दिल अभी जवान है… फिर इतनी जल्दी बीमार क्यों पड़ रहा है?
विश्व हृदय दिवस — 29 सितम्बर
कभी दिल की बीमारी का नाम सुनते ही हमारे मन में एक खास तस्वीर उभरती थी—साठ-पैंसठ वर्ष का कोई व्यक्ति, सफेद होते बाल, हाथ में दवाइयों की थैली, सुबह पार्क में धीमे-धीमे टहलता हुआ। हार्ट अटैक, एंजाइना, बायपास और ब्लड प्रेशर जैसी बातें मानो जीवन के उत्तरार्ध की शब्दावली थीं। लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है।
आज खबर मिलती है—चालीस वर्ष का व्यक्ति जिम करते-करते अचानक गिर पड़ा, किसी पैंतीस वर्षीय युवक को ऑफिस में सीने में दर्द हुआ, कोई बिल्कुल स्वस्थ दिखाई देने वाला युवा अचानक गंभीर हृदय समस्या का शिकार हो गया। ऐसी खबरें इसलिए ज्यादा चौंकाती हैं क्योंकि हमारे मन में अब भी एक पुरानी धारणा जमी है—दिल की बीमारी बुजुर्गों की बीमारी है।
सच्चाई यह है कि दिल जन्मतिथि देखकर बीमार नहीं पड़ता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हृदय और रक्तवाहिनियों से जुड़ी बीमारियाँ आज भी दुनिया में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण हैं। वर्ष 2022 में लगभग 1.98 करोड़ लोगों की मृत्यु हृदय संबंधी रोगों से हुई और इनमें से लगभग 85 प्रतिशत मौतें हार्ट अटैक और स्ट्रोक से जुड़ी थीं। चिंताजनक बात यह भी है कि हृदय रोगों से होने वाली बड़ी संख्या में असामयिक मौतें 70 वर्ष से कम उम्र में होती हैं। (World Health Organization)
यहाँ सवाल उठता है—क्या हमारा दिल कमजोर हो गया है?
शायद नहीं। लेकिन हमारी जीवनशैली बहुत तेजी से बदल गई है।
कुछ दशक पहले तक रोजमर्रा की जिंदगी में शारीरिक गतिविधि अपने आप शामिल थी। बाजार पैदल जाना, सीढ़ियाँ चढ़ना, छोटे काम स्वयं करना, खुले में चलना-फिरना—शरीर को अलग से याद दिलाना नहीं पड़ता था कि उसे चलना चाहिए। आज सुविधा ने श्रम को धीरे-धीरे जीवन से बाहर कर दिया है। सुबह बिस्तर से उठे, कार में बैठे, दफ्तर पहुँचे, लिफ्ट से ऊपर गए, कुर्सी पर घंटों बैठे, शाम को लौटकर सोफे पर मोबाइल लेकर बैठ गए।
विडंबना देखिए—हमारी उंगलियाँ दिन भर स्क्रीन पर दौड़ती रहती हैं, लेकिन पैर शायद दो किलोमीटर भी नहीं चलते।
शारीरिक निष्क्रियता हृदय रोगों के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में गिनी जाती है। इसके साथ तंबाकू, अस्वास्थ्यकर भोजन, अत्यधिक शराब सेवन, मोटापा और वायु प्रदूषण भी हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। यही जोखिम आगे चलकर बढ़े हुए रक्तचाप, ब्लड शुगर, रक्त में असामान्य वसा और मोटापे के रूप में सामने आ सकते हैं। (World Health Organization)
हमारी थाली ने भी इस परिवर्तन में कम भूमिका नहीं निभाई है।
घर का सामान्य, संतुलित भोजन धीरे-धीरे बार-बार बाहर खाने, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय, अत्यधिक नमक, अतिरिक्त चीनी और जरूरत से ज्यादा कैलोरी के बीच दबता जा रहा है। स्वाद तुरंत मिलता है, नुकसान धीरे-धीरे जमा होता है।
हृदय रोग की यही सबसे बड़ी चालाकी है।
धमनियों में हो रहे बदलाव कोई घंटी बजाकर नहीं बताते कि खतरा बढ़ रहा है। रक्तचाप वर्षों से बढ़ा हुआ हो सकता है, ब्लड शुगर सामान्य सीमा पार कर चुकी हो सकती है, कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है—और व्यक्ति फिर भी बिल्कुल सामान्य महसूस कर सकता है।
इसीलिए कभी-कभी स्वास्थ्य के संदर्भ में सबसे भ्रमित करने वाला वाक्य होता है—
“मुझे तो कुछ होता ही नहीं है।”
उच्च रक्तचाप, मधुमेह और बढ़ी हुई रक्त वसा लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकते हैं। WHO भी इस बात पर जोर देता है कि ऐसे जोखिमों की समय पर पहचान और उपचार हृदय संबंधी जटिलताओं और असामयिक मृत्यु को कम करने में महत्वपूर्ण हैं। (World Health Organization)
फिर आता है आधुनिक जीवन का अदृश्य साथी—तनाव।
आज का युवा शारीरिक रूप से शायद कम दौड़ता है, लेकिन मानसिक रूप से लगातार दौड़ रहा है। नौकरी का दबाव, व्यापार की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक चिंताएँ, सोशल मीडिया की तुलना, हर समय उपलब्ध रहने की मजबूरी और भविष्य को लेकर बेचैनी—इन सबके बीच मन को विश्राम कहाँ मिलता है?
और जब दिन छोटा पड़ता है, सबसे पहले नींद की बलि दी जाती है।
“पाँच घंटे काफी हैं।”
“वीकेंड पर नींद पूरी कर लेंगे।”
“अभी काम ज्यादा है।”
लेकिन शरीर हमारे इन तर्कों से प्रभावित नहीं होता। नियमित और पर्याप्त नींद, संतुलित मानसिक जीवन तथा तनाव का स्वस्थ प्रबंधन भी हृदय की देखभाल के व्यापक ढाँचे का हिस्सा हैं।
युवाओं में तंबाकू एक और गंभीर खतरा है। सिगरेट, बीड़ी या किसी अन्य रूप में तंबाकू—दिल के लिए इसे सुरक्षित नहीं माना जा सकता। “सिर्फ कभी-कभार” वाला तर्क भी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। तंबाकू हृदय रोग और स्ट्रोक के प्रमुख रोके जा सकने वाले जोखिमों में शामिल है। (World Health Organization)
लेकिन यहाँ भय और जागरूकता के बीच संतुलन जरूरी है।
हर युवा को यह सोचकर जीने की आवश्यकता नहीं कि अगला हार्ट अटैक उसी को होने वाला है। उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, जोखिम को समझना है। दिल की सुरक्षा कोई रहस्यमयी विज्ञान भी नहीं है।
रास्ता आश्चर्यजनक रूप से साधारण है।
नियमित शारीरिक गतिविधि करें। दिन भर लगातार बैठे रहने के बीच उठें और चलें। घर के संतुलित भोजन को प्राथमिकता दें। सब्जियाँ, फल, साबुत अनाज और उचित प्रोटीन बढ़ाएँ। नमक, अतिरिक्त चीनी, तले और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन को सीमित करें। तंबाकू से दूरी बनाएँ। WHO भी नमक कम करने, फल-सब्जियाँ बढ़ाने, नियमित शारीरिक गतिविधि और तंबाकू छोड़ने को हृदय रोग से बचाव के प्रभावी उपायों में शामिल करता है। (World Health Organization)
और केवल शरीर देखकर स्वास्थ्य का अनुमान न लगाएँ।
पतला व्यक्ति भी हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल का शिकार हो सकता है। परिवार में कम उम्र में हृदय रोग का इतिहास हो, धूम्रपान हो, मोटापा हो या अन्य जोखिम मौजूद हों तो चिकित्सकीय सलाह के अनुसार रक्तचाप, ब्लड शुगर और लिपिड प्रोफाइल जैसी जाँचें महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
जागरूकता का एक दूसरा जरूरी हिस्सा है—हार्ट अटैक के संकेतों को पहचानना।
सीने में दबाव, जकड़न या दर्द, सांस फूलना, ठंडा पसीना, मतली, चक्कर या दर्द का बांह, कंधे, पीठ अथवा जबड़े की तरफ फैलना जैसे लक्षणों को केवल “गैस” मानकर इंतजार करना खतरनाक हो सकता है। हर व्यक्ति में लक्षण बिल्कुल एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं। ऐसे लक्षण अचानक हों या बने रहें तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेना चाहिए। (World Health Organization)
यहीं 29 सितम्बर के विश्व हृदय दिवस का असली अर्थ सामने आता है।
यह दिन केवल लाल दिल वाला पोस्टर लगाने या सोशल मीडिया पर “अपने दिल का ख्याल रखें” लिख देने का अवसर नहीं होना चाहिए। जागरूकता तब सार्थक होगी जब घरों में स्वास्थ्य पर बातचीत होगी, स्कूल बच्चों को सक्रिय जीवन की आदत सिखाएँगे, दफ्तरों में घंटों लगातार बैठे रहने की संस्कृति बदलेगी और स्वास्थ्य जाँच को बीमारी की निशानी नहीं, रोकथाम की समझ माना जाएगा।
हमें यह भी समझना होगा कि फिटनेस केवल जिम की तस्वीर, छह पैक या कम वजन का नाम नहीं है। स्वस्थ रक्तचाप, नियंत्रित शुगर, बेहतर सहनशक्ति, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद और तंबाकू से दूरी भी फिटनेस की उतनी ही महत्वपूर्ण पहचान हैं।
दिल बड़ी दिलचस्प चीज है।
प्रेम में पड़ते हैं तो कहते हैं—दिल की सुनो।
दुख में कहते हैं—दिल टूट गया।
किसी का साहस बढ़ाना हो तो कहते हैं—दिल छोटा मत करो।
लेकिन जब इसी दिल की सेहत की बात आती है, हम अक्सर कहते हैं—
“अभी उम्र ही क्या हुई है!”
शायद विश्व हृदय दिवस पर इसी एक वाक्य को बदलने की आवश्यकता है।
उम्र चाहे कम हो, दिल की देखभाल अभी से शुरू होनी चाहिए। क्योंकि स्वस्थ दिल बुढ़ापे की तैयारी नहीं, पूरे जीवन की बुनियाद है।
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