डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 18, 2026
India Story \बात अपने देश की
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पराधीनता का प्रश्न—इतिहास का नहीं, मानसिकता का “भारत बार-बार पराधीन क्यों हुआ?”—यह सवाल सुनते ही हमारे भीतर एक तैयार-सा उत्तर उठता है: “बाहरी आक्रमणकारी ताक़तवर थे… हमारे पास हथियार नहीं थे… हमारी सेनाएँ कमज़ोर थीं… हम तकनीक में पीछे थे…”। ये सारे उत्तर आंशिक रूप से सही हैं, पर पूर्ण नहीं। क्योंकि दुनिया में बहुत-से […]
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 14, 2026
India Story \बात अपने देश की
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“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?”
“विशेष वैलेंटाइन डिश” दिल के आकार में, पर स्वाद में विस्फोटक!
क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद सच में कम हो रहा है?
अब सवाल यह है—दिल लाल रहेगा या बसंत पीला?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 11, 2026
Health And Hospitals
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“यह समस्या केवल चिकित्सा जगत तक सीमित नहीं है।
यह समाज, मनुष्य, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता—सबमें एक साथ फैली हुई बीमारी है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर जगह इलाज चल रहा है,
पर बीमारी ठीक नहीं हो रही—क्योंकि इलाज ही ग़लत है।”
आज की दुनिया में सबसे बड़ा संकट बीमारी का नहीं,
बल्कि बीमारी की पहचान का संकट है।
मन की बीमारियों के लिए मोटिवेशनल वीडियो,
पर्यावरण के लिए सम्मेलन,
राजनीति के लिए भावनात्मक नारे—
ये सब प्लेसीबो हैं।
जब नक़ली इलाज सामान्य हो जाता है,
तब असली मौतें सिर्फ़ आँकड़े बनकर रह जाती हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 6, 2026
India Story \बात अपने देश की
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हम यूँ ही नहीं हैं—हम अरबों कोशिकाओं, लाखों वर्षों और अनगिनत संभावनाओं का जीवित प्रमाण हैं।
डीएनए सिर्फ़ जैविक संरचना नहीं, यह हमारी स्मृति, हमारे पूर्वजों और हमारे भविष्य का साझा दस्तावेज़ है।
जब अस्तित्व अपने आप में चमत्कार है, तो निरर्थक होने का प्रश्न ही कहाँ उठता है?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 29, 2026
Art and Craft
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भारत का उपनिवेशीकरण केवल तलवार और सत्ता का परिणाम नहीं था। उससे पहले और उससे कहीं गहराई तक, यह काम विचारों, इतिहास-लेखन और शिक्षा-नीति के माध्यम से किया जा चुका था। हिंदुओं को दुनिया किस दृष्टि से देखेगी, जाति और ब्राह्मणों को कैसे समझा जाएगा—इन सबकी रूपरेखा युद्धभूमि में नहीं, बल्कि बंद कमरों में तैयार की गई।
यह लेख उसी बौद्धिक उपनिवेशवाद की पड़ताल करता है, जहाँ भारतीय समाज को पिछड़ा, जड़ और सुधार-योग्य सिद्ध करना एक औपनिवेशिक आवश्यकता बन गया। जाति व्यवस्था को स्थिर और ब्राह्मणों को स्थायी खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आज भी हमारे सामाजिक विमर्शों में प्रतिध्वनित होती है। लेख का उद्देश्य आरोप नहीं, बल्कि उस दृष्टि को पहचानना है, जो हमें सदियों से दी जाती रही है।
Priyanka Ghumara
Jan 12, 2026
Culture
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“यह पर्व केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन की दृष्टि बदलता है।”
“लोहड़ी संघर्ष के बाद आने वाली राहत और संभावना का लोकउत्सव है।”
“लोकपर्वों की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है।”
“परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह समय से संवाद करती है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 1, 2026
India Story \बात अपने देश की
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नया साल कोई तारीख नहीं, भीतर की एक हल्की-सी हलचल है।
उत्सव का सवाल नहीं, चेतना का सवाल है।
जो छूट गया, वही नया है; जो थाम लिया, वही बोझ।
कैलेंडर बदलते रहते हैं, साल तभी बदलता है जब दृष्टि बदलती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 29, 2025
Cinema Review
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राजेश खन्ना पहले सुपरस्टार नहीं थे, वे उस दौर का नाम थे जब सिनेमा पूजा बन गया था।
तालियाँ जब बहुत देर तक बजती रहें, तो आदमी शोर का आदी हो जाता है और खामोशी उसे डराने लगती है।
जिसने एक बार शिखर को घर समझ लिया, वह ज़िंदगी भर मैदान को कमतर मानता रहा।
काका की मुस्कान जितनी चमकदार थी, उनके भीतर का अकेलापन उतना ही गहरा।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 27, 2025
India Story \बात अपने देश की
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यह साल किसी कैलेंडर की तरह नहीं बीता, बल्कि अधूरी डायरी की तरह—जहाँ स्याही कम और धड़कन ज़्यादा थी। घटनाएँ बदलीं, लेकिन उनसे ज़्यादा बदले हमारे डर, ग़ुस्सा और चुप्पियाँ।
यह साल हमें किसी नतीजे तक नहीं लाया, बल्कि सवालों की लंबी सूची सौंप गया—कि हम क्या सोचते हैं, कैसे सोचते हैं और कब चुप रहते हैं।
आतंक, युद्ध, आस्था, कॉमेडी, सोशल मीडिया—हर मोर्चे पर यह साल हमें भीतर तक झकझोरता रहा। इतिहास बनता रहा, और हम बदलते रहे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 27, 2025
India Story \बात अपने देश की
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27 दिसंबर को ग़ालिब सिर्फ़ याद नहीं आते—वे हमारे भीतर बोल उठते हैं। उनकी शायरी “फेल्ट थॉट” है: जज़्बात की नर्मी और तर्क की रोशनी का दुर्लभ मेल।
ग़ालिब को पढ़ना मतलब अपनी उलझन, तन्हाई और हैरत के लिए सही लफ़्ज़ पा लेना—और फिर उन लफ़्ज़ों के साथ थोड़ा हल्का हो जाना।
आज के डिजिटल दौर में भी ग़ालिब उतने ही ज़रूरी हैं—क्योंकि वे हमें नफ़रत से कम, समझ से ज़्यादा जोड़ते हैं।