टाइम ट्रैवल: ब्रह्मांड की पुरानी फाइल में नई नोटशीट
टाइम ट्रैवल एक ऐसा सपना है, जो कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी, हर आदमी ने देखा ही होगा। जैसे हम गलती करें और ऐन समय पर गंगा जी में जाकर अपने पाप धोकर फ्रेश हो लें। टाइम ट्रैवल के साथ भी आदमी कुछ ऐसा ही सलूक करना चाहता है—“काश! अतीत में जाकर एक-दो गलतियाँ सुधार आता।” लेकिन ब्रह्मांड है जी, उसके अपने नियम हैं। वह कोई तहसील का बाबू नहीं है कि आप पुराने कागज़ में नई तारीख लगाकर फाइल आगे बढ़वा दें।
कल्पना कीजिए, एक वैज्ञानिक ने ऐसी टाइम मशीन बना ही दी है। उत्साह में मैं केवल एक मिनट पीछे जाता हूँ और अपने ही पुराने स्वरूप को गोली मार देता हूँ। अब समस्या यह है कि अगर वह एक मिनट पहले ही मर गया तो गोली मारने भविष्य से कौन आया? और अगर भविष्य वाला आया ही नहीं तो मरा कौन? यहाँ कारण और परिणाम ऐसे उलझे हुए हैं, भेजा फ्राई की तरह, जैसे सरकारी अस्पताल में मरीज, पर्ची, काउंटर और डॉक्टर—सब मौजूद हैं, पर इलाज किसने किया, यह किसी को निश्चित मालूम नहीं।
अच्छा, थोड़ा और कन्फ्यूज़ करते हैं आपको। इस गड़बड़ी का एक प्रतिष्ठित बुज़ुर्ग संस्करण है—ग्रैंडफादर पैराडॉक्स। जी हाँ, यहाँ हम दादाजी को घसीट लाए हैं। मान लीजिए—वैसे ही मानिए जैसे गणित में मानते थे। टीचर कहते थे—“मान लो आपकी जेब में सौ रुपये हैं,” जबकि जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं होती थी। तो मान लो कि आप अतीत में गए और अपने दादाजी को ही विदा कर आए। फिर पिता पैदा ही नहीं हुए, तो आप पैदा कहाँ से हो गए? और जब आप पैदा ही नहीं हुए तो दादाजी को मारने गया कौन? यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई नेता अपनी ही पार्टी की नींव खोदकर कहे—“हम संगठन की मजबूत इमारत खड़ी कर रहे हैं।”
अच्छा, अभी और कन्फ्यूज़ होना है तो चलिए थोड़ा और आगे। इसे कहते हैं—प्रीडेस्टिनेशन पैराडॉक्स। कोई दुर्घटना हो गई। आप उस गलती को सुधारना चाहते हैं। टाइम ट्रैवल आपको मौका दे रहा है। आप पूरी ईमानदारी से अतीत में जाते हैं, लेकिन आपकी इसी ईमानदार हरकत से एक और दुर्घटना अतीत में हो जाती है। मतलब गए थे गलती सुधारने और एक और गलती कर बैठे। यानी अब क्या होगा?
लेकिन इतनी चिंता भी न करें मित्र। ब्रह्मांड के पास इससे निपटने के कुछ उपाय भी हैं। नोविकोव सिद्धांत कहता है कि इतिहास बदलने जाओगे तो ऐसा कुछ कर ही नहीं पाओगे। जैसे ब्रह्मांड तुम्हारी बंदूक जाम कर देगा, तुम्हारा पैर फिसला देगा या दादाजी को अचानक खाँसी आ जाएगी और वे जाग जाएँगे, इससे पहले कि तुम दादाजी का काम खत्म करो। मल्टीवर्स कहता है—बदलना है तो बदलो, पर नया ब्रह्मांड खोलकर बदलो। अपने खुद के यूनिवर्स की मातृ-भगिनी एक मत करो। यानी मूल घर सुरक्षित रहे, शरारत पड़ोसी प्लॉट में होनी चाहिए रे बाबा। और कुछ वैज्ञानिक कहते हैं कि टाइम मशीन जिस दिन चालू होगी, यात्रा भी उसी दिन से संभव होगी; उससे पहले नहीं। यानी कुछ इतिहास-वर्तमान का सपना तो अधूरा ही रह जाएगा। जो लोग इतिहास में जाकर अकबर को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में भर्ती कराने का सपना लिए बैठे हैं, उन्हें निराशा हाथ लगेगी।
क्वांटम दुनिया तो और भी विचित्र है बाबा। वहाँ कभी-कभी भविष्य का फैसला अतीत की तस्वीर बदलता हुआ दिखता है। यह वैसा है जैसे बाद में लिखी गई प्रेस रिलीज़ के मजमून के हिसाब से पहले हुई मीटिंग का माहौल ही बदल जाए। विज्ञान इसे डिलेड चॉइस कहता है, आम आदमी इसे “बाद में याद आया कि पहले क्या हुआ था” कहता है। यह तो चुनावी परिणामों को पूरी तरह बदल देगा। अभी तक हम ईवीएम हैक और वोट चोरी का रोना ही रो रहे थे।
स्टीफन हॉकिंग ने तो टाइम ट्रैवलरों के लिए पार्टी भी रखी थी। निमंत्रण पार्टी के बाद भेजा, ताकि भविष्य के यात्री अतीत में आ जाएँ। कोई नहीं आया। बड़ी निराशा हाथ लगी। अब कारण कुछ भी हो सकता है—टाइम मशीन बनी नहीं हो, निमंत्रण पहुँचा ही नहीं, मानवता इतनी बची नहीं, या टाइम ट्रैवलर समझदार निकले कि “हॉकिंग की पार्टी में जाकर इतिहास का पंचनामा क्यों ही करवाएँ?”
असल में भविष्य की ओर यात्रा एक संभावना है। विज्ञान मानता है कि तेज गति और गुरुत्व से समय धीमा पड़ सकता है। लेकिन अतीत में जाना अब भी वैसा ही है जैसे पुराने व्हाट्सएप मैसेज में जाकर अपनी गलती एडिट करना—आप स्क्रीनशॉट के युग में पकड़े ही जाएँगे मित्र।
टाइम ट्रैवल को मोबाइल रील जैसा ही समझिए। आप आगे-पीछे स्क्रॉल कर सकते हैं, पर मूल अपलोड या तो सुरक्षित रहेगा, या हर एडिट पर नई रील बन जाएगी। ज्यादा भावुक होने की जरूरत नहीं है। अगर आप सचमुच अतीत बदलने निकल पड़े, तो ब्रह्मांड आपकी चौकड़ी काटकर आपके मुंगेरीलाल के हसीन सपनों को पलभर में चूर कर सकता है—“बेटा, कहानी तुम्हारी है, पर प्लॉट ट्विस्ट मेरा है बंधु।”
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