तत्काल परोसने वाले को पुकारता—“भाई, इन्हें भी थोड़ा रायता देना!” यह परोपकार इतना निष्काम होता कि उसी समय अपना दोना भी आगे बढ़ा दिया जाता—“और हाँ, इधर भी थोड़ा डाल देना।” इस प्रकार परहित और स्वहित का ऐसा सुंदर समन्वय पंगत के अतिरिक्त अन्यत्र दुर्लभ था।
रायते के दो-चार दोने मुख्य भोजन से पहले पी लेना उस समय का स्वदेशी एपेटाइज़र था—क्षुधावर्धक। और भरपेट भोजन के पश्चात दो-चार दोने अतिरिक्त भकोस लेना पाचन की शत-प्रतिशत गारंटी माना जाता था। अर्थात् रायता भोजन के पूर्व भूख जगाता था और भोजन के बाद उसे पचाता था; बीच में भोजन के साथ चलता ही था। उसकी तासीर शीतल मानी जाती है और शेष भोजन की प्रकृति प्रायः उष्ण, इसलिए ऋतु कोई भी हो और भोजन कोई भी, रायता अपना संवैधानिक स्थान सुरक्षित रखता था।
फिर कालचक्र घूमा। पंगत की सभ्यता पर बुफ़े-संस्कृति का आक्रमण हुआ और रायते के गौरव का ह्रास प्रारंभ हो गया। जिस व्यंजन को कभी पत्तल के मध्य प्रतिष्ठित आसन प्राप्त था और जो भोजन के मुख्य क्रम का सम्मानित सदस्य था, वही अब एक्सेसरी बनकर रह गया। बुफ़े की व्यूह-रचना में पनीर, दाल, पुलाव, मंचूरियन, नूडल्स और न जाने कितने पकवान अपने-अपने विशाल पात्रों में छाती फुलाए खड़े रहते हैं, और बेचारा रायता किसी कोने में कटोरा पकड़े अपनी बारी की प्रतीक्षा करता रहता है। भोजनार्थी आते हैं, उसे देखते हैं और औपचारिकता निभाने के लिए एक-दो चम्मच लेकर आगे बढ़ जाते हैं। मानो रायता न हुआ, किसी समारोह में उपस्थित वह दूर का रिश्तेदार हो गया जिसे देखकर नमस्कार करना सामाजिक विवशता हो।
स्थिति तब और करुण हो जाती है जब बुफ़े की प्लेट में चावल का पहाड़ खड़ा करके उसके ढलान पर रायते की छोटी-सी प्याली रख दी जाती है। प्याली इस प्रकार झुकी रहती है कि लगता है अगले ही क्षण फिसलकर नीचे आएगी। उसे देखकर बचपन की फिसलपट्टी की स्मृतियाँ ताज़ा हो जाती हैं। अंतर केवल इतना है कि बचपन में हम फिसलते थे तो आनंद आता था, यहाँ रायता फिसले तो सामने वाले के वस्त्र संकट में पड़ जाते हैं। प्लेट के एकांत कोने में संकुचित, भयाकुल और सहमा हुआ रायता मानो मन ही मन प्रार्थना करता है—“हे भोक्तावर! मुझे इस विपन्न दशा से सुरक्षित निकालो। मैं यहाँ रहम की याचना कर रहा हूँ। किसी असावधान भोजनार्थी की कोहनी टकरा गई, मैं प्लेट से छलका और किसी के बहुमूल्य अंगवस्त्र पर जा गिरा तो अपकीर्ति नाहक मेरे ही सिर मढ़ी जाएगी। मेरा अपराध क्या है? मैं तो जन्म-जन्मांतर से शीतलता और तृप्ति का दूत हूँ, फिर किसी की कमीज़ पर छींट पड़ जाने की बदनामी भी मुझे ही क्यों मिले?”
लेकिन रायते की त्रासदी केवल इतनी नहीं कि पंगत से उसका पदावनत होकर बुफ़े के कोने तक पहुँचना हुआ। कालांतर में मनुष्य ने रायते का एक नया उपयोग खोज लिया—उसे खाने के बजाय फैलाना। इस कला के प्रारंभिक और सिद्धहस्त आचार्य प्रायः विवाहों के फूफा हुआ करते थे। पकौड़ों में नमक थोड़ा कम निकला, रायता फैल सकता था। स्वागत में दो मिनट का विलंब हो गया, रायता फैल सकता था। मंच पर सम्मान के लिए वरीयता-क्रम में उनका नाम अपेक्षा से बाद में पुकारा गया, तो फिर रायता केवल फैलता नहीं था, समारोह की सीमाएँ लाँघकर रिश्तेदारी तक पहुँच जाता था। भोजन वाला रायता जितना शीतल, सामाजिक रायता उतना ही उष्ण निकला।
धीरे-धीरे यह कला विवाह-मंडप से निकलकर लोकतंत्र के सभी स्तंभों तक पहुँच गई। राजनीति में अफ़वाह, आरोप और विवाद के रूप में रायता फैलने लगा। फिर तकनीक ने प्रगति की तो रायते ने भी डिजिटल रूप धारण कर लिया। जो कभी पत्तल से बाहर गिरने पर ही फैलता था, वह अब बिना किसी पात्र के व्हाट्सऐप ग्रुपों और सोशल मीडिया की दीवारों पर धड़ल्ले से फैलने लगा। पहले रायता फैलाने के लिए कम-से-कम दही, बूंदी और पानी की आवश्यकता होती थी; अब एक अधूरी सूचना, आधा स्क्रीनशॉट और दो विस्मयादिबोधक चिह्न पर्याप्त हैं। शेष कार्य समाज स्वयं कर देता है।
साहित्य भी इस सांस्कृतिक विकास से अछूता कहाँ रहने वाला था। वहाँ भी किसी को मक्खन लगाने और किसी का रायता फैलाने की अपनी समानांतर पाक-परंपरा विकसित हो गई। जिस पर कृपा करनी हो, उसे मक्खन लगाइए; जिससे हिसाब चुकाना हो, उसका रायता फैलाइए। इस प्रकार भारतीय पाकशास्त्र के दो निर्दोष दुग्ध-उत्पाद साहित्यिक राजनीति के महत्वपूर्ण उपकरण बन गए।
अब प्रश्न केवल इतना है कि युगों-युगों से शीतल, सात्त्विक और साइलेंट स्वभाव वाले इस बेचारे रायते को हमने इतना वायलेंट कैसे बना दिया? जिसका जन्म जिह्वा की ज्वाला शांत करने के लिए हुआ था, आज वही विवाद की ज्वाला भड़काने का मुहावरा बन गया। जो कभी पंगत में लोगों को एक साथ बैठाता था, आज उसका नाम लोगों को व्हाट्सऐप ग्रुपों में भिड़ाने के काम आ रहा है। जो कभी फैल जाए तो केवल पत्तल और कपड़े खराब होते थे, अब फैलता है तो संबंध, प्रतिष्ठा और कभी-कभी पूरी बहस खराब कर देता है।
बताइए, रायते की इस सनातनी शीतल विरासत के साथ इससे बड़ा खिलवाड़ और क्या होगा? बेचारा रायता आज भी कटोरे में उतना ही शांत बैठा है। बदला वह नहीं है—हमने बस उसे खाना कम और फैलाना अधिक सीख लिया है।

✍ लेखक, 📷 फ़ोटोग्राफ़र, 🩺 चिकित्सक
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