महिलाओं की टीवी बहस!
डा राम कुमार जोशी
एक प्रसिद्ध टीवी चैनल वाले ने निश्चय किया कि शहर की कुछ प्रभावी महिलाओं को स्टूडियो में बुलाकर उनसे किसी विशेष विषय पर बहस करवा दी जाय। वह विषय महिलाओं से ही संबंधित हो ताकि ऐसे विषयों पर वे अपनी राय को बेबाकी से रख सकें। विषय ज्वलंत व समसामयिक तो होना ही चाहिए। ज्वलंत यानि कि आग उगलने वाला। वैसे भी महिलाओं का आग से बड़ा निकट संबंध है। भले वो आग चूल्हे की हो या हृदय की। आग तो आग ही है। पकाना है या फिर भस्म करना ही जानती है।
पुरातन पंथी संपादक ने पचास महिलाओं को निमंत्रण दिया। पुराने अनुभव के साथ अंदाज था कि घर गृहस्थी में फंसीं महिलाएं इस प्रकार के नीरस कार्यक्रम में बमुश्किल ही आती है सो दस बारह भी आ जाय तो गनीमत समझों। गाने बजाने या डांस ठुमकों की बात अलग होती है।
समय बदलने के साथ संपादक जी का बुरा समय आ चुका था सो पचास की पचास के साथ उनकी सलाहकार सहेलियां भी आ टपकी जो फोटो खिंचवाने में बड़ी माहिर थी। स्टूडियो का सोफे वाला लाऊंज भर गया, एक्स्ट्रा कुर्सियां लगाई गयी पर कौन दासी जो साधारण प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे। जो आयी वो सभी अपने अपने क्षेत्र की रानी-महारानी थी। आज चैनल वाले स्टूडियो की इज्जत लुटने के कगार पर खड़ी थी।
उनमें से कई आपस में एक दूसरे को जानती थी पर नमस्ते की ‘पहल कौन करें” के चक्कर में अकड़ के साथ मौन साधे बैठी थी तो कुछ आधुनिकी का मुलम्मा ओढ़े कुछ अधिक ही शोर शराबा मचा रही थी।
आखिर मामले की गंभीरता को समझते हुए कुछ महिलाओं को संपादक ने अपने कक्ष के सोफों पर बिठाया तो शेष को मय अनुमति के डायरेक्टर साहब के कमरे के गद्देदार सोफों पर। तब कहीं जाकर सभी मैनेजमेंट के महानुभावों के हृदय में शान्ति ने प्रवेश किया। उनको डर था कि कहीं व्यावसायिकता के फेर में विरोधी चैनल वालों को कहीं ख़बर हो गई कि महिला मेहमानों के बिठाने की माकूल व्यवस्था ही नहीं हो पाई तो न्यूज़ की सूर्खियो के साथ बतंगड़ भी बन सकता है और थू थू अलग।
आखिर सलाहकार मंडली ने सलाह दी कि वर्ण माला क्रम से दस दस के ग्रुप में महिलाओं को आमंत्रित किया जावे और विषय विशेष पर बहस करवा, रिकार्ड कर ली जाय। फिर उस रिकार्ड को एडिट कर प्रसारित कर देंगे।
इस पर कुछ महिलाओं ने आपत्ति दर्ज कराई कि हम कुछ महिलाएं एक ही टैक्सी में साथ आईं हैं सो जायेगी भी साझे में। हम एक ही विषय की विशेषज्ञ है सो अलग ग्रुप में कैसे हो सकती है? आपका ये फार्मूला एक तरफ़ रखिये। जो पहले आई वह पहले और देर से आईं वो बाद में। इस पर संपादक जी ने नम्रता पूर्वक कहा कि हमने कोई हाजिरी रजिस्टर तो रखा नही था कि जिससे पहले- बाद आने का रिकॉर्ड ज्ञात हो। यह सुनते ही कई महिलाएं एक साथ चीख ही पड़ी – “इट इज योर हैडेक। माइंड योर जोब। हम तय करेंगी ग्रुप्स कैसे बनें। ये हमारा अधिकार है। वो जमाना गया जब मर्द औरतों को कहते थे – बैठ, तो बैठ जाती थी। अब तो लव मैरिज से आगे लिव इन और लिव आउट का जमाना हमने ही तो लाया है।” एक बड़ी बिंदी वाली महिला ने तो मेज पर मुक्का भी मारा था।
इतने में एक आधुनिक महिला ने अपनी आंखों के नीचे काले घेरे को छुपाने के लिए स्पेशल मेकअप की मांग कर दी। मेकअप की डिमांड सुनते ही सभी महिलाएं मेकअप रुम की ओर दौड़ पड़ी ताकि सुंदर दिखने में अपना नंबर पहले लग जाय। वर्णमाला क्रम तो एक तरफ रह गया और पांच सात भारी भरकम महिलाओं के मध्य कुर्सीयों की खींचतान प्रारंभ हो गयी।
इनमें एक महिला रस्साकसी की खिलाड़ी रह चुकी थी सो कुछ विशेष प्रकार खेंच तान से मेकअप टेबल तो डेमेज हुईं ही, साथ में आदमकद शीशा भी जमीन पर आगया। अन्य सामान बिखरा वो अलग। फर्श पर गिरी क्रीम – पाॅलिस की डिबियाओं को कुछ महिलाओं ने अपने स्तर पर उपयोग में ले, राष्ट्रीय हानि होने से बचा लिया। अन्यथा वह डस्टबिन की शोभा बनने लायक़ रहीं थी।
कुर्सी बनाने वाले कारीगर ने कुर्सियां कलाकारों की क्षमता को ध्यान रख बनाई थी कोई खेंचातानी का भाव तो उसके दिल चित्त में ही नहीं था। आज महिलाओं ने साबित कर दिया कि हम शक्ति रुपा है और भविष्य में भी रहेंगी सो कुर्सियों के हत्थे और पायें उनके हाथों में आगये। अब तो वे शास्त्र के साथ शस्त्र धारक हो गयी और पहले हम के चक्कर में सबको चकरी बना गयी।
एक महिला जो अर्ध शताब्दी की हो चुकी थी पर अबतक उनमें ज़वानी का जोश बरकरार था। मेकअप के चक्कर में दौड़ते हुए उनकी हाई हील्स सैंडिल ने धोखा दे दिया सो चिकने फर्श पर फिसल गई। चोट से चेहरे समेत शरीर हुए नीले दाग़, चंद्रमा के दाग़ जैसे कलंक सिद्ध हो रहे थे। कैमरे की जद से नीले दाग़ कैसे छुपेंगे यही प्लानिंग खायें जा रहीं थी। अब उनके हिस्से में केवल कोसना ही बचा था।
उधर कुछ दक्षिण पंथी महिलाओं ने आपसी सहमति से मिनी यूनियन बना डाली जो चैनल वालों के पूर्वाग्रहों के एकदम विपरीत थी। दक्षिण पंथियों के एकत्रित होते ही रियेक्सन स्वरूप कुछ मतवाली वामपंथी वामांगिया अपने मुख से भावों को उद्गारित करने लग गयी।
तीसरे पक्ष ने उकसाने के साथ मजा लेने केलिए हाय हाय व जिन्दाबाद के नारों का साथ ले लिया था।
अकस्मात् वाम पंथी व दक्षिण पंथी ज़ुबानी बहस करते हुए एक दूसरे के चोटी – जूडे़ं पर टूट पड़ी। जब जब भी जुबां से निकलने वाले शब्द कमजोर लगने लगते हैं तो हर महिला के हाथों की अंगुलियां व मुठ्ठियां स्वत: ही सक्रिय हो जाती है।
आज ऐसा ही हुआ । एक महिला के बालों के सपोर्ट में लगी नक़ली चोटी विरोधी पक्ष के हाथ में क्या आई कि ठहाके के साथ हंगामा होगया। जवाबी तौर पर आपस में कपड़े फाड़ने के प्रयास होने लगें। सौभाग्य वश सिक्योरिटी गार्ड तब तक सक्रिय हो चुकें थे। इस तरह से शारिरीक शक्ति प्रदर्शन का मौका हाथ से छीन लिया गया।
कुछ विदुषी महिलाओं ने महिलाओं की इज्जत की कद्र करते हुए एक दूसरे पर हाथ उठाने व कपड़ा खींचातानी पर वीटों कर दिया। आदेश की तुरंत पालना भी हुई।
आज की यही सबसे बड़ी प्रभावी उपलब्धि रहीं।
एक जनी तो कह रही थी – “जब पार्लियामेंट में सत्र हंगामेदार हो सकतें हैं तो यहां हम क्यों वंचित रहे। जब विचारों की अभिव्यक्ति में स्वतंत्रता है तो उसे जोर से व्यक्त क्यों नहीं कर सकतीं। हमारी आवाज ही हमारी शक्ति है।”
इधर संपादक जी समेत संपूर्ण मैनेजमेंट इन अप्रत्याशित हादसों से सकते में आ गया। आनन फानन में बचाव के रास्ते ढूंढने के प्रस्ताव पढ़ें गये। स्टूडियो में आपातकाल घोषित किया गया।
प्रोड्यूसर के इशारे पर जेनरेटर से बिजली की सप्लाई रोक दी गई और संपादक महोदय ने अत्यंत नम्रता पूर्वक मातृशक्ति को नमन करते हुए रिकार्डिंग प्रोग्राम को स्थगित करने की घोषणा की व क्षमा प्रदान हेतु प्रार्थना की जिसे संपूर्ण उपस्थित मातृ शक्ति ने स्वीकारोक्ति प्रदान की।
बिजली गुल के तुच्छ एवं सामान्य बहाने ने स्टूडियो की साख को बरकरार रखा।
कुछ महिलाओं द्वारा आने जाने का किराये की मांग करने पर उन्हें सहर्ष मुंह मांगी राशि भी दी गई। पूर्व में सिद्ध उदारमना स्त्रियां भी आज पीछे नहीं रही। महिलाओं द्वारा “लूट सकें तो लूट” नीति अपनाई गई।
अंत में मैनेजमेंट ने सीक्रेट बैठक करते हुए निर्णय लिया कि भविष्य के लिए दो से अधिक महिलाओं का एक साथ आमंत्रण निषेध है, इसका दृढ़ता से पालन किया जाय।
डा राम कुमार जोशी
ललित कुंज, जोशी प्रोल
Comments ( 1)
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डॉ मुकेश 'असीमित'
7 minutes agoयह रचना केवल एक टीवी बहस का हास्य चित्रण नहीं है, बल्कि हमारे समय की बहस-संस्कृति पर तीखा व्यंग्य भी है। विचारों की जगह व्यक्तित्व, तर्क की जगह तकरार और संवाद की जगह प्रदर्शन—यही प्रवृत्ति यहाँ विनोदी अतिशयोक्ति के माध्यम से उभरकर सामने आती है।
लेख यह संकेत करता है कि जब बहस “मंच” से अधिक “मंचन” बन जाती है, तब संवाद का सार कहीं पीछे छूट जाता है। हँसी के आवरण में छिपी यह टिप्पणी समकालीन मीडिया संस्कृति और सामाजिक अहंकार पर सोचने को विवश करती है।