जाना मेरे सेवानिवृत्ति समारोह में
यूँ तो 36 साल की इस सर्विस में न जाने कितने सेवानिवृत्ति समारोहों में जा चुका हूँ… लेकिन जैसे मौत का एक दिन निश्चित होता है, वैसे ही अपनी सेवानिवृत्ति का भी एक दिन मुक़र्रर होता है। कुछ-कुछ ऐसा ही,जैसे अपनी ही मौत का तमाशा खुद देखने की मजबूरी।
दफ़्तर का माहौल आज कुछ ज़्यादा ही औपचारिक हो गया है। ऑफिस जानता है क्या करना है,दो ढोल वाले 501 रुपए में फिक्स कर दिए गए हैं। “आखिरी तनख़्वाह बैंक से निकलवा ली है, उसी में से 501 रुपए ढोल वाले को दे दिए…”,बॉस ने झिझकते हुए खुद देने को कहा, फिर मेरी झिझक पकड़कर बोले,“अरे टेंशन मत लो गर्ग जी, अच्छे बजाते हैं… पिछली बार शर्मा जी के वक़्त भी क्या बजाया था!”
मुझे लगा ढोल वालों ने शायद बॉस से ही ट्रेनिंग ली है,जैसे बॉस रोज़ हम सबकी बजाता रहा है।
समारोह में सजा-धजाकर मुझे मंच पर चढ़ा दिया गया है। गले में दो फूल मालाएँ भी डाल दी गई हैं,ताकि दूर से ही पहचान हो जाए कि “छुट्टी” किसकी हो रही है।
आगे की पंक्ति में स्टाफ की कुछ महिलाएँ बैठी हैं,चटक रंगों में, सजी-संवरी, गपशप और हँसी-ठिठोली का कोरस चल रहा है। ढोल की आवाज़ बीच-बीच में उनके सुरों में बाधा डालती है, तो ढोल को ही थोड़ा धीमा कर दिया जाता है। उनके हाथों में ऊन और सुइयाँ हैं,सेवानिवृत्ति की तरह धैर्य से स्वेटर बुनती हुईं, आपस में गलबहियाँ डाले।
कुछ युवा सहकर्मिणियाँ कान में इयरफोन ठूँसकर कोई कॉमेडी शो का पॉडकास्ट सुन रही हैं शायद। आगे की पंक्ति में बैठी कुछ महिलाएँ फोन पर बहस कर रही हैं,“बैंगन का भरता बनेगा या आलू के चिप्स?”,उनके लिए जैसे राष्ट्र का भविष्य इसी पर टिका हो। बीच-बीच में उनकी बुक्काफाड़ हँसी माहौल की मायूसी को थोड़ा कम कर देती है।
बाकी कर्मचारी कहीं कुर्सियों पर पसरे हैं, कहीं कॉरिडोर में टहलते हुए इस कार्यक्रम से मानसिक दूरी बनाए हुए हैं। साफ़ है,मेरी विदाई से उनका कोई लेना-देना नहीं, बस हाज़िरी लगानी है।
ढोल और कर्मचारियों के मोबाइल बराबर बज रहे हैं।
बॉस ने विदाई भाषण में एक गंभीर किस्म का चेहरा बनाते हुए बता दिया कि “इन्होंने मुझे कभी परेशान नहीं किया… बल्कि हमेशा मुझे मौका दिया इन्हें परेशान करने का…” साथ ही कर्मचारियों को सीख भी दे डाली,“अगर आप भी ऐसे ही भीरू चूहे जैसे जीव बनकर बॉस की हाँ में हाँ और ना में ना करते रहेंगे,दिन को दिन और रात को रात कहेंगे,तो आप भी इनकी जैसी गति पाएँगे।”
तालियों की करतल ध्वनि के बीच मुझसे कहा गया,“सर, आप भी कुछ गा दीजिए।”
मैं गले तक भर आए थूक को निगलकर कुछ गाने की कोशिश करता हूँ। भर्राई आवाज़ में “चल उड़ जा रे पंछी…” के कुछ बोल ही निकले थे कि बॉस का इशारा हुआ,“बस… बहुत हुआ।” मुझे लगा रिटायरमेंट सिर्फ वहम है,बॉस का आतंक मेरे घर तक भी जाने वाला है।
बॉस बार-बार घड़ी देख रहे हैं,सचिव का इंतज़ार हो रहा है। वो आएँगे,यह ज़रूरी नहीं। जैसे मेरे प्रमोशन के समय भी नहीं आए थे। एक मामूली से बाबू के लिए देश के भविष्य निर्माण की मीटिंग छोड़कर आना संभव नहीं होता।
मेरे बेटे भी तो नहीं आए,वे भी सफल हैं, व्यस्त हैं, और मेरी सेवानिवृत्ति से ज़्यादा महत्वपूर्ण कामों में लगे हैं। बहुओं को भेज दिया है,वो मुस्कुरा रही हैं। टाइम पास करने के लिए उनसे कुछ कहने को कहा गया,उन्होंने कहने-सुनने का कोटा शायद घर के लिए फिक्स कर रखा है।
मेरी पत्नी भी वहीं बैठी है। उनसे भी कुछ कहने को कहा गया,बोलीं, “37 साल से कह ही तो रही हूँ… सुनते कहाँ हैं ये!”
इसी बीच मेरी पाँच साल की पोती भी आ गई है,अपनी धीमी आवाज़ में गा रही है,“मामा तेरी मोरनी को मोर ले गए…” पूरे समारोह में यही एक आवाज़ है जो थोड़ा सुकून दे रही है।
मौका पाकर स्टाफ का एक स्वयंभू कवि भी मंच का माइक पकड़ लेता है। वह कविता पढ़ता है,न मेरे बारे में, न रिटायरमेंट के बारे में,बस यह साबित करने में लगा है कि यह कविता है। और उसकी इस ईमानदार कविता पर हूटिंग भी उतनी ही ईमानदारी से हो रही है।
सचिव का इंतज़ार करते-करते समय काटकर अब सम्मान की बारी आ गई है। एक बोनस चैक, एक शॉल, एक स्मृतिचिह्न मुझे पकड़ा दिया गया है। कुछ तालियाँ,जो अभी तक कुछ कर्मचारियों ने बचाकर रखी थीं,वो भी बजा दी गईं।
एक बार फिर बॉस ने ढेर सारा कृत्रिम धन्यवाद मुझे दे दिया है… समझ में नहीं आता,यह मेरी नौकरी के समय के लिए था या रिटायरमेंट ले लेने के लिए,किसके लिए था, मुझे पता नहीं।
अब मुझसे “दो शब्द” कहने के लिए कह दिया गया है।
दो शब्द!
क्या 36 साल की मेरी सर्विस दो शब्दों में समा जाएगी?
36 साल,फाइलों में दबे, नोटिंग में उलझे, बॉस की मुस्कान और झुंझलाहट के बीच फँसे हुए…शायद दो शब्द भी कहने का साहस मैं नहीं जुटा पा रहा हूँ। मैं दो शब्द न बोलने के लिए भी क्षमा माँगने की तैयारी में हूँ,
“मुझसे जो भी गलतियाँ हुईं… जानबूझकर या अनजाने में…
मुझे माफ़ कर दीजिए…”
कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ कि मेरी पेंशन की फाइल ज़रा जल्दी अप्रूव हो जाए, मेरा पीपीएफ समय पर मिल जाए ताकि भगवान को बोली गई सवामणी समय पर चढ़ा सकूँ और नवासी की शादी का भात भी समय रहते भर सकूँ। लेकिन यह सब अगर यहाँ कह दूँ तो लोग हँसेंगे, और आज जो इज़्ज़त मुझे रिटायरमेंट के नाम पर बख्शी जा रही है, उसे खोने का जोखिम मैं लेना नहीं चाहता। फिर भी एक सवाल भीतर कहीं लगातार कचोटता रहता है,अब क्या ?
सामने नज़र जाती है तो पत्नी के सपनों की लंबी सूची दिखाई देती है। वह उँगलियों पर गिन रही है,चार धाम, ज्योतिर्लिंग, तिरुपति, शिरडी, वैष्णो देवी, अमरनाथ, कैलाश मानसरोवर। और मैं सोचता हूँ कि इन शहर की गलियों को छोड़कर अब कहाँ जाऊँ। अनायास ही पीछे मुड़कर देखता हूँ तो निगाह ऑफिस की अलमारियों में रखी फाइलों पर चली जाती है। जिनसे मैं अब तक दूर भागता रहा, वही आज जैसे मुझे बुला रही हैं।
हाथ में दिया गया गिफ्ट मैं चुपके से छुपा लेता हूँ कि कहीं बॉस जाते-जाते इसे वापस न ले लें। तभी बॉस आवाज़ लगाते हैं कि “अरे गर्ग साहब, इसे खोलकर देखिए तो सही, हमने क्या भेंट किया है। “
मजबूरी में गिफ्ट खोलता हूँ तो उसमें एक पानी की कैन निकलती है। मन ही मन हँसी भी आती है और थोड़ी चुभन भी होती है कि अब तक ऑफिस में पानी भरता था, अब घर पर भी यही करना है, शायद यही इस सम्मान का प्रतीक है। उधर ढोल वाले , पाँच सौ रुपए में तय हुए थे लेकिन कह रहे हैं कि उन्होंने हजार रु का बजा दिया और मुझसे पाँच सौ रुपए बख्शीश के भी माँग रहे हैं।
समारोह अपने अंतिम दौर में पहुँच चुका है। अब मुझे नचाया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे छत्तीस साल नचाया गया, बस फर्क इतना है कि तब आदेश फाइलों के रूप में आते थे और अब ढोल की थाप पर। बेमौसम की होली की तरह रंग और गुलाल मेरे चेहरे पर मल दिया गया है। गुझिया, जलेबी, समोसे और ठंडाई का इंतज़ाम भी हुआ है, पर वह भी मेरे ही जेबखर्च से मँगवाकर मुझसे ही मुंह मीठा कराया जा रहा है। बाहर सब कुछ रंगीन और उत्सव जैसा है, लेकिन भीतर कहीं एक कड़वाहट ठहरी हुई है, एक खालीपन, जो ढोल की तेज आवाज़ में भी दब नहीं पा रहा।
जब ठंडाई का एक घूँट लेता हूँ तो अचानक महसूस होता है कि यह कोई साधारण मिठास नहीं है, बल्कि अपनी ही यादों का कड़वा घूँट है, जिसे मैं धीरे-धीरे, चुपचाप पी रहा हूँ।
रचनाकार –डॉ मुकेश असीमित
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