आवागमन मिटाय द्यौ, भोले शंकर — एक लोक-फकीरी शिव भजन
भगवान शिव की भक्ति में एक अद्भुत सरलता है। यहाँ आडंबर से अधिक महत्व समर्पण का है, शब्दों से अधिक भाव का है, और संगीत से अधिक उस पुकार का है जो भीतर से उठती है। इसी भावभूमि से जन्मा है यह नया शिव-भजन—
“आवागमन मिटाय द्यौ, भोले शंकर”
यह भजन ब्रज, अवधी और लोक-फकीरी शैली के उस सहज संसार से आता है जहाँ भक्त भगवान से किसी जटिल भाषा में नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की बोली में बात करता है। वह कहता है—
“अब तो आन संभालौ नाथ,
करौ किरपा महादेव…”
यह केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन से थके हुए मन की पुकार है।
जब संसार “झूठा मेला” लगने लगे
भजन की सबसे बड़ी खूबसूरती इसका सीधा जीवन-दर्शन है। इसमें संसार को एक मेले की तरह देखा गया है—रौनक बहुत है, आकर्षण बहुत है, पर ठहराव नहीं।
भक्त कहता है कि मन कभी मोह में फँसता है, कभी लोभ में। धन-दौलत, मान-सम्मान और सांसारिक उपलब्धियाँ अंततः यहीं रह जाती हैं।
इसीलिए भजन की पंक्तियाँ बहुत सहज होकर कहती हैं कि अंत में यदि कुछ साथ जाता है तो वह है—
नाम, भक्ति और ईश्वर से जुड़ाव।
“भव के फेरा काटि द्यौ” — भजन की आत्मा
इस भजन की केंद्रीय पुकार है—
“भव के फेरा काटि द्यौ, भोले शंकर…”
भारतीय अध्यात्म में जन्म-मरण का चक्र केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि मुक्ति की सबसे पुरानी खोजों में से एक है।
यहाँ भक्त भगवान शिव से धन, वैभव या चमत्कार नहीं माँगता। वह चाहता है कि उसके भीतर का अंधकार मिटे, भ्रम टूटे और जीवन की दिशा स्पष्ट हो।
यही भाव आगे आता है—
“मन मंदिर में जोत जगा दो,
मिट जाय अँधियार…”
बहुत सरल पंक्ति है, लेकिन अर्थ बहुत गहरा है।
लोक भाषा में शिव भक्ति
इस रचना को जानबूझकर अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ या साहित्यिक भाषा में नहीं लिखा गया है।
इसमें ऐसे शब्द आते हैं—
मिटाय द्यौ, सुन ल्यो, चरणन, कछु, ठाँव, मनवा, जइहैं…
यही शब्द इसे लोक-जीवन के करीब लाते हैं।
ऐसा लगता है जैसे किसी गाँव की चौपाल, मंदिर के बाहर बैठे फकीर या किसी पुराने लोकगायक की आवाज़ में यह भजन सुनाई दे रहा हो।
इस शैली में भक्त और भगवान के बीच दूरी बहुत कम हो जाती है। शिव यहाँ केवल कैलास के देव नहीं रहते—वे अपने हो जाते हैं।
संगीत में फकीरी भाव
इस भजन की संगीत-कल्पना भी जानबूझकर सरल और देसी रखी गई है।
इकतारा, ढोलक, मंजीरा, खड़ताल, हल्का हारमोनियम और बांसुरी जैसे वाद्य इस तरह के भजन को एक प्राकृतिक लोक-स्पर्श देते हैं।
गायन में भी बहुत चमकदार या फिल्मी अंदाज़ के बजाय एक पुरुष फकीर/भोपा जैसी खुरदुरी, भावपूर्ण और मिट्टी से जुड़ी आवाज़ अधिक उपयुक्त लगती है।
इस तरह संगीत केवल भजन का साथ नहीं देता, बल्कि उसकी आत्मा बन जाता है।
भजन का सबसे भावपूर्ण संदेश
भजन के अंतिम हिस्से में भक्त कहता है—
“ये जग झूठो मेला बाबा,
तुम साँचे करतार।
अब तो आओ, हाथ पकड़ लो,
कर दो बेड़ा पार॥”
यहाँ “बेड़ा पार” केवल धार्मिक मुक्ति का प्रतीक नहीं है।
यह जीवन की उलझनों, भय, थकान, मोह और असुरक्षा से पार जाने की भी प्रार्थना है।
इसीलिए भजन का अंतिम भाव बहुत निजी और आत्मीय हो जाता है—
“अपनो मोय बनाय ल्यो, भोले शंकर…”
शायद यही भक्ति का सबसे सरल रूप है।
भगवान से कुछ पाने की इच्छा नहीं—बस उनका हो जाने की इच्छा।
YouTube पर सुनिए पूरा भजन
यह भजन अब मेरे YouTube चैनल Dr Mukesh Aseemit Creations | Music with Mukesh पर उपलब्ध है।
आप इस भजन को सुनें, और यदि इसका भाव आपके मन को छुए तो इसे अपने परिवार, मित्रों और शिव-भक्तों के साथ अवश्य साझा करें।
कमेंट में अपनी भक्ति व्यक्त करना चाहें तो बस लिखिए—
हर हर महादेव 🔱
निष्कर्ष
“आवागमन मिटाय द्यौ, भोले शंकर” किसी बड़े दार्शनिक उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक साधारण भक्त की सीधी प्रार्थना की तरह सामने आता है।
इसमें संसार की नश्वरता है, मन की थकान है, अपनी भूलों की स्वीकारोक्ति है, और अंत में शिव के चरणों में पूर्ण समर्पण है।
कभी-कभी भक्ति इतनी ही सरल होती है—
“अब तो आन संभालौ नाथ…”
और शायद यही सरलता इसे मन के भीतर उतरने लायक बनाती है।
हर हर महादेव।
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