चल रे हंसा देश पराया | Soulful Kabir Nirgun Bhajan | जीवन और माया का संदेश

चल रे हंसा, देश पराया — जीवन, माया और आत्मा की यात्रा पर एक निर्गुण भजन

“चल रे हंसा, देश पराया,
काहे जग में मन भरमाया।
चार दिनों का खेल तमाशा,
फिर किसने किसको पाया॥”

जीवन की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि हम जिस संसार को स्थायी मानकर उसमें इतने गहरे उलझते चले जाते हैं, वही संसार एक दिन पीछे छूट जाता है। रिश्ते, धन, वैभव, प्रतिष्ठा, घर-द्वार, उपलब्धियाँ—सब यहीं रह जाते हैं। आगे बढ़ती है केवल वह चेतना, जिसे संत परंपरा ने कभी “हंस”, कभी “जीव”, तो कभी “आत्मा” कहा।

इसी भावभूमि से जन्मा है मेरा नया निर्गुण भजन—“चल रे हंसा, देश पराया”

हंस — केवल पक्षी नहीं, आत्मा का प्रतीक

भारतीय संत और निर्गुण परंपरा में “हंस” का विशेष आध्यात्मिक अर्थ है। हंस उस आत्मा का प्रतीक है जो इस संसार में कुछ समय के लिए आती है, अनुभव करती है, मोह में पड़ती है, सीखती है और अंततः अकेली आगे बढ़ जाती है।

यही कारण है कि भजन का मुखड़ा सीधे मन से प्रश्न करता है—

“काहे जग में मन भरमाया?”

हम जीवन भर किसके पीछे भागते रहे? जो कुछ जोड़ा, उसमें से वास्तव में हमारा क्या रहा? और जो भीतर था, क्या उसे कभी जाना?

चार दिनों का खेल तमाशा

“चार दिनों का खेल तमाशा” कोई निराशावादी पंक्ति नहीं है। इसका आशय यह है कि जीवन सीमित है, इसलिए उसे अधिक सजगता से जिया जाए।

समय सीमित है, इसलिए प्रेम को टालें नहीं।
मन सीमित है, इसलिए उसमें व्यर्थ की कटुता न भरें।
जीवन सीमित है, इसलिए केवल संग्रह में न बीत जाए।

निर्गुण संतों की वाणी बार-बार यही स्मरण कराती है कि संसार को छोड़कर भागना आवश्यक नहीं, लेकिन संसार को ही अंतिम सत्य मान लेना भी भूल है।

माया का अर्थ केवल धन नहीं

हम अक्सर “माया” का अर्थ केवल धन-दौलत समझ लेते हैं, जबकि माया कहीं अधिक व्यापक है।

अपनी पहचान का अहंकार, मान-सम्मान की लालसा, संबंधों पर अधिकार, नाम की भूख, उपलब्धियों का गर्व और “मेरा” कहने की आदत—ये सब भी माया के रूप हैं।

भजन की पंक्तियाँ इसी मोह की परतें खोलती हैं—

“माटी चुन-चुन महल बनाया,
नाम लिखा दरवाजे…”

मनुष्य अपने नाम को स्थायी करने की कोशिश करता रहता है, जबकि समय की अपनी गति है। यही बोध मनुष्य को विनम्र बनाता है।

साथ क्या जाएगा?

भजन का केंद्रीय प्रश्न यही है।

धन नहीं।
महल नहीं।
पद नहीं।
प्रतिष्ठा नहीं।

तो फिर क्या?

करनी, प्रेम, स्मृति और नाम की कमाई।

“नाम” का अर्थ केवल किसी मंत्र का उच्चारण भर नहीं, बल्कि भीतर की सजगता, सत्य, प्रेम और उस परम तत्व की स्मृति भी है।

इसीलिए अंतिम मुखड़े में भाव आता है—

“नाम कमाई साथ चलेगी,
बाकी सब रह जाया॥”

गुरु-बोध का महत्व

निर्गुण परंपरा में गुरु बाहर से अधिक भीतर देखने की दृष्टि देता है।

जब मनुष्य हर उत्तर बाहर खोजते-खोजते थक जाता है, तब प्रश्न भीतर मुड़ता है।

मैं कौन हूँ?
जिसे “मेरा” कह रहा हूँ, वह कितना स्थायी है?
और जिस परम सत्य को खोज रहा हूँ, क्या वह वास्तव में मुझसे दूर है?

भजन में यही भाव आता है—

“गुरु ने कहा—मन भीतर देखो,
वहीं साहिब का डेरा…”

यही भीतर की यात्रा इस गीत को केवल भजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन बनाती है।

संगीत की शैली

इस गीत को soothing, soulful, मध्यम गति वाले Kabir Nirgun folk style में संगीतबद्ध किया गया है। संगीत में जानबूझकर सरलता रखी गई है, ताकि शब्द आगे रहें और वाद्य पीछे।

निर्गुण संगीत का सौंदर्य अक्सर उसकी सादगी में होता है—जहाँ एक तानपुरा, एक इकतारा, हल्की ढोलक, बाँसुरी या सारंगी भी गहरे भाव पैदा कर सकती है।

इस गीत में भी उसी सहज, लोक-सुगंधित और चिंतनशील वातावरण को बनाए रखने का प्रयास किया गया है।

पूरा गीत सुनें

🎵 “चल रे हंसा, देश पराया” — Soulful Nirgun Bhajan

पूरा गीत YouTube पर सुनें:

YouTube Channel: Dr Mukesh Aseemit Creations | Music with Mukesh

गीत की कुछ पंक्तियाँ

चल रे हंसा, देश पराया,
काहे जग में मन भरमाया।
चार दिनों का खेल तमाशा,
फिर किसने किसको पाया॥

काया तेरी कच्ची गगरी,
साँस भरी है पानी,
एक झकोरा ऐसा लागे,
रह जाए सब कहानी।

मन का दीप जला ले प्यारे,
जब तक साँस समाया,
चार दिनों का खेल तमाशा,
फिर किसने किसको पाया॥

अंत में

यह गीत मृत्यु की चर्चा नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से देखने का निमंत्रण है।

सवाल यह नहीं कि एक दिन क्या छूट जाएगा।
सवाल यह है कि जब तक हमारे पास समय है, तब तक हम क्या जोड़ रहे हैं—

धन या प्रेम?
अहंकार या विनम्रता?
शोर या नाम?
संग्रह या सार?

शायद इसी प्रश्न में निर्गुण की पूरी यात्रा छिपी है।

चल रे हंसा… देश पराया।

यदि गीत का भाव आपको छुए, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ साझा करें। हो सकता है किसी के जीवन में आज यही एक पंक्ति आवश्यक हो।

Dr Mukesh Aseemit

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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