अयोध्या और लंका के बीच मनुष्य का धर्म

अयोध्या और लंका के बीच मनुष्य का धर्म

हर किसी के लिए अयोध्या छोड़ना आसान नहीं होता। यह केवल एक नगर का प्रश्न नहीं है, यह हमारी identity का मामला है—हमारी पहचान, हमारा सम्मान, हमारा आराम, हमारा वैभव। वहाँ स्मृतियाँ हैं, संबंध हैं, सुरक्षा का आश्वासन है। अयोध्या त्यागना केवल एक भौगोलिक स्थान परिवर्तन नहीं, बंधुवर, यह आत्मा का विस्थापन है।

पर ज़रा ठहरकर सोचिए—लंका छोड़ना भी कहाँ आसान होता है? इसे भी समझना होगा। वह स्वर्ण से बनी नगरी थी—पूरी की पूरी स्वर्णमयी। वह विजय का प्रतीक थी, उपलब्धि का उत्सव थी। वहाँ सत्ता थी, वैभव था, और विजेता के रूप में स्थापित हो जाने का अवसर था।

सिर्फ सुख का त्याग ही त्याग नहीं होता। त्याग अपनी विजय का भी होता है। जो आपने जीता, जो आपने पाया—उसका त्याग भी कोई छोटा-मोटा त्याग नहीं होता।

Rama को हम मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं। पर “मर्यादा” शब्द क्या इतना ही सरल है? नहीं। उसे जीना अत्यंत कठिन है। शायद यही राम को राम बनाता है—पुरुषों में उत्तम।

जब पिता की आज्ञा से वनवास का समय आया, तब अयोध्या से मोह करने का पूरा अवसर था। राजसिंहासन सामने था, प्रजा का प्रेम सामने था। नई-नई विवाहिता सीता साथ थीं—सुकुमारी, जिसने कभी कठोर धरती पर नंगे पैर चलना न जाना था। ऐसी सीता को वन के कष्टों में साथ ले जाना—यह केवल निर्णय नहीं, आत्मसंयम की पराकाष्ठा थी।

पर यही तो दायित्व था—पिता के वचनों को निभाने का दायित्व। दायित्व ने उन्हें एक पल भी सोचने नहीं दिया।

वनवास को केवल चौदह वर्षों का वन-प्रवास मत मानिए। वह भीतर के मोह का विसर्जन था। जिसने अयोध्या छोड़ दी, उसने सुविधा छोड़ दी। जिसने सुविधा छोड़ दी, उसने भय भी छोड़ दिया।

पर कथा यहीं समाप्त नहीं होती।

जब लंका पर विजय प्राप्त हुई, जब रावण का अंत हुआ, तब एक और परीक्षा सामने थी। विजेता के रूप में वे लंका पर अधिकार कर सकते थे। स्वर्ण-लंका का आकर्षण केवल धन का नहीं, गौरव का भी था। इतिहास विजेता को वहीं स्थापित करता है जहाँ वह जीतता है।

पर उन्होंने लंका भी नहीं रखी।

विजय के बाद वैभव का त्याग और भी कठिन है। हार में त्याग कभी-कभी विवशता होता है; पर जीत में त्याग केवल चरित्रवान ही कर सकता है। वही कर सकता है जिसने उपलब्धि से पहले ही अपने भीतर उपलब्धि का शिखर पा लिया हो।

मनुष्य के जीवन में भी ये दो अवस्थाएँ आती हैं—
एक, जब हमें अपनी “अयोध्या” छोड़नी पड़ती है—अपना सुरक्षित क्षेत्र, अपना आराम, अपनी प्रतिष्ठा।
दूसरी, जब हमें अपनी “लंका” छोड़नी पड़ती है—अपनी सफलता, अपनी उपलब्धि, अपना अहंकार।

अधिकांश लोग अयोध्या से चिपके रहते हैं।
जो उससे निकल भी आते हैं, वे लंका से चिपक जाते हैं।

पर असली धर्म इन दोनों के पार है। धर्म वह संतुलन है जहाँ व्यक्ति न सुविधा से बँधता है, न सफलता से।

जीवन में स्वर्ण और सिंहासन दोनों अस्थायी हैं। यदि हम उन्हें अपनी पहचान बना लें, तो वे हमें बाँध लेते हैं। और यदि हम उन्हें दायित्व या कर्तव्य मानकर भी उनमें ही उलझे रहें, तब भी वह बंधन ही है।

जब हमें कोई पद मिलता है, कोई सम्मान मिलता है—क्या हम उसे पकड़कर बैठ जाते हैं?
जब परिस्थितियाँ हमें त्याग की ओर ले जाती हैं—क्या हम प्रतिरोध करते हैं?

अयोध्या छोड़ना साहस है।
लंका छोड़ना विवेक है।

शायद रामत्व इसी में है। मैं यहाँ केवल राम या कृष्ण की बात नहीं कर रहा; मैं रामत्व की बात कर रहा हूँ—उस परम तत्व की, जो हम सबके भीतर मौन रूप से उपस्थित है, किंतु कहीं दबा हुआ, अनाभिव्यक्त।

जहाँ व्यक्ति अपने अधिकार से बड़ा अपने धर्म को मानता है।
जहाँ वह परिस्थितियों से संचालित नहीं होता, बल्कि अपने आंतरिक संकल्प से संचालित होता है।

अब पुनर्विचार कीजिए—बात बाहरी अयोध्या या लंका की कदापि नहीं है।
सच्चा प्रश्न यह है कि हमारे भीतर कौन-सी अयोध्या है जिससे हम चिपके हुए हैं?
और कौन-सी लंका है जिसे हम विजय के बाद भी छोड़ नहीं पा रहे?

जब हम इन दोनों को पहचान लेते हैं, तभी हम अपने भीतर के राम के निकट पहुँचते हैं।

क्योंकि राम बनना सत्ता प्राप्त करना नहीं,
सत्ता से मुक्त होना है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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