इलाज की भरमार, बीमारी ज़िंदा है
एक पहुँचे हुए विचारक को सुन रहा था।
एक वाक्य उन्होंने कहा—ऐसा वाक्य जिसे हम पहले भी कई बार सुन चुके हैं, लेकिन इस बार उस पर ठहरकर, गहराई से सोचने का मन हुआ—
“ज़्यादा लोग इसलिए नहीं मर रहे कि दवा नहीं मिल रही, ज़्यादा लोग इसलिए मर रहे हैं क्योंकि उन्हें ग़लत, नक़ली दवा मिल रही है, या दवा के नाम पर प्लेसीबो।”
पहले पल में यह वाक्य चिकित्सा-जगत से जुड़ा हुआ लगता है। लेकिन क्या इसे सिर्फ़ मेडिकल फ़ील्ड तक ही सीमित कर देना चाहिए? मुझे ऐसा नहीं लगता। मुझे तो लगता है कि बीमारियाँ अब केवल मानव शरीर तक सीमित नहीं रहीं। वे मानव मस्तिष्क में, समाज में, राजनीति में, आर्थिक व्यवस्था में, बाज़ार में—हर जगह गहराई तक फैल चुकी हैं। और इन सबके इलाज के नाम पर जो दावे किए जा रहे हैं, कहीं वे भी नक़ली, भ्रामक और छलपूर्ण तो नहीं?
मुझे इतिहास की दीवारों में भी दरारें दिखाई देती हैं—जहाँ राजनीति द्वारा घोषित ‘इलाज’, और बाज़ार की मिलावट एक साथ नज़र आती है।
पहले शारीरिक बीमारियों की बात करें।
मानव सभ्यता में बीमारी और इलाज हमेशा साथ-साथ चलते रहे हैं। लेकिन इलाज कभी केवल औषधि भर नहीं रहा—वह विश्वास भी रहा है। आदिम समाजों में ताबीज़, झाड़–फूँक, जड़ी–बूटियाँ—इन सबका असर जितना शरीर पर होता था, उससे कहीं ज़्यादा मन पर होता था। प्लेसीबो तब भी था, बस उसे यह नाम नहीं दिया गया था। फर्क बस इतना था कि तब का अज्ञान ईमानदार था, और आज का अज्ञान नहीं—आज वह व्यवस्थित छल का रूप ले चुका है।
आधुनिक इतिहास में जब एलोपैथी आई, तो लगा कि विज्ञान ने अंधविश्वास को पराजित कर दिया। लेकिन हुआ उल्टा। विज्ञान ने दवा दी, और बाज़ार ने उसे ब्रांड बना दिया। दवा अब इलाज नहीं रही—वह एक प्रोडक्ट बन गई। और जहाँ प्रोडक्ट होता है, वहाँ मिलावट का नैतिक लाइसेंस अपने-आप जारी हो जाता है। यहीं से नक़ली दवा की राजनीति शुरू होती है।
आज दवाइयाँ पहले से कहीं ज़्यादा हैं, अस्पताल पहले से कहीं ज़्यादा हैं, तकनीक पहले से कहीं ज़्यादा उन्नत है—फिर भी रोगी पहले से ज़्यादा असंतुष्ट, भयभीत और अस्वस्थ है। कारण स्पष्ट है—हम शरीर को मशीन मानकर इलाज कर रहे हैं, और मनुष्य को एक केस समझकर। इलाज लक्षणों का हो रहा है, कारणों का नहीं। दर्द है तो पेनकिलर, नींद नहीं तो स्लीपिंग पिल, घबराहट है तो ट्रैंक्विलाइज़र। यह सवाल नहीं पूछा जा रहा कि दर्द क्यों है, नींद क्यों नहीं आ रही, घबराहट क्यों बढ़ रही है। यह ठीक वैसा ही है जैसे अलार्म बजने पर उसकी बैटरी निकाल दी जाए, आग बुझाने की कोशिश न की जाए।
आज की दुनिया में दवा की कमी से कम, दवा की मिलावट से ज़्यादा मौतें हो रही हैं। गाँवों में, कस्बों में, शहरी झुग्गियों में—लोग अस्पताल इसलिए नहीं जाते कि उन्हें भरोसा है वहाँ सही इलाज मिलेगा, बल्कि इसलिए जाते हैं कि उन्हें भरोसा है कि वहाँ कुछ न कुछ तो मिलेगा। यही “कुछ न कुछ” कई बार नक़ली दवा, अधूरी दवा, एक्सपायर्ड दवा या सिर्फ़ प्लेसीबो होता है।
प्लेसीबो अपने आप में बुरा नहीं है। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि विश्वास का असर शरीर पर पड़ता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब प्लेसीबो को इलाज की जगह परोस दिया जाए, और मरीज़ को यह एहसास भी न हो कि उसे असली दवा नहीं मिल रही।
अब ज़रा सामाजिक संदर्भ पर भी नज़र डालें।
हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ सवाल पूछना बदतमीज़ी माना जाता है—डॉक्टर से सवाल बदतमीज़ी, गुरु से सवाल पाप, नेता से सवाल देशद्रोह। ऐसे समाज में नक़ली दवा का व्यापार फलता-फूलता है। ऊपर तक पहुँचे कमीशनख़ोरी के इस गोरखधंधे में डॉक्टर, फ़ार्मा कंपनियाँ, औषधि नियामक—सब किसी न किसी रूप में जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
राजनीतिक संदर्भ भी कुछ अलग नहीं है।
स्वास्थ्य व्यवस्था चुनावी भाषणों में होती है, ज़मीनी हक़ीक़त में नहीं। अस्पताल उद्घाटन की तस्वीरों में होते हैं, दवाएँ टेंडर फ़ाइलों में। नक़ली दवा का धंधा किसी अकेले दुकानदार का अपराध नहीं है—यह नीचे से ऊपर तक फैला हुआ एक पूरा सिस्टम है। कहीं कमीशन है, कहीं दबाव, और कहीं जानबूझकर आँख मूँद लेने का आदेश।
आर्थिक परिप्रेक्ष्य में वही ढाक के तीन पात दिखाई देते हैं।
गरीब आदमी असली दवा नहीं खरीद सकता, इसलिए सस्ती नक़ली दवा लेता है। मिडिल क्लास ब्रांड देखकर संतुष्ट हो जाता है। अमीर विदेश जाकर इलाज कराता है। नतीजा यह होता है कि नक़ली दवा का बोझ हमेशा गरीब के शरीर पर गिरता है, जबकि मुनाफ़ा सिस्टम की जेब में जाता है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे खतरनाक चीज़ है—आदत।
हम नक़ली चीज़ों के आदी हो चुके हैं—नक़ली खबरें, नक़ली नैतिकता, नक़ली राष्ट्रवाद, और अब नक़ली दवा। जब नक़ली चीज़ें सामान्य हो जाती हैं, तब मौत भी महज़ एक आँकड़ा बनकर रह जाती है। सत्तासीन सरकारें इस बात पर तालियाँ बजवा सकती हैं कि हमारे समय में मौतें कम हुई हैं—पिछली सरकार के मुक़ाबले।
शायद इसीलिए आज ज़्यादा लोग मर रहे हैं।
दवा न मिलने से नहीं—
बल्कि इलाज मिल जाने के भ्रम से।
अब ज़रा इस ग़लत इलाज की व्याप्ति पर भी बात कर लें—कि यह समाज में आखिर-आखिर कहाँ-कहाँ फैल चुका है। सच कहें तो जब इस गोरखधंधे की गहराई में उतरते हैं, तो महसूस होता है कि यह केवल इलाज की पड़ताल नहीं रह जाती, बल्कि हमारे समय और हमारे समाज का पोस्टमार्टम बन जाती है। यह समस्या केवल चिकित्सा जगत तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, मनुष्य, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता—सबमें एक साथ फैली हुई बीमारी है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर जगह इलाज चल रहा है, पर बीमारी ठीक नहीं हो रही—क्योंकि इलाज ही ग़लत है।
दरअसल आज का संकट “बीमारी का” नहीं है, बल्कि बीमारी की पहचान का संकट है।
बीमारियाँ अब केवल शरीर में नहीं रहीं, वे मानव मन में भी गहरे पैठ चुकी हैं।
आज की सबसे बड़ी महामारी डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी और अकेलापन है। इसका इलाज क्या बताया जा रहा है? मोटिवेशनल वीडियो, पॉजिटिव थिंकिंग के नारे, इंस्टाग्राम रील्स और “सब ठीक हो जाएगा” जैसे खोखले भाषण। यह इलाज नहीं, प्लेसीबो है। मन की बीमारी का इलाज संवेदनशीलता, संवाद और सामाजिक संरचना में बदलाव से होता है—न कि तीस सेकंड के उपदेश से। भीतर से मनुष्य को खोखला करने वाली व्यवस्था को बदले बिना, मन को स्वस्थ करने की कोशिश ठीक वैसी ही है जैसे गंदे पानी में खुशबू डाल दी जाए।
अब पर्यावरण की बीमारी को देखिए।
धरती का तापमान बढ़ रहा है, हवा ज़हरीली होती जा रही है, पानी दम तोड़ रहा है। इलाज क्या हो रहा है? अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, घोषणाएँ, प्रतीकात्मक “ग्रीन डे”, और सोशल मीडिया पर पेड़ लगाते नेताओं की तस्वीरें। असली बीमारी क्या है? अंधाधुंध उपभोग और बेलगाम लालच। और इलाज क्या दिया जा रहा है? भाषण। जब तक जीवन-शैली नहीं बदलेगी, जब तक विकास की परिभाषा नहीं बदलेगी—तब तक यह इलाज भी नक़ली ही रहेगा।
राजनीतिक बीमारियाँ तो और भी गंभीर रूप ले चुकी हैं।
समाज में असमानता बढ़ रही है, हिंसा सामान्य हो रही है, घृणा, अविश्वास और विभाजन गहराता जा रहा है। इलाज क्या किया जा रहा है? राष्ट्रवाद के इंजेक्शन, भावनात्मक नारे, डर का प्रचार और काल्पनिक दुश्मनों की रचना। यह इलाज नहीं, बल्कि बीमारी को और भड़काने वाला टॉनिक है। असली बीमारियाँ—बेरोज़गारी, शिक्षा का पतन, स्वास्थ्य की बदहाली—इनका इलाज कठिन है, इसलिए आसान इलाज चुना जाता है: भावनात्मक उत्तेजना।
सबसे खतरनाक बीमारी वह है जो मानव स्वार्थ से जन्म लेती है।
हर समस्या को हम अपने तात्कालिक लाभ के चश्मे से देखते हैं। शिक्षा का उद्देश्य नौकरी बन गया, स्वास्थ्य का उद्देश्य मुनाफ़ा, राजनीति का उद्देश्य सत्ता और धर्म का उद्देश्य पहचान। जब हर चीज़ का लक्ष्य बदल जाता है, तो उसका इलाज भी दिशाहीन हो जाता है। हम बीमार व्यवस्था में व्यक्ति को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं—जबकि व्यक्ति उसी व्यवस्था से बीमार हो रहा है।
इसीलिए बीमारियाँ ठीक नहीं हो रहीं।
क्योंकि इलाज सच्चा नहीं है।
क्योंकि हम सवाल नहीं पूछ रहे—सिर्फ़ समाधान ख़रीद रहे हैं।
क्योंकि हमें तात्कालिक राहत चाहिए, दीर्घकालिक परिवर्तन नहीं।
असल इलाज कठिन होता है।
वह असुविधाजनक होता है।
वह हमें बदलने की माँग करता है—
सिर्फ़ गोली निगलने की नहीं।
जब तक हम बीमारी का साहसपूर्वक सामना नहीं करेंगे,
जब तक हम यह स्वीकार नहीं करेंगे कि कई जगह दवा ही बीमारी बन चुकी है,
तब तक इलाज चलता रहेगा—और रोग भी।
यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है—
इलाज की भरमार, और स्वास्थ्य का अभाव।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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