शिक्षकों की कुत्ता-गणना
उत्तर प्रदेश सरकार ने एक नया फ़रमान जारी किया l अब जनगणना के साथ-साथ सड़कों पर विचरते आवारा कुत्तों की गिनती भी होगी। दरअसल, सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल इंसान की ही नहीं, इंसानी शक्ल में घूम रहे तमाम प्राणियों की भी बराबर कद्र करती है। कुत्ता वैसे भी इंसान का सबसे क़रीबी साथी रहा है, इसलिए इन दोनों प्रजातियों में घालमेल होना लगभग नियति ही थी। गिनती यहाँ केवल आँकड़े सुधारने का औज़ार नहीं, बल्कि लोकतंत्र में गधे-घोड़े सबको बराबर खड़ा करने की प्रक्रिया है। इस ख़बर से सड़क पर धरना दे रहे सांड और सूअर भी सकते में हैं—कौन जाने, कल सरकार उनके भी काग़ज़ माँग ले।
इस महान राष्ट्रीय अभियान के लिए जिन पर भरोसा जताया गया है, वे हैं हमारे शिक्षक। वही शिक्षक, जो अब तक बच्चों को गिनती सिखाते थे, अब खुद गिनती में लगा दिए गए हैं। सूचना के अनुसार, शिक्षक अपने-अपने विकासखंड में घूम-घूमकर कुत्तों की पहचान करेंगे, उन्हें चिन्हित करेंगे—ख़ास तौर पर आवारा कुत्तों को। इस निर्णय ने दार्शनिक प्रवृत्ति के लोगों को सक्रिय कर दिया है। उनका मानना है कि इसके पीछे कोई गहरा समाजशास्त्रीय कारण ज़रूर होगा। संभव है कई कुत्ते आदमी बनकर घूम रहे हों और कई आदमी कुत्तों में तब्दील हो चुके हों। ऐसे में यह पूरी प्रक्रिया इंसानी जनगणना पर एक तरह की चुनावी सर्वेक्षण जैसी SIR-फिरी कार्रवाई भी कही जा सकती है।
जो भी हो, इसे उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानना चाहिए। कम से कम आवारा कुत्तों पर इतना भरोसा तो किया गया कि उनके लिए बाकायदा सरकारी प्रक्रिया तय की गई। वर्षों से जो कुत्ता-फ़ज़ीहत कोर्ट के फैसले से कुता-समाज झेल रहा था , उस पर यह फ़ैसला दिए गए घावों पर मरहम लगाने जैसा है ।
अब दृश्य की कल्पना कीजिए—शिक्षक हाथ में फ़ॉर्म लिए मोहल्लों में घूम रहे हैं। कुत्ते अपने कुत्तेपन को छुपाते, पूँछ दबाए ऐसे सहमे हुए हैं, जैसे कभी टीकाकरण अभियान के दिनों में बच्चे इन शिक्षकों को देखकर डर जाया करते थे। संभव है कि अब कुत्ते भी अपने काग़ज़ दुरुस्त कराने में जुट जाएँ। कौन जाने, कल उन्हें मतदान का अधिकार भी मिल जाए। परसों कुत्तों की जाति-जनगणना हो जाए—संभावनाएँ अनंत है । लोकतंत्र में बिना नाम के एक पत्ता भी नहीं हिलता, और सत्ता का सबसे प्रिय खेल नाम बदलना ही है। ऐसे में कुत्तों का नामकरण भी अनिवार्य होगा—बबलू, शेरू, टाइगर और विकास। कुत्ता-गनना का भी नाम तो रखना पड़ेगा l सरकार किस महान नेता के नाम पर रख रही है ,पता नहीं l
शिक्षकों को अब अ, आ, इ के साथ-साथ भौं-भौं व्याकरण में भी दक्ष होना पड़ेगा। संभव है कि कुत्तों के व्यवहार पर समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और राजनीति शास्त्र को जल्द ही एक्स्ट्रा करिकुलम में जोड़ दिया जाए। हर शिक्षक से अपेक्षा की जाएगी कि वह कुत्तोलॉजी का विशेषज्ञ हो—बी.एड. के साथ बी.डॉग की डिग्री भी अनिवार्य हो जाए, तो आश्चर्य नहीं।
वैसे यह प्रयोग नया नहीं है। कुछ समय पहले मध्य प्रदेश सरकार ने गधों की घटती संख्या पर चिंता जताई थी। गधों का लोकतंत्रीकरण हुआ, उन्हें सरकारी फ़ाइलों और आँकड़ों में दर्ज कर लोकतंत्रीय दर्जा दिया गया। अब वही मॉडल कुत्तों पर लागू किया जा रहा है। सवाल सिर्फ़ यह है कि कुत्ते इस निर्णय को कैसे ले रहे हैं? क्या यह उन पर थोपा गया आदेश है या वे इसका स्वागत करेंगे? किसी अति-उत्साही न्यूज़ चैनल वाला अगर उनके मुँह में माइक घुसा दे, तो शायद जवाब मिल जाए।
शिक्षक इस देश का भविष्य संवारते हैं, और देश अब अपना भविष्य कुत्तों की गणना में खोज रहा है। कुछ अनुभवी शिक्षक तो एक क़दम आगे बढ़कर कुत्तों को देखकर ही उनकी जाति, वर्ग और विचारधारा पहचानने लगे हैं l उनकी टेडी पूंछ ,मुंह के दांत और गुर्राहट से उनकी विचारधारा का आकलन करेंगे l
कल तक जो ‘आवारा’ थे, आज वे सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सर्वे-योग्य नागरिक बन गए हैं। आने वाले समय में उन्हें पहचान पत्र भी मिल जाए—डॉग आधार—तो कोई हैरानी नहीं। यह सब बच्चों के लिए भी एक मौन चेतावनी है। जब कोई शिक्षक कक्षा में कहेगा—
“देखो बच्चों, पढ़-लिखकर आगे बढ़ो, नहीं तो…”
इतने में बाहर से कुत्तों का झुंड गुज़र जाएगा।
शिक्षक ठहरकर बोलेगा—
“…नहीं तो सरकार तुम्हें भी गिनती में लगा देगी।”
कुल मिलाकर, यह निर्णय शिक्षा और श्वान-शास्त्र का अद्भुत संगम है। अब स्कूल केवल ज्ञान का मंदिर नहीं, नगर निगम की शाखा भी है। शिक्षक अब गुरु नहीं, एक मल्टीटास्किंग सरकारी प्राणी है—जो मिड-डे मील, जनगणना, चुनाव सर्वेक्षण, मतदान बूथ, टीकाकरण और योजनाओं को ढोते-ढोते अब कुत्तों की गिनती भी कर रहा है। इस फ़रमान ने कम से कम इतना तो जता दिया है कि सत्ता की नज़र में संख्याबल ही सर्वोपरि है—वह चाहे इंसान की हो या कुत्ते की।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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