छतरियों के साये में-कविता रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 13, 2025 हिंदी कविता 0

बरसात की एक शाम, एक बूढ़ा अपनी बीमार पत्नी को लिए डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर खड़ा है। डॉक्टर छतरी देता है, पर बूढ़े की आँखों की बारिश नहीं रुकती। यह कविता सामाजिक विषमता, करुणा और आत्मचिंतन की सघन अनुभूति कराती है।

आजाद गजल -क्या मिला!

Prahalad Shrimali Jul 10, 2025 गजल 2

प्रह्लाद श्रीमाली की यह रचना हास्य और कटाक्ष के माध्यम से सामाजिक व्यवहारों, ढकोसलों और राजनीतिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य करती है। 'क्या मिला?' के सवाल के साथ यह रचना हमें अपने ही कर्मों, परंपराओं और सोच पर पुनर्विचार करने को मजबूर करती है।

उठ ,चल ,फिर दौड़-Poems-Hindi

Vidya Dubey Jul 10, 2025 हिंदी कविता 2

यह कविता जीवन के संघर्ष, आत्मविश्वास और लक्ष्य साधना की प्रेरणा देती है। गिरने, थमने और लड़खड़ाने के बीच भी उठकर आगे बढ़ते रहने की बात करती है। यह पसीने को मेहनत का मोती मानती है और हार को मंजिल की सीढ़ी।

सैनिकों को सलाम-Poem-Hindi

Babita Kumawat Jul 9, 2025 Poems 8

"ये कविता मातृभूमि की रक्षा में तैनात भारत माँ के लाड़ले सैनिकों को समर्पित है। जो अपने प्राणों की आहुति देकर तिरंगे की शान को ऊँचा रखते हैं। इनका स्वाभिमान, जज़्बा और शहादत भारत के गौरव के प्रतीक हैं। राष्ट्र सदा इनकी ऋणी रहेगा।"

वाह भाई वाह -कविता -हास्य व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 7, 2025 हिंदी कविता 0

सामाजिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य करती ये कविता ‘वाह भाई वाह’ हमें उन विसंगतियों का एहसास कराती है जहाँ ज़िंदगी त्रासदी बन चुकी है, फिर भी आमजन तमाशबीन बना बैठा है। गड्ढों, महंगाई, रिश्तों की दूरी और शिक्षा की मार के बीच भी मुस्कुराता देश – ‘वाह भाई वाह’!

एक पत्थर की कहानी -कविता रचना

Vidya Dubey Jul 7, 2025 हिंदी कविता 1

विद्या पोखरियाल की यह कविता "पत्थर हूं मैं" जीवन की विसंगतियों को एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पत्थर कभी पूजित है, कभी ठुकराया गया। मंदिर, नदी, पहाड़ और रास्ते — हर स्थल पर उसका एक अलग अस्तित्व है। यह साधारण होते हुए भी असाधारण है।

हां मैं एक औरत हूं-Kavita-Hindi

Vidya Dubey Jul 5, 2025 Poems 6

यह कविता स्त्री के संघर्ष, सहनशीलता और उसकी शक्तियों का गान है। माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, देवी — हर भूमिका में वह समाज की नींव है। वह कमजोर नहीं, संसार की रचयिता है। उसकी जात सिर्फ 'औरत' नहीं, एक सम्पूर्ण सृष्टि है। यही उसका आत्मघोष है: हां मैं एक औरत हूं।

मैं तेरे नाम से-कविता -हिंदी

Vidya Dubey Jul 3, 2025 Poems 2

विद्या पोखरियाल की यह कविता एक माँ की गहन भावनाओं की अभिव्यक्ति है, जो अपने बच्चे के नाम से अपना अस्तित्व गढ़ना चाहती है। वह उसका पथप्रदर्शक बनना चाहती है, उसका संसार संवारना चाहती है और हर कठिनाई में साथ निभाने को तत्पर है — पूर्ण समर्पण की अद्वितीय अभिव्यक्ति।

सावन आया-हिंदी कविता

Uttam Kumar Jul 3, 2025 Poems 2

इस कविता में सावन का रसभीना चित्र है—जहाँ झूले हैं, कजरी है, और बदरा की फुहारें हैं, वहीं किसी के पिया की दूरी आँखों में तड़प बनकर उतरती है। यह रचना सावन की सौंदर्याभिव्यक्ति और विरह के भाव का सुंदर संगम है।

मैं बच्चा हूँ, ट्रॉफी नहीं-कविता -डॉ मुकेश असीमित

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 30, 2025 Poems 1

यह कविता एक बच्चे की अंतरात्मा की पुकार है—जो केवल अपने लिए जीना चाहता है, किसी की महत्वाकांक्षा की ट्रॉफी बनकर नहीं। वह अपने सपनों को जीना चाहता है, न कि दूसरों के अधूरे सपनों को ढोना। उसमें संवेदना है, विद्रोह है और मानवता की गूंज है।