धर्म में गिरने के नए कीर्तिमान | धार्मिक पाखंड पर तीखा हिंदी व्यंग्य

धर्म में गिरने के नए कीर्तिमान

इन दिनों धर्म के क्षेत्र में संभावनाएँ बहुत बढ़ गई हैं। पहले आदमी को गिरना हो तो राजनीति, अपराध, व्यापार या दलाली जैसे परंपरागत क्षेत्रों की तरफ देखना पड़ता था। अब धर्म ने भी बड़े उदार मन से अपने दरवाजे खोल दिए हैं। व्यापारी आइए, दबंग आइए, राजनीतिक महत्वाकांक्षी आइए, कॉरपोरेट घराने आइए, मनोरंजन उद्योग से निराश कलाकार आइए,यहाँ सबके लिए जगह है। धर्म इतना समावेशी हो गया है कि गिरा हुआ आदमी भी यहाँ आकर घर जैसा महसूस करता है। बल्कि कई बार तो लगता है कि आयोजन इसी उद्देश्य से डिजाइन किए गए हैं कि आदमी अपनी पुरानी गिरावट से ऊब चुका हो तो यहाँ आकर गिरने के कुछ नए आयाम स्थापित कर सके। पहले धार्मिक आयोजन में आदमी माथा टेकने जाता था, अब अगर माथा सही-सलामत लेकर घर लौट आए तो समझिए धार्मिक यात्रा सफल रही। अभी पिछले दिनों मैं अस्पताल की ओपीडी में बैठा मरीज देख रहा था कि अचानक ऐसी कानफोड़ू आवाज हुई कि लगा किसी ने मेरे कान में लाउडस्पीकर फिट कर दिया है। बाहर धर्म की रैली निकल रही थी। ट्रैक्टर पर इतने स्पीकर बँधे थे कि यदि ईश्वर सचमुच सर्वव्यापी हैं तो उन्हें भी उस दिन अपने किसी शांत कोने में छिप जाना पड़ा होगा। मुझे हमेशा लगता था कि भगवान तक मौन प्रार्थना भी पहुँच जाती है, लेकिन आयोजकों ने मेरी आध्यात्मिक जानकारी को अपर्याप्त सिद्ध कर दिया। मैंने एक से पूछा, “भाई, इतनी तेज आवाज क्यों?” वह मुझे ऐसे देखने लगा जैसे मैंने ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न दाग दिया हो। बोला, “आप जैसे लोगों की वजह से धर्म का नाश हुआ है।” मैं समझ गया कि आस्था का वॉल्यूम कम नहीं किया जा सकता। धर्म का जितना गहरा संबंध आत्मा से है, उतना ही शायद अब एम्प्लीफायर से भी हो गया है। धर्म की पताका फहराना आसान काम नहीं है भाईसाहब, उसके लिए आसपास के तीन मोहल्लों को यह जानकारी देना जरूरी है कि आप धार्मिक हैं। शांत आदमी पर आजकल वैसे भी संदेह होता है कि कहीं नास्तिक तो नहीं। पंडाल भी पहले जैसे कहाँ रहे। हमने विकास किया है, और धर्म के क्षेत्र में विकास का पहला प्रमाण है कि पंडाल अब पूजा से ज्यादा इवेंट मैनेजमेंट का केंद्र दिखता है। एक पंडाल में मैं केवल यह देखने गया कि जो चंदा दिया था, उसका सदुपयोग किस प्रकार हो रहा है। वहाँ ऐसा अभिनव प्रयोग चल रहा था कि मैं तय नहीं कर पा रहा था कि हाथ जोड़ूँ या आँखें बंद करूँ। मंच पर एक ऐसी प्रस्तुति थी जिसे आयोजक सांस्कृतिक कार्यक्रम कह रहे थे और दर्शक सीटियाँ बजाकर उसकी धार्मिक पुष्टि कर रहे थे। मुझे लगा शायद यह व्यवस्था इसलिए की गई है कि  कुछ फर्जी भक्त आँखें खोलकर भगवान के दर्शन करते हैं जबकि असली भक्ति में आँखें बंद होनी चाहिए; अतः आयोजकों ने ऐसी प्रस्तुति रख दी है कि भक्त स्वयं विवश होकर आँखें बंद कर लें। क्या अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग! मंच पर आइटम नंबर, सामने गणेशजी, बीच में मोबाइल कैमरे, किनारे सीटियाँ, इधर फब्तियाँ,भक्ति और मनोरंजन का ऐसा फ्यूजन कि भारतीय संस्कृति स्वयं पीछे खड़ी सोच रही होगी कि मेरा इसमें हिस्सा कौन-सा है। गणेशजी शांत बैठे थे। देवता होने का सबसे बड़ा लाभ शायद यही है कि मनुष्य की हरकतों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं देनी पड़ती। मुझे तो उनके चेहरे को देखकर लगा कि बेचारे बप्पा को यहाँ साक्षी बनाकर बिठा दिया गया है ताकि जो कुछ हो, उसे धार्मिक वैधता मिलती रहे। वे जाना चाहते होंगे, भागना चाहते होंगे, पर जाएँ भी तो कैसे,अभी पूरे दस दिन बाकी हैं। मैंने एक भक्त से पूछा, “यह सब गणेशजी के सामने?” वह बोला, “भाईसाहब, भीड़ भी तो जुटानी पड़ती है।” बात में दम था। पहले भीड़ जुटेगी, फिर उद्घाटन होगा, फिर मुख्य अतिथि आएँगे, फिर नृत्य, फिर फोटो, फिर रील, फिर प्रसाद और यदि भगवान भाग्यशाली रहे तथा समय बच गया तो थोड़ी-बहुत आरती भी हो जाएगी। कौन-सी जल्दी है, उत्सव दस दिन चलेगा। धर्म का प्रबंधन अब आधुनिक हो चुका है। किसी आयोजन की सफलता यह देखकर नहीं आँकी जाती कि कितने लोग श्रद्धा से आए। अब पैमाने दूसरे हैं,कितने ट्रैक्टर थे, कितने डीजे थे, कितनी रीलें बनीं, सड़क कितनी देर बंद रही, कितनी पुलिस लगी और भीड़ को व्यबस्थित करने में कितने पुलिस के डंडे पड़े । जिस जुलूस से ट्रैफिक सामान्य चलता रहे, आयोजकों को भीतर ही भीतर संदेह होता है कि शायद आयोजन सफल नहीं हुआ। धार्मिक प्रभाव का असली प्रमाण तब मिलता है जब पीछे एम्बुलेंस खड़ी हो और आगे भक्त नाच रहा हो। एम्बुलेंस वाला हॉर्न बजाए तो भक्त पलटकर नाराज,“दिखता नहीं धार्मिक कार्यक्रम चल रहा है?” मरीज की पड़ी है; धर्म की यात्रा पहले निकलेगी। भीतर पड़ा मरीज शायद यही प्रार्थना कर रहा होगा,“हे प्रभु, इनकी यात्रा सफल करना, मेरी अभी मत पूरी करना।” रास्ते में टीन शेड आ जाए तो तोड़ दो, तार नीचे हो तो काट दो, दुकान का बोर्ड सामने आए तो हटवा दो, छज्जा रास्ते में हो तो मालिक को समझाओ,“भाई, धर्म का काम है।” धर्म का काम आते ही दूसरे की संपत्ति थोड़ी सार्वजनिक हो जाती है। समिति के लोग बड़े चिंतित थे कि बाबा की रैली के रास्ते में तीन टीन शेड, दो तार और एक दुकान का बोर्ड आ रहा है। किसी भोले सदस्य ने मूर्खतापूर्ण सुझाव दे दिया,“मार्ग बदल लेते हैं।” उसे ऐसे देखा गया जैसे उसने वेदों में संशोधन प्रस्ताव रख दिया हो। धर्म की रैली मार्ग बदलेगी? नहीं भाई, नगर नियोजन पुनर्जन्म लेगा, पर रैली का रास्ता वही रहेगा। दुकानदार कहे कि नुकसान होगा तो उसे त्याग का महत्व समझाया जाएगा। धर्म के नाम पर दूसरे की जेब से त्याग करवाना सबसे आसान अध्यात्म है। अपनी दुकान टूटे तो हम बीमा कंपनी और पुलिस दोनों को फोन करते हैं, दूसरे की टूटे तो कहते हैं,“इतना भी धर्म के लिए नहीं कर सकते?” पंडालों के पीछे भी एक समानांतर अध्यात्म विश्वविद्यालय चलता है। सामने आरती, “गणपति बप्पा मोरया”, पीछे “तीन पत्ती खेल”; सामने प्रसाद, पीछे हिसाब। किसी ने बताया कि जीत का थोड़ा प्रतिशत बाबा को चढ़ता है। मैं प्रभावित हुआ। यानी गलत काम से प्राप्त धन का कुछ हिस्सा भगवान को दे दिया जाए तो नैतिक बैलेंस शीट बराबर हो जाती है। मैंने पूछा, “हार गए तो?” उत्तर मिला, “भाग्य खराब।” अर्थात जीत बाबा की कृपा, हार अपनी किस्मत। भगवान सचमुच सबसे सुरक्षित विभाग संभाल रहे हैं,श्रेय उनका, जिम्मेदारी आपकी। व्यापारियों ने भी धर्म में अद्भुत अवसर खोज लिए हैं। एक आदमी भक्त कम, प्रायोजक ज्यादा दिखाई देता है। पंडाल में भगवान की प्रतिमा छोटी और प्रायोजक का फ्लेक्स बड़ा। नीचे लिखा है,“सौजन्य से…” कभी-कभी लगता है कि आयोजन देवता का है और ब्रांड एम्बेसडर व्यापारी है। राजनीतिक आदमी भी यहाँ बहुत सहज रहता है; उसे मंच चाहिए, माइक चाहिए, भीड़ चाहिए और कैमरा चाहिए,इसके बाद भगवान बोनस हैं। दो मिनट आरती, बीस मिनट भाषण। आयोजक घोषणा करेगा,“धर्मप्रेमी नेता जी।” नेता जी प्रसन्न, आयोजक प्रसन्न, कैमरा प्रसन्न, भगवान फिर वही शांत। दबंगों के लिए भी धर्म ने उचित स्थान बनाया है। जिसका मोहल्ले में थोड़ा दबदबा हो, उसे आयोजन समिति में डाल दीजिए। उसके बाद चंदा पूरी तरह स्वैच्छिक होता है,बस आपकी स्वेच्छा की राशि समिति पहले से तय करके आती है। दुकानदार पाँच सौ कहे तो सामने वाला मुस्कराता है,“इतना बड़ा कारोबार है आपका…” यह मुस्कान ही धार्मिक रसीद है। दुकानदार तत्काल आध्यात्मिक हो जाता है और हजार निकाल देता है। हमने धर्म को कितना आधुनिक बना दिया है,भक्ति में बेस चाहिए, श्रद्धा में डीजे, आस्था में स्टेज, त्याग में स्पॉन्सर, सेवा में सेल्फी, दान में बैनर, जुलूस में रोड ब्लॉक और प्रसाद में प्रचार। जिस आयोजन में पड़ोसी परेशान न हो, बूढ़े की नींद न टूटे, मरीज को दिक्कत न आए, ट्रैफिक न रुके और किसी की संपत्ति न टूटे, उसे शायद हम छोटा धार्मिक आयोजन मानने लगे हैं। धर्म का प्रभाव अब आत्मा पर कम और सार्वजनिक व्यवस्था पर अधिक दिखाई देना चाहिए। अश्लीलता को “सांस्कृतिक कार्यक्रम” कह दीजिए, दबंगई को “धार्मिक उत्साह”, चंदे के दबाव को “सहयोग”, सड़क जाम को “श्रद्धालुओं की भारी भीड़”, कानफोड़ू डीजे को “भक्तिमय वातावरण”, तोड़फोड़ को “मार्ग व्यवस्था”, जुए के हिस्से को “चढ़ावा” और अपने फोटो वाले बीस फुट के बैनर को “धर्म सेवा।” भाषा का यही चमत्कार है,गिरावट वही रहती है, नाम बदलते ही पुण्य जैसी दिखाई देने लगती है। अब मुझे पूरा भरोसा है कि मनुष्य चाहे तो धर्म में भी गिरने के नए कीर्तिमान बना सकता है। बस गिरते समय हाथ में धार्मिक झंडा होना चाहिए। फिर गिरना गिरावट नहीं, उत्साह कहलाता है। इतना गिरिए कि रास्ता बंद हो जाए, इतना गिरिए कि दूसरे की छत टूट जाए, इतना गिरिए कि भक्ति के मंच से फूहड़ता परोसी जाए, भगवान के पंडाल के पीछे जुए की बाजी चले, एम्बुलेंस में मरीज पड़ा रहे और सामने डीजे पर भक्त नाचता रहे; फिर छाती ठोककर कहिए,“हम धर्म के लिए कर रहे हैं।” बस इतना कहते ही बाकी सारे प्रश्न अधार्मिक हो जाते हैं। हमने धर्म को कितना ऊँचा उठाया, यह तो नहीं मालूम, लेकिन उसके नाम पर गिरने की गहराई जरूर ऐसी बढ़ा दी है कि अब नीचे देखकर स्वयं गिरावट को चक्कर आने लगे हैं।

, डॉ. मुकेश असीमित

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 0)

Join the conversation and share your thoughts

Comments are closed for this post.

No comments yet

Be the first to share your thoughts!