हमारे देश में कागज़ का बड़ा महत्व है। आदमी हो न हो, कागज़ होना चाहिए। जन्म से मृत्यु तक आदमी जितना अपने परिवार के भरोसे नहीं जीता, उससे अधिक कागज़ों के भरोसे जीता है। जन्म प्रमाण पत्र से शुरू होकर मृत्यु प्रमाण पत्र पर समाप्त होने वाली इस यात्रा में बीच-बीच में सरकारी मोहर लगे राशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पैन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, चरित्र प्रमाण पत्र,अलाना पत्र और ढीकाना पत्र,बनवाने और दिखाने की लंबी लाइन की यात्रा करते-करते आदमी अनंत यात्रा पर निकल लेता है। लेकिन इसी बीच जनता को एक ऐसा दिव्य कार्ड सरकार जनता के हाथ में थमा दिया है जैसे स्वयं धन्वंतरि भगवान अमृत कलश लेकर अमरत्व प्रदान करने निकल पड़े हों। इस भरोसे के साथ कि वैसे तुम लोग जीने के काबिल तो हो नहीं, लेकिन अगर जीए नहीं तो हमें वोट कौन देगा,तो लो, अब तुम्हें मरने नहीं दिया जाएगा। तुम्हारा इलाज मुफ्त है। अब बीमारी तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी? अब तुम्हें सरकारी अस्पताल में मरने की जरूरत नहीं,हमने तुम्हें निजी अस्पतालों में छोड़ दिया है मरने के लिए।
जनता ने कार्ड को माथे से लगाया,“भागते भूत की लंगोट ही सही”,के भाव से। किसी ने जेब में रखा, किसी ने प्लास्टिक कवर में सील करवाया, किसी ने उसे ऐसे संभाला जैसे घर की बहू का पीहर से आया गहना हो। चुनावी सभाओं में मंचों से घोषणा हुई,“देखिए, हम जनता का कितना ख्याल रखते हैं! आपको सरकारी अस्पताल की गंदगी और अव्यवस्थाओं को झेलने की जरूरत नहीं। हम आपके स्वास्थ्य का ख्याल तो नहीं रख सकते,स्वच्छ पानी, स्वच्छ हवा, साफ़ सांस नहीं दे सकते,लेकिन कम से कम बीमार पड़ने पर इलाज करवा सकते हैं!” जनता प्रसन्न भई। कुछ तो बीमारी का इंतज़ार करने लगे,चलो कार्ड का टेस्ट हो जाएगा। अब बीमारी आएगी तो डॉक्टर इलाज करेगा, अस्पताल भर्ती करेगा, सरकार बिल चुकाएगी,वाह, बढ़िया काम हुआ जी!
कार्ड हाथ में पकड़े बब्बन चाचा मेरे पास आए,“बताओ भैया, इसमें अस्पताल में क्या-क्या सुविधा मिलेगी? वहाँ भरती पर खाना भी मिलेगा?” मैंने कहा,“हाँ चाचा, और एक अटेंडेंट का भी साथ में ।” चाचा की आँखें चमक उठीं,“अरे वाह! आने-जाने के लिए एंबुलेंस भी मिलेगी?” मैंने कहा,“चिंता मत करो चाचा, बस तुम बीमार पड़ो, बाकी सब इंतज़ाम है।” चाचा ने गहरी सांस ली,बस वो तो अब बीमार पड़ने का इंतज़ार ही करने लगे हैं ।
कार्ड बनवाने की होड़ लगी तो सरकारी दफ्तरों का मंद पड़ा धंदा भी चमक उठा। सरपंच की सरपंचाई अपने खेमें के वोटरों के कार्ड बनवाने और विरोधियों के कार्ड में से नाम हटवाने में नई ऊँचाइयाँ छूने लगी। राजनीति भी अपनी बीमार हालत को इस कार्ड के इंजेक्शन से दुरुस्त करने लगी । जनता है,उसे कहाँ पता कि यह कार्ड इलाज का कम, भ्रम का अधिक दस्तावेज़ है; यह राहत का कम, प्रचार का अधिक पोस्टर है; यह सेवा का कम, वोट का अधिक वाउचर है।
सरकार ने बड़ी कृपा से बीमा प्रीमियम भी ले लिया,जनता से भी थोड़ा-बहुत वसूला, थोड़ा व्यवस्था से भी, योजनाओं से भी जुगाड़ किया थोडा बहुत । सरकार का खाली पड़ा खजाना भर गया । मोटी फाइलें बनीं। टेंडर निकले। अनुबंध हुए। प्रेस नोट छपे। लम्बे चौड़े विज्ञापन आए। रंगीन होर्डिंग लगे,नेताजी का फोटो, हाथ में कार्ड, चेहरे पर मुस्कान जैसे खुद बीमारियों को भर्ती करके ठीक कर देंगे। अख़बारों में मुस्कराते चेहरों के साथ लिखा गया,“अब इलाज की चिंता छोड़िए।” जनता ने सचमुच चिंता छोड़ दी, लेकिन क्या करें अस्पतालों ने चिंता पकड़ ली।
निजी अस्पतालों को इस योजना में ऐसे जोड़ा गया जैसे बारात में गरीब रिश्तेदार को यह कहकर बुलाया जाए कि “तुम्हारे बिना शादी अधूरी है,” और फिर खाना खिलाने के समय कहा जाए,“जरा व्यवस्था में हाथ बँटा दो।” डॉक्टर लोग भी अपनी सात पीढ़ियों को भूखे मरने से बचाने के इंतज़ाम में इन योजनाओं की तरफ लपके l अस्पतालों ने डॉक्टर दिए, नर्सें दीं, मशीनें दीं, दवाइयाँ दीं, ऑपरेशन थिएटर खोले, अपनी रातें दीं, विशेषज्ञता दी,सब कुछ योजनाओं के चरणों में न्यौछावर,योजना ही माई -बाप।योजना हे जैसे बनी इनकी पालनहार l
मरीज आया तो उसे भर्ती किया गया। उसकी साँस बचाई गई, उसका ब्लड प्रेशर संभाला गया, उसका हड्डी-मांस-रक्त उसी वैज्ञानिक मेहनत से जोड़ा गया जिससे चिकित्सा चलती है। लेकिन यह क्या,जैसे ही इलाज का बिल सरकार की चौखट की ओर बढ़ा, वहाँ से अचानक इंसानियत के ठेकेदार जाग उठे। अस्पतालों पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे,“अरे भाई, डॉक्टर बने हो, अस्पताल खोला है, तो इलाज करना तुम्हारी जिम्मेदारी है! अब हमें देखने दो कि इलाज सही किया है या नहीं!”
“आपने मरीज का इलाज कर दिया,अब हमें छोड़ दो, हमें आता है अस्पतालों का इलाज करना।”
और जनाब, अस्पतालों का इलाज शुरू हुआ।
पहले फाइल देखी गई। फाइल में कागज़ देखा गया। कागज़ में स्याही देखी गई। स्याही में कमी देखी गई। फिर कमी में नियम ढूँढा गया और नियम में खामी निकालकर दावा खारिज कर दिया गया। “आपकी फाइल अधूरी है।” अस्पताल बोला,“क्या अधूरा है?” जवाब मिला,“तीसरे पन्ने का किनारा टेढ़ा है, चौथे पन्ने की स्कैनिंग हल्की है, पाँचवें पन्ने पर डॉक्टर के हस्ताक्षर में भावनात्मक गहराई नहीं दिख रही।”
कहा गया,“आपकी फाइल अधूरी है।”
अस्पताल ने विनम्रता से पूछा,“जनाब, क्या अधूरा रह गया?”
उधर से चश्मा सीधा करते हुए जवाब आया,“देखिए, पेज नंबर सात पर जो हस्ताक्षर हैं, उनमें दाहिने ओर की स्याही बाएँ ओर जितनी गाढ़ी नहीं है। संतुलन का अभाव है, और संतुलन ही तो प्रशासन की आत्मा है।”
अस्पताल ने हल्की खीज को पेशेवर मुस्कान में छिपाते हुए कहा,“मरीज का ऑपरेशन हुआ है, जान बची है, यह देखिए पूरा रिकॉर्ड।”
उत्तर आया,“रिकॉर्ड अपनी जगह है, पर पोर्टल पर अपलोड की गई पीडीएफ में तीसरे पन्ने का किनारा हल्का टेढ़ा है। नियम तो नियम है। सीधी लाइन में टेढ़ा किनारा अस्वीकार्य है।”
डॉक्टर ने ऑपरेशन किया, सरकार ने ऑब्जेक्शन। डॉक्टर ने जान बचाई, सिस्टम ने भुगतान रोका। अस्पताल अब ICU नहीं, फाइल-रूम में वेंटिलेटर पर था।
और यह सब होना ही था। सात पीढ़ियों के खाने-पीने का इंतज़ाम करने निकले अस्पताल संचालक अब दर-दर की ठोकरें खाते हुए यही सोच रहे हैं कि आखिर गलती इलाज करने में हुई या योजना में शामिल होने में। लेकिन आशा है कि आदमी का पीछा नहीं छोड़ती। सो अस्पताल वाले भी खुद को समझाते हैं,चलो भाई, देश है, व्यवस्था है, धैर्य रखो। व्यवस्था के हिसाब से मजबूर होकर फाइलों का ऊपर-नीचे होना, सेटिंग, जुगाड़, धन-प्रलोभन,सबको धीरे-धीरे चिकित्सा विज्ञान के नए अध्याय की तरह स्वीकार कर लिया जाता है।
”और जब फाइल नहीं चली तो फुसफुसाहटें चलीं,“थोड़ा ध्यान रखिए…” “ऊपर तक बात है…” “काम हो जाएगा…” यानी इलाज डॉक्टर करे, पैसा सरकार रोके, और रास्ता रिश्वत से खुले। जैसे कुआँ आपका, रस्सी आपकी, बाल्टी आपकी,और पानी पीने से पहले चौकीदार कहे,“पहले हमारा गला तर करो।”
इधर मरीज के परिजन कार्ड लहराते हुए आते हैं,उन्हें बताया गया था कि यह रामबाण है। लेकिन जब योजना भुगतान नहीं करती, अस्पताल तनाव में आता है, और कहीं परिणाम विपरीत हो जाए, तो अचानक भीड़ न्यायालय बन जाती है। “लापरवाही!” “मुआवजा!” “पचास लाख!”,जिसका भुगतान सरकार को करना था, उसका गुस्सा अस्पताल से वसूला जाता है।
यानी जिसने इलाज किया वही दोषी, जिसने भुगतान रोका वही कल्याणकारी।
हमारे यहाँ नियमों का सबसे बड़ा उपयोग काम करने में नहीं, काम रोकने में होता है। नियम इसलिए नहीं बनते कि जनता को सुविधा मिले; नियम इसलिए बनते हैं कि सुविधा माँगने वाला अपराधी जैसा महसूस करे। फाइलें ऐसे जाँची जाती हैं जैसे अस्पताल ने इलाज नहीं, राजद्रोह किया हो। हर अपलोड में कमी खोजी जाती है, हर दस्तावेज़ में दोष निकाला जाता है, हर दावे को ऐसे देखा जाता है जैसे डॉक्टर ने फीस नहीं, गाडी की किश्त माँग ली हो।
योजना का नाम विश्वास का, व्यवहार अविश्वास का। नाम सेवा का, ढाँचा सज़ा का। कागज़ पर जनकल्याण के चटखारेदार वायदे, और व्यवहार में सरकारी क्लेश, रोना-पीटना। जो अस्पताल मरीज बचा रहा है, वही भुगतान पाने के लिए अपराधी की तरह कटघरे में खड़ा है। जो डॉक्टर रात-रात जागकर इलाज कर रहा है, उसी के सिर पर फाइल, नोटिस, वसूली, निरीक्षण और अब तो गिरफ्तारी तक का भय लटका दिया गया है।
लगता है चिकित्सा विज्ञान अब एनाटॉमी, फिज़ियोलॉजी और फार्माकोलॉजी से नहीं, क्लेरिकल कर्मकांड से संचालित होगा। अगली बार शायद ऑपरेशन से पहले पूछा जाए,“सर्जन साहब, मरीज का पेट खोलने से पहले क्या आपने पोर्टल पर Appendix-A, Appendix-B और आत्मसमर्पण पत्र अपलोड किया? और हाँ, स्याही का रंग संतुलित है न?”
उधर मरीज का परिजन कार्ड लहराता हुआ आता है। वह मान बैठा है कि उसके हाथ में रामबाण है। उसे मंचों से यही बताया गया था। लेकिन जब बाद में योजना भुगतान नहीं करती, अस्पताल पर आर्थिक बोझ पड़ता है, तनाव बढ़ता है, और किसी जटिल केस में परिणाम प्रतिकूल हो जाए, तब अचानक चिकित्सा विज्ञान की जगह भीड़तंत्र प्रवेश कर जाता है। अस्पताल अब इलाज का केंद्र न रहकर कुश्ती का अखाड़ा बन जाता है।
वकील, नेता, स्वयंभू समाजसेवी, गली-मोहल्ले के न्यायाधीश,सब प्रकट हो जाते हैं। नारे लगते हैं,“लापरवाही!” “मुआवजा!” “पचास लाख से कम नहीं!” जिस रकम का भुगतान सरकार को करना था, उसका गुस्सा अस्पताल से वसूला जाता है। यानी जिसने इलाज किया वही दोषी, जिसने भुगतान रोका वही लोककल्याणकारी,वाह री जनकल्याणकारी व्यवस्था!
इस योजना ने एक अद्भुत त्रिकोण रचा है मित्र,मरीज को भ्रम मिला, डॉक्टर के भाग्य में अपमान और तिरस्कार आया, और अस्पताल को दिवालियापन। कार्ड जनता के हाथ में है, पर नियंत्रण बाबुओं के हाथ में। नारा मुफ्त इलाज का है, पर भुगतान अदृश्य है। भरोसा डॉक्टर पर है, पर भय भी उसी के हिस्से। सरकार ने जैसे घोषणा कर दी हो,“हम जनता को आशा देंगे, अस्पताल को आश्वासन देंगे, और भुगतान को स्थगन देंगे।”
अब डॉक्टरों को भी समझ में आने लगा है कि वे इलाज कम, जनता से वोट बटोरने की प्रयोगशाला अधिक बन गए हैं। उन्हें धीरे-धीरे यह बोध हो रहा है कि इस व्यवस्था में उनकी भूमिका वैसी ही है जैसी शादी में बैंड वाले की होती है,शोर पूरा उनका, प्रतिष्ठा बारात की, और भुगतान सबसे अंत में, वह भी मोलभाव के साथ।
ऐसे में यदि अस्पताल यह कहने लगें,“सरकार , आपकी आवश्यकता बड़ी है, हमारे संसाधन छोटे हैं, इस योजना का वास्तविक वैभव सरकारी अस्पतालों में अधिक खिलेगा, आप वहीं पधारें,”,तो इसे असंवेदनशीलता मत कहिएगा; यह आत्मरक्षा का संस्कारी रूप है। अस्पतालों को यह बात धीरे-धीरे समझ में आ रही है।
देखिए, विद्रोह सिर्फ नारों से नहीं होता। यह चुप्पी वाला विद्रोह होगा। यह सड़क पर कम, रेफरल स्लिप पर अधिक लिखा जाएगा। यह माइक पर कम, व्यवहार में अधिक दिखाई देगा। डॉक्टर अब समझ रहा है कि उसका स्टेथोस्कोप केवल धड़कन सुनने के लिए नहीं, व्यवस्था की कपटपूर्ण खड़खड़ाहट पहचानने के लिए भी है।
कार्ड बाँटना इलाज नहीं होता, पोस्टर छापना नीति नहीं होता। अस्पताल को धमकाकर स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं चलती। और डॉक्टर को क्लर्कों की भूल, पोर्टल की सनक और विभागीय भूख का बंधक बनाकर कोई राज्य कल्याणकारी नहीं कहलाता।
यह जो “खाली वायदों का कार्ड” है न,इसमें इलाज कम, चुनावी स्याही ज्यादा भरी है। इससे बीमारी नहीं भागती, सिर्फ़ जिम्मेदारी भागती है। मरीज आशा लेकर आता है, डॉक्टर मेहनत करता है, और अंत में सिस्टम दोनों को लाइन में खड़ा कर देता है,एक को इलाज के लिए, दूसरे को भुगतान के लिए।
और दोनों की बारी कभी नहीं आती।
अब समय आ गया है कि डॉक्टर बिखरे हुए व्यक्तियों की तरह नहीं, एक सचेत समुदाय की तरह सोचें। जो व्यवस्था उन्हें निचोड़कर भी सम्मान न दे, उसके लिए आत्मोत्सर्ग कोई पुण्य नहीं, मूर्खता है। सेवा का अर्थ आत्महत्या नहीं होता। करुणा का अर्थ अपमान सहते रहना नहीं होता। और चिकित्सा का अर्थ यह कदापि नहीं कि डॉक्टर हर उस झूठ का बोझ उठाए जो सरकार ने पोस्टर पर छपवा दिया है।
जनता को भी समझना होगा,कार्ड अगर वायदे से भरा है पर भुगतान से खाली, तो वह चिकित्सा का साधन नहीं, राजनीतिक जादू-टोना है। और जादू-टोने से न हड्डी जुड़ती है, न हृदय बचता है, न आईसीयू चलता है। वहाँ सिर्फ़ धुआँ उठता है,और इस धुएँ में सबसे पहले घुटता है डॉक्टर, फिर अस्पताल, और अंत में वही मरीज, जिसके नाम पर पूरा नाटक रचा गया था।
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