खाओ और खाने दो-पापी पेट का सवाल

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 9, 2026 व्यंग रचनाएं 0

पेट की राजनीति बड़ी सीधी है—खाली पेट सिर्फ़ खाना माँगता है, भरा पेट सवाल। बब्बन चाचा के पेट से देश की प्रगति नापी जा सकती है, क्योंकि जहाँ खाना दिखा, वहाँ लोकतंत्र अपने आप चुप हो जाता है।

राजनीति की गीता: कुर्सीपुराण का अंश

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 5, 2026 व्यंग रचनाएं 0

यह गीता मोक्ष नहीं दिलाती, यह कुर्सी दिलाती है—और वही इसका सबसे बड़ा धर्म है।जहाँ कर्म दूसरों से कराया जाता है और फल स्वयं भोगा जाता है, वहीं से राजनीति का शास्त्र शुरू होता है।

रिश्तों की गाड़ी और दो करोड़ की एक्सेसरीज़

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 4, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज रिश्ते तय नहीं होते, डेमो दिए जाते हैं। बायोडाटा अब परिचय नहीं, प्रोडक्ट कैटलॉग है—जिसमें माइलेज, एसेट्स और फ्री एक्सेसरीज़ गिनाई जाती हैं। सवाल बस इतना है: क्या संस्कार भी EMI पर मिलते हैं?

चार्जर खोजता भविष्य और ज्ञान बाँटता अतीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 4, 2026 व्यंग रचनाएं 1

डायल-अप की खटखट से लेकर 5G की बेचैनी तक—यह व्यंग्यात्मक लेख पीढ़ियों की उस यात्रा को पकड़ता है जहाँ रिश्ते तारों से जुड़े थे, सपने EMI पर चले और अब अस्तित्व चार्जिंग पॉइंट ढूँढ रहा है। Gen X की स्मृतियाँ, Gen Y की व्यावहारिकता, Gen Z की रील-हक़ीक़त और Gen Alpha की स्क्रीन-सभ्यता—सब एक कमरे में, एक ही नेटवर्क पर।

गुमनाम हूं ,लेकिन ,नाम वाला, हो जाऊं तो रिश्ते निकाल लेना!

Prem Chand Dwitiya Feb 4, 2026 व्यंग रचनाएं 1

पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।

छोटे बनाम बड़े बाबू डा राम कुमार जोशी

Ram Kumar Joshi Jan 30, 2026 व्यंग रचनाएं 2

असल में काम तो छोटा बाबू ही करता है, पर वाहवाही और माल ऊपर वालों के हिस्से। बाबूजी के जूते ही उनकी सबसे मजबूत ढाल थे—कोई पूछे तो जवाब मिल जाता, “कहीं काम से गए होंगे।” फाइल ढूंढना समुद्र से मोती निकालने जैसा बताया गया, ताकि मोती की क़ीमत भी वसूली जा सके। धीरे-धीरे कलेक्टर साहब भी समझ गए—इस शाही नौकरी में ज्यादा ईमानदारी से शुगर-बीपी ही मिलता है। इस तरह बाबूओं के जाल में जिले के सबसे बड़े बाबू सरकार भी सम्मिलित हो गए।

मेरा नाम करेगा रोशन

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 21, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी। नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं। समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”

टंकी का बयान : एक गिरावट की आत्मकथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 21, 2026 व्यंग रचनाएं 0

यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।

लिखा के लाए हैं…

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 16, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।” “किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।” “इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।” “कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”