मैं गिरना चाहता हूँ?
इन दिनों मैं गिरना चाहता हूँ।
बहुत दिनों से उठने की कोशिश कर रहा था। अब थक गया हूँ।
आदमी आखिर कब तक उठता रहे? सच कहूँ तो उठने की इस बीमारी से अजीज आ गया हूँ। इसी तरह उठता रहा तो कहीं एक दिन सचमुच ही न उठ जाऊँ। उठने के अवसर वैसे भी दिखाई नहीं दे रहे। जहाँ देखो, वहाँ गिरने के अवसर ही अवसर हैं। ऐसे में भला मैं गिरने की क्यों न सोचूँ?
वैसे भी उठना अब पुरानी कला है। गिरना आधुनिक कौशल है। गिरना भी अब गलती से नहीं होता, आजकल बाकायदा प्लानिंग से गिरना पड़ता है। यहाँ भी बड़ी भीड़ है। गिरने के लिए लाइन लगी हुई है। जहाँ देखो, अफरातफरी मची है,पहले मैं, पहले मैं। जैसे गिरने का मौका नहीं, कोई सरकारी भूखंड बँट रहा हो।
जिसे मौका मिल गया, वह ठीक; जिसे नहीं मिला, वह पक्षपात का आरोप लगा रहा है,
“यार, बताइए! इन्हें गिरने का मौका दे दिया, जबकि इनका तो पिछला रिकॉर्ड भी बिल्कुल साफ था। हम पार्टी के लिए इतना गिरे, फिर भी हमें टिकट ही नहीं दिया। एक बार मौका तो देते, पाँच साल तक खुद भी गिरते और पार्टी को भी गिराते।”
लीजिए, मैं भी उन्हीं की लाइन में लग गया हूँ।
देख रहा हूँ कि कोई मौका मिले। जो पहले से गिर चुके हैं, उनसे कोई तरकीब पूछूँ। लेकिन कोई बात ही नहीं करना चाहता। सब गिरने में इतने व्यस्त हैं।
एक ने बस इतना कहा,
“आप आत्मनिर्भर बनिए यार! खुद खोजिए कि कहाँ गिर सकते हैं। बस इतना ध्यान रखिए कि गिरने से पहले गहराई अच्छी तरह देख लेना। ऐसा न हो कि जहाँ गिरो, वहाँ नीचे कोई तल ही आ जाए और आप ढंग से गिर भी न पाओ। गिरो तो ऐसे कि गिरने के बाद उठना चाहो, तब भी उठ न पाओ। असली गिरना वही है, बंधु!”
वह मुझे इतना ज्ञान तो दे गया, लेकिन इतना नहीं किया कि साथ ले चलता और मुझे भी कहीं गिरवा देता।
लेकिन मैंने कमर कस ली।
मैं ऐसा गिरना चाहता हूँ कि लोग कहें,
“वाह! आदमी गिरा नहीं, गिरावट को नई ऊँचाई दे गया।”
बस दिक्कत यह है कि गिरूँ कहाँ?
गिरावट का भी तो क्षेत्र-चयन होता है। मैं करियर काउंसलिंग के लिए निकल पड़ा।
एक मेरा शुभचिंतक मिला। गिरने के मामले में उसके नाम भी कई रिकॉर्ड दर्ज हैं। उसे कई क्षेत्रों में गिरने का अनुभव है, इसलिए मैंने उसी से सलाह लेना उचित समझा।
मैंने पूछा,
“भाई, गिरना चाहता हूँ। कौन-सा क्षेत्र ठीक रहेगा?”
वह कुछ देर मुझे देखता रहा।
मैंने अपनी बात फिर दोहराई।
उसने बड़ी गंभीरता से सिर हिलाया।
“स्कोप बहुत है।”
सबसे पहले उसने पत्रकारिता सुझाई।
बोला,
“यार, यहाँ गिरावट का बड़ा सुंदर प्रावधान है। जितना आप नीचे गिरोगे, उतनी टीआरपी ऊपर जाएगी।”
उसने समझाया कि कुछ ज्यादा मेहनत भी नहीं है। बस तथ्यों को तिलांजलि देनी है, लोगों को भटकाना है, मनगढ़ंत खबरें चलानी हैं और भावनाओं के साथ खेलना है।
शुरुआत मुद्दाहीन बहसों से कर सकते हैं। यहाँ तो गिरने की असीम संभावनाएँ हैं। चार लोगों को बुलाइए। उन्हें गिराइए, गरियाइए, बोलने मत दीजिए। बस इतना कर लीजिए, पत्रकारिता की गिरावट में आप एक नया आयाम स्थापित कर सकते हैं।
उसने मुझे पत्रकारिता में गिरावट के स्तर भी समझाए।
“बेसिक स्तर पर झूठी खबरें। अगले स्तर पर भाषा के गिरते स्तर के साथ अपनी गिरावट का तालमेल बैठाइए। जब आपकी गिरावट लोगों को साफ दिखाई देने लगे, तब डिबेट में गिरे हुए लोगों को बुलाकर उनसे कहलवाइए कि देखिए,देश का स्तर कितना गिर गया है।”
फिर उसने समझाया,
“यह भी शेयर बाजार की तरह काम करता है। जैसे गिरते बाजार में लोग कमाते हैं, वैसे ही गिरते स्तर से भी अच्छा-खासा मुनाफा काटा जा सकता है। गिरते पत्रकारिता-स्तर से टीआरपी की चाँदी काटी जा सकती है।”
वह देख रहा था कि मैं कुछ ज्यादा कन्विंस नहीं हुआ हूँ।
मुझे थोड़ा संदेह में देखकर मित्र ने दूसरा क्षेत्र सुझाया,
“पत्रकारिता छोड़ो। राजनीति में आ जाओ। यहाँ जो पहले जितना ज्यादा उठा हुआ है, उसे उतना ही गहरा गिरने का मौका दिया जाता है।”
मैंने पूछ लिया,
“अच्छा, यहाँ कितना गिर सकते हैं?”
वह बोला,
“देखिए, यहाँ हो सकता है कि एक बार में आप बहुत ज्यादा न गिर पाएँ, लेकिन राजनीति बार-बार गिरने का मौका देती है।”
यह क्षेत्र मुझे तत्काल आकर्षक लगा।
उसने कहा,
“यहाँ गिरावट एक रणनीतिक मूव है। पहले थोड़ा गिरो, फिर उछलो, और जो कीचड़ साथ लाए हो, उसे विरोधियों पर उछाल दो।”
मैंने पूछा,
“अर्थात खुद भी गिरें और दूसरों को भी गिराएँ?”
वह प्रसन्न होकर बोला,
“बहुत समझदार हैं आप। बात पकड़ रहे हैं। आप बहुत गहरा गिरेंगे।”
उसने आगे समझाया,
“यहाँ गिरने के कई मौके हैं। वादों से गिर सकते हैं, बयानों से गिर सकते हैं, सिद्धांतों से गिर सकते हैं, अपनी भाषा से गिर सकते हैं। यानी गिरने का प्रयास कई दिशाओं में एक साथ किया जा सकता है।”
“फिर आप एक पार्टी से दूसरी पार्टी में गिरकर पहुँच सकते हैं। लांछन, झूठे बयान, अवसरवादिता और जातिवाद का ज़हर फैलाकर अपनी गिरावट को और अधिक सुनिश्चित कर सकते हैं।”
मैंने सोचा,मौका तो यहाँ सचमुच अच्छा है।
तभी मुझे अपने शहर के एक नेताजी याद आए।
लोग उन्हें प्यार से “गिरिधर” कहते थे।
पहले मैं समझता था कि वे कन्हैया के भक्त हैं, इसलिए उनका नाम “गिरिधर” रखा गया है।
बाद में पता चला,उनकी गिरने की महान योग्यता ने ही उनके नाम को चरितार्थ किया है।
लेकिन मैं अभी भी पूरी तरह कन्विंस नहीं था। दरअसल मैं साड़ी की दुकान में ग्राहक की तरह बाकी फील्ड भी देख लेना चाहता था। कहीं ऐसा न हो कि एक फील्ड पकड़ लें और फिर जिंदगी भर पछताते रहें,
“यार, इसमें गिरना भी कोई गिरना है? उस वाले फील्ड में क्यों नहीं गए?”
मित्र मेरी दुविधा भाँप गया।
बोला,
“अच्छा, धर्म क्षेत्र में जाओ। वहाँ गिरने के नए कीर्तिमान बन रहे हैं।”
मैं थोड़ा ठिठका।
“धर्म में गिरना? वहाँ भी?”
वह बोला,
“लो, कर लो बात! आजकल सबसे ज्यादा सुगम और सुलभ गिरावट तो धर्म क्षेत्र में ही है। यहाँ तो कई बार गिरे हुए ही पूजे जाने लगते हैं।”
धर्म बड़ा उदार है। जो पहले से गिरे हुए हैं और अपनी पुरानी गिरावट से ऊब चुके हैं, जो गिरने के नए आयाम स्थापित करना चाहते हैं,उन्हें भी धर्म भरपूर अवसर देता है।
“यहाँ सबके लिए जगह है।”व्यापारी।राजनीतिज्ञ।दबंग।कॉरपोरेट घराने।दलाल।
सभी को यहाँ घर जैसा माहौल मिलता है।
या यूँ कहें कि उनकी गिरावट के तौर-तरीकों के हिसाब से धर्म क्षेत्र में नए-नए प्रयोग किए जाते हैं।
मसलन,रैली, पंडाल और धार्मिक आयोजनों में धर्म के साथ मनोरंजन का पूरा प्रबंध।पंडाल के पीछे तीन पत्ती और जुए का प्रबंध।कहीं नंगा नाच।कहीं कानफोड़ू संगीत।
सबका इंतजाम रहता है, ताकि इन गिरे हुओं को घर जैसा माहौल मिले।
मुझे लगा, धर्म अब सचमुच समावेशी क्षेत्र बन गया है।
मैं गिरावट की इन संभावनाओं से अभिभूत था।
लेकिन अभी भी भ्रम में था कि किसे अपनाऊँ और किसे छोड़ूँ।
तभी मित्र को जैसे कुछ याद आया।
उसने मेरी ओर देखकर कहा,
“अरे, आप तो आजकल लेखक हो गए हैं न?”
मुझे लगा जैसे मेरी कोई चोरी पकड़ी गई हो।
मैं थोड़ा झेंपते हुए बोला,
“हाँ, थोड़ा-बहुत लिखता हूँ।”
वह कुछ देर मेरी ओर देखता रहा।
फिर बोला,
“लो! फिर काहे को इधर-उधर भटक रहे हो मित्र?”
मैंने पूछा,
“मतलब?”
वह बोला,
“आजकल गिरावट के नए रिकॉर्ड तो इसी फील्ड में बन रहे हैं।”
मैंने कहा,
“अच्छा! साहित्य की सेवा में भी गिरावट का स्कोप है?”
वह हँसा,
“तुम्हें अपने ही क्षेत्र का ज्ञान नहीं।”
उसने साहित्य का पूरा नक्शा मेरे सामने खोल दिया।
बोला,
“यहाँ गिरने के लिए आपको ज्यादा कुछ नहीं करना। बस यूँ समझिए कि शुरुआत में साहित्य की एक छोटी-सी दुकान खोलनी है।”
“मतलब?”
“एक प्रकाशन खोल लो। दो लोगों को छाप दो। तीन लोगों को बुलाकर सेमिनार करवा लो। पुरस्कार समिति बना लो। कोई स्पॉन्सर मिल जाए तो और भी अच्छा। अपना कोई खेमा बना लो।”
“ज्यादा कुछ त्यागना भी नहीं है। बस रीढ़ की हड्डी को थोड़ा लचीला बना लेना है।”
“फिर गिरने का काम फटाफट होगा।”
“जहाँ मौका दिखे,वरिष्ठ के सामने, आयोजक के सामने, संपादक के सामने, पुरस्कार समिति के सामने,बस लंबलेट हो जाना।”
“अपने विचारों की गठरी को सीने में कहीं दफना देना।”
मैंने कहा,
“लेकिन साहित्य में तो स्वतंत्रता होती है?”
वह बोला,
“बिल्कुल होती है। आप बिना किसी लाग-लपेट के, अपनी आत्मा के इशारों से मुक्त , स्वतंत्र रूप से झुक सकते हैं।”
मुझे कुछ आशा नजर आने लगी।
मैंने सोचा,जब गिरने की होम डिलीवरी यहीं मिल रही है तो फिर काहे को इधर-उधर भटकूँ?
मैंने कहा,
“कुछ फायदे भी बता दीजिए गिरने के।”
उसने गिनाया,शॉल।श्रीफल।स्मृति-चिह्न।मंच।अध्यक्षता।विशिष्ट अतिथि।फोटो।फेसबुक पोस्ट।
मैंने कहा,
“इतनी-सी चीजों के लिए आदमी गिरे?”
वह नाराज़ हो गया।
बोला,
“तो फिर आप लेखक बने ही क्यों? रॉयल्टी के लिए? उससे जिंदगी चलाओगे? यह सोचकर कि दो पैसे घर में आएँगे?”
“वह तो आप गिरो या न गिरो, मिलने वाला नहीं है।”
मैंने मित्र से कहा,
“लेकिन मैं तो छोटा लेखक हूँ।”
वह बोला,
“यह तो और भी अच्छी बात है। अभी छोटा-छोटा गिरोगे, तभी तो आगे गिरने के लिए बड़ी छलाँग लगा पाओगे।”
मैंने पूछा,
“इसके लिए मुझे लिखना भी पड़ेगा? जितना ज्यादा लिखूँगा, उतनी ज्यादा गिरने की संभावना?”
वह बोला,
“फिर वही पुरानी सोच! पहले साहित्यकार बनो। लिखना बाद में देखेंगे।”
देखिये पत्रकारिता में गिरने के लिए चैनल चाहिए।राजनीति में पार्टी।
धर्म में पंडाल और अनुयायी।लेकिन यहाँ साहित्य में फेसबुक अकाउंट ही पर्याप्त है।
मैंने उसी समय फैसला कर लिया,
अब कहीं नहीं जाऊँगा।अपने ही क्षेत्र में गिरूँगा।घर की गिरावट, घर में ही अच्छी।
परिचित जमीन है।गिरने वाले परिचित हैं।उठाने वाले भी वही हैं।उन्हें भी अपने साथ गिराकर उनकी मदद करूँगा।
सबसे बड़ी सुविधा यह कि यहाँ गिरने पर चोट नहीं लगती।नीचे पहले से इतने लोग पड़े होते हैं कि आदमी जमीन तक पहुँचता ही नहीं।किसी न किसी साहित्यकार पर गिर जाता है।
वह उठकर आपको गले लगा लेता है।सब एक-दूसरे को मरहम लगा रहे हैं।
आप उसकी किताब पर लिखो, वह आपकी किताब पर लिखे।
वह आपकी किताब का लोकार्पण करे, आप उसकी किताब का।
आप उसे सम्मान दे दो, वह अगले महीने आपको सम्मान दे देगा।
दोनों एक-दूसरे को गिराते रहें।
आखिर इस हमाम में आदमी को केवल नंगा होना पर्याप्त नहीं।
उसे यह भी प्रमाणित करना है कि वह दूसरों के साथ सहज है।
इसलिए मैं अब निश्चिंत हूँ।गिरूँगा।पूरी तैयारी से गिरूँगा।थोड़ा दाएँ।थोड़ा बाएँ।
जरूरत पड़ी तो सिद्धांत पर पैर रखकर फिसल जाऊँगा।
और दो लोग, जिन्हें अगले महीने मुझसे मंच चाहिए, लिखेंगे,
“आज ऐसे निर्भीक लेखकों की बहुत जरूरत है।”
मैं समझ जाऊँगा,मैं सफलतापूर्वक गिर चुका हूँ।
, डॉ. मुकेश असीमित
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