बचा हुआ लोकतंत्र,,
– लोकतंत्र किसके पास है ? ये प्रश्न मंच ने नीचे भरी सभा में फेंका ।इतनी जोर से फेंका कि तंत्र द्वारा घेर
कर लाए गए लोक ( लोग) डर गए। लोग सोचने लगे शायद कुछ चोरी हो गया और इसका इल्ज़ाम हम
पर आयेगा ।सभा में लोग एक दूसरे को संदेह की निगाह से देखने लगे। कल्लन ने जल्दी से अपनी जेब
टटोलने के बाद ,लल्लन से पूछा ,क्या तेरे पास है लोकतंत्र ?
कल्लन ने कहा नहीं ,मैने थैले में भी देख लिया मेरे पास तो बीडी का बंडल है । पल्लन की तरफ इशारा
हुआ बता तेरे पास ?
उधर से लल्लन ने हाथ में पकड़ा छह पूड़ी का पैकेट दिखाते हुए कहा कि ये मिला है ,मुझे ,कहीं यही तो
नहीं है लोकतन्त्र ?
कल्लन ने मुंह से कच्च की आवाज निकालते हुए कहा नहीं ये तो नेताजी की से मिला है ।इसको तो हमे
खाना है। पल्लन ने पूछा तो लोकतंत्र कौन खाएगा ? क्या लोकतंत्र नेता जी खाएंगे ?नहीं वह खाने की
चीज नहीं है ।ये प्रश्न आम आदमी के थे जो उसी व्यवस्था में ही किए जा सकते थे ।जिसकी तलाश में मंच
से प्रश्न पूछा गया।
फिर लोकतंत्र है क्या ?
चोरी हो गया क्या ?
इतनी भीड़ में किसने चुराया होगा ?
दोनों ने एक साथ प्रेस कॉन्फेंस की तरह प्रश्न पूछ डाले और डरते डरते पूछा ये हमसे क्यों पूछ रहे है ?
तीसरे आदमी ने ट्रंप की तरह बीच में कूद कर कहा कोई जरूर और अच्छी चीज होगी ।कल्लन ने हंस
दिया फिर रुक कर अच्छी चीज ? इसका मतलब फिर नेता जी के परिवार का ही कोई उठा ले गया
होगा,फिर धीरे से हंस पड़ा।
पल्लन ने कहा अच्छी चीज होती तो पहले इनके बेटे को ही मिलती ।
मंच की तरफ से फिर आवाज आई बताइए ,आखिर किसके पास है लोकतंत्र ?
आपके पास ही है न !जब आप वोट देते है तब सरकार बनती है ।मतलब वोट की ताकत आपके पास है
,तो लोकतंत्र भी आपके पास ही हुआ ।
अब भीड़ में खड़े वह एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा उठे अरे ये वोट की बात कर रहे है ।वह तो पांच साल में
एक बार हमारे पास आता है उसी को लोकतंत्र कहते है क्या ?
बह तो एक साड़ी, दो पउआ,पांच सौ रुपए देकर जाता है।इसका मतलब लोकतंत्र तो नेता जी से अच्छा
है।ये चार घंटे के पांच सौ रूपए खाने का पैकेट देते है।
अरे वह तो है ,हमारे पास दोनों एक साथ बोले ।लोकतंत्र हमारे पास ही है।
ये सब भाषण में सुनकर वह बहुत खुश हुए कि देखा ,हमारी ताकत। हम ही है जो सरकार बनाते है।
अगर हम न हो सरकार नहीं बनेगी ।जब सरकार ही नहीं बनेगी तो देश कैसे चलेगा देश एक जगह ही रुक
कर रह जाएगा। दोनों फिर एक साथ अपनी अंगुली देखने लगे जिस से मशीन का बटन दबाया था।
इतने में मंच से सबका आभार व्यक्त कर दिया कि आप बहुत मुश्किल से समय निकाल कर
आए।पल्लन ने कहा कोई मुश्किल नहीं था,खाने का पैकेट पांच सौ में हम आ जाते है । कल्लन ने कहा
चलो सभा समाप्त हो गई। सरकार बनाने वाले पैदल निकलने लग। मंच के पीछे से वह लोग निकलने
लगे जो लोकतंत्र के रक्षक थे।
लोकतंत्र के मालिक जब उधर से निकलने के लिए प्रयास करने लगे तब लोकतंत्र के रक्षक के रक्षक ने
उन्हें धकिया दिया।
कल्लन ने पुलिस को कहा अरे आप हमें यहां से निकलने दो ।पुलिस ने जोर का धक्का देकर कहा नहीं
जनता के लिए इधर से नहीं जाना।
पल्लन ने कहा अरे हम लोकतंत्र के मालिक है।हम सरकार बनाते है।अभी मंच से तुमने सुना नहीं।
पुलिस जो अंग्रेजों के जमाने से ही लोकतंत्र को अपना दुश्मन मानती है।उसे लगता है कि चोर से पहले
लोकतन्त्र को ठिकाने लगाना जरूरी है ।
उसने लोकतंत्र के मालिक का गला पकड़ा और दूर फेक दिया।
और उसके हाथ में नेता जी का दिया हुआ पूड़ी पैकेट था जो उसके हाथ में धक्का मुक्की में बमुश्किल बच
पाया ।
पल्लन ने कहा लल्लन देख,, अपना लोकतंत्र तो अपने पास ही बच गया।
चलो इसे सुरक्षित घर ले चलें।
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