मेरे अस्तित्व के आकाश का विश्वास हैं पापा-पिता को समर्पित एक भावपूर्ण गीत

मेरे अस्तित्व के आकाश का विश्वास हैं पापा

पिता केवल एक रिश्ता नहीं होते—वे परिवार का विश्वास, संतान की शक्ति और जीवन की वह अदृश्य छाया होते हैं, जो कठिन से कठिन धूप में भी हमें सुरक्षित रखती है। उनकी उँगली थामकर हम चलना सीखते हैं, उनकी सीख से जीवन की राह पहचानते हैं और उनके विश्वास के सहारे अपने सपनों को उड़ान देते हैं।

माँ का प्रेम जहाँ सहज रूप से दिखाई और सुनाई देता है, वहीं पिता का स्नेह प्रायः उनकी जिम्मेदारियों, त्याग, अनुशासन, चिंताओं और मौन में छिपा रहता है। वे अपनी परेशानियों को स्वयं तक सीमित रखकर बच्चों के चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते हैं। उनकी डाँट में भविष्य की चिंता होती है, उनकी चुप्पी में जीवन का अनुभव और उनके कठोर दिखाई देने वाले व्यक्तित्व के भीतर अथाह वात्सल्य छिपा होता है।

इन्हीं भावनाओं को शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत है पिता को समर्पित यह भावपूर्ण गीत—“मेरे अस्तित्व के आकाश का विश्वास हैं पापा”

यह गीत एक संतान के हृदय में पिता के प्रति बसे प्रेम, श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। इसमें पिता को कभी मंदिर और चारों धाम के समान पवित्र माना गया है, तो कभी जीवन की कठिन परिस्थितियों में मजबूत ढाल और फ़ौलादी दीवार के रूप में याद किया गया है।

इस मौलिक रचना को अब भावपूर्ण संगीत के साथ संगीतबद्ध भी किया गया है। गीत को सुनते हुए आपको अपने पिता के साथ बिताए अनेक अनमोल क्षण अवश्य याद आएँगे।


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गीत के बोल

मुखड़ा / स्थायी

मेरे अस्तित्व के आकाश का विश्वास हैं पापा,

मेरे मन को उजाला दे, वो शुभ प्रकाश हैं पापा।

लिखूँ हर कामयाबी की इबारत उनके होने से,

मेरी हर जीत की ख़ुशी का एहसास हैं पापा।।

मेरा मंदिर, मेरी पूजा, चारों धाम हैं पापा,

मेरे साँवरे घनश्याम, प्रभु श्रीराम हैं पापा।


अंतरा 1

सिखाए हर घड़ी मुझको फ़साने दुनियादारी के,

बताए अर्थ रिश्तों के, उसूलों के, ख़ुद्दारी के।

निभाई हर घड़ी तुमने फ़र्ज़ और रस्म-ए-यारी भी,

तुम्हीं आधार हो पापा, मेरी इस राज़दारी के।।

तेरे क़दमों पे दुनिया की सभी दौलत करूँ क़ुर्बान,

तेरे बिन फीके पड़ जाएँ ये किस्से बेशुमारी के।।

मेरा मंदिर, मेरी पूजा, चारों धाम हैं पापा,

मेरे साँवरे घनश्याम, प्रभु श्रीराम हैं पापा।


अंतरा 2

बने हो ढाल हर पल तुम, खड़े मजबूत बन फ़ौलाद,

कभी मुझ तक न आने दी ज़माने की कोई भी मार।

मुसीबत सामने आई, तो तुम दीवार बन बैठे,

तुम्हारी सीख से कभी ना पाया मुश्किलों से हार।।

ज़माने के कठिन खेलों की हर इक चाल में पापा,

मेरी हिम्मत, मेरी ताक़त, मेरे हर हाल में पापा।।

मेरा मंदिर, मेरी पूजा, चारों धाम हैं पापा,

मेरे साँवरे घनश्याम, प्रभु श्रीराम हैं पापा।


अंतरा 3

शजर की छाँव-सी नरमी तपन तुमने दिया मुझको,

थके क़दमों को मंज़िल की लगन तुमने दिया मुझको।

कड़ी धूपों में सिर पर हाथ रखकर साथ तुम चलते,

गिरा जब भी, पुनः उठने का जतन तुमने दिया मुझको।।

सजे हो चन्द्रमा बनकर मेरे इस भाल में पापा,

दुआ बनकर समाए हो मेरे हर ख़याल में पापा।।

मेरा मंदिर, मेरी पूजा, चारों धाम हैं पापा,

मेरे साँवरे घनश्याम, प्रभु श्रीराम हैं पापा।


अंतरा 4

तुम्हारे नाम से मेरी कहानी को असर मिलता,

तुम्हारी सीख से जीवन जीने का हुनर मिलता।

तुम्हारी उँगलियाँ थामे चला जिस राह पर पापा,

उसी राह पर मुझे खड़ा अपना सफ़र मिलता।।

मेरी पहचान तुमसे है, मेरा सम्मान तुमसे है,

मेरी साँसों का हर सपना, मेरा अरमान तुमसे है।।

मेरा मंदिर, मेरी पूजा, चारों धाम हैं पापा,

मेरे साँवरे घनश्याम, प्रभु श्रीराम हैं पापा।


ब्रिज / भाव-उत्कर्ष

तुम्हारी डाँट में भी प्रेम का संदेश पाया है,

तुम्हारी चुप्पियों में भी बड़ा उपदेश पाया है।

जो दुनिया से नहीं सीखा, तुम्हारे पास सीखा है,

तुम्हारे त्याग में जीवन अर्थ विशेष पाया है।।

तुम्हीं से धैर्य पाया है, तुम्हीं से स्वाभिमान मिला,

तुम्हारे नाम से मुझको मेरा सच्चा जहान मिला।।


अंतिम अंतरा

“असीमित” गीत बनकर गूँजता हूँ जिसके बूते से,

सजाता हूँ नए सपने उसी के नेक किस्से से।

मेरी आवाज़, मेरी लेखनी, मेरी उड़ान तुमसे है,

मेरी हर भावना जन्मी तुम्हारे ही भरोसे से।।

मेरी पहचान, मेरा मान, मेरा ईमान हैं पापा,

मेरी सीमाओं से आगे खुला आयाम हैं पापा।।


समापन / मुखड़ा

मेरे अस्तित्व के आकाश का विश्वास हैं पापा,

मेरे मन को उजाला दे, वो शुभ प्रकाश हैं पापा।

लिखूँ हर कामयाबी की इबारत उनके होने से,

मेरी हर जीत की ख़ुशी का एहसास हैं पापा।।

मेरा मंदिर, मेरी पूजा, चारों धाम हैं पापा,

मेरे साँवरे घनश्याम, प्रभु श्रीराम हैं पापा।

मेरी पहचान, मेरा ईमान, मेरा आयाम हैं पापा,

मेरी दुनिया, मेरी जन्नत, मेरा अभिमान हैं पापा।।


पिता—हमारे जीवन का मौन आधार

पिता अपने बच्चों के लिए कितने त्याग करते हैं, इसका पूरा हिसाब शायद कभी लिखा ही नहीं जा सकता। वे अपनी आवश्यकताओं को पीछे रखकर संतान के सपनों को प्राथमिकता देते हैं। स्वयं थककर भी बच्चों के लिए रास्ते बनाते हैं। वे गिरने से हमेशा नहीं रोकते, लेकिन गिरने के बाद दोबारा उठना अवश्य सिखाते हैं।

उनका सबसे बड़ा उपहार केवल भौतिक सुविधाएँ नहीं, बल्कि वे संस्कार हैं जो हमें सही और गलत का अंतर बताते हैं। पिता से प्राप्त स्वाभिमान, धैर्य, अनुशासन और संघर्ष करने की शक्ति जीवनभर हमारे साथ रहती है।

कई बार हम अपने पिता से अपने मन की बातें नहीं कह पाते। उनके प्रति प्रेम और कृतज्ञता भीतर ही भीतर अनुभव करते रहते हैं। यह गीत उन्हीं अनकही भावनाओं को आवाज़ देने का एक विनम्र प्रयास है।

जिनके पिता उनके साथ हैं, वे उनके सान्निध्य के प्रत्येक क्षण को संजोकर रखें। जिनके पिता स्मृतियों में बसते हैं, उनके संस्कार, आशीर्वाद और सीख को अपने जीवन में जीवित रखें—क्योंकि पिता शरीर से दूर हो सकते हैं, लेकिन उनकी दी हुई रोशनी कभी समाप्त नहीं होती।


पिता वह छत हैं, जिनकी छाया का मूल्य हमें अक्सर तब समझ आता है, जब जीवन की धूप कुछ अधिक तीखी हो जाती है।

आज अपने पिता से केवल इतना अवश्य कहें—

पापा, मेरी पहचान, मेरा विश्वास और मेरी हर उड़ान आपसे है।”


रचना एवं प्रस्तुति

डॉ. मुकेश ‘असीमित’

प्रकाशन

बात अपने देश की


मेरे अस्तित्व के आकाश का विश्वास हैं पापा…
पिता के प्रेम, त्याग, संघर्ष और आशीर्वाद को समर्पित एक भावपूर्ण गीत। इसे सुनते हुए शायद आपकी आँखों में भी पिता से जुड़ी कोई अनमोल स्मृति उतर आए।

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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