शिव और गौरा के अलौकिक प्रेम का भावपूर्ण विवाह गीत

काहे अड़ि रही गौरा—ऐसे जोगी से क्यों ब्याह?

शिव और गौरा के अलौकिक प्रेम का भावपूर्ण विवाह गीत

“काहे अड़ि रही गौरा,
काहे तप करै री,
काहे हठ करै री,
ऐसे जोगी के काजे…”

भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध केवल विवाह का संबंध नहीं, बल्कि तपस्या, समर्पण और आत्मा द्वारा परमात्मा को पहचानने की अलौकिक कथा है। इसी दिव्य भाव को ब्रज और लोकभाषा की सहज मिठास में प्रस्तुत करता है यह भावपूर्ण शिव–गौरा विवाह गीत—“काहे अड़ि रही गौरा”।

इस गीत में माता मैना अपनी पुत्री गौरा से पूछती हैं कि वह ऐसे औघड़ जोगी को अपना वर बनाने के लिए कठोर तपस्या क्यों कर रही है, जिसके पास न कोई महल है, न घर-द्वार, न सोने-चाँदी के आभूषण और न ही सांसारिक सुख-सुविधाएँ।

वह तन पर भस्म रमाते हैं, बाघम्बर ओढ़ते हैं, गले में नाग धारण करते हैं और कैलास पर्वत पर निवास करते हैं। उनके साथ नंदी और भूतगण रहते हैं तथा हाथ में त्रिशूल और डमरू है। ऐसे विरक्त योगी के साथ गौरा अपना घर कैसे बसाएँगी—यही चिंता माता के मन में बार-बार उठती है।

माता मैना की चिंता

माता की दृष्टि सांसारिक है। वे अपनी पुत्री के भावी जीवन को लेकर चिंतित हैं। प्रत्येक माता की तरह वे भी अपनी पुत्री के लिए सुंदर घर, सुखी परिवार, आभूषण और सभी प्रकार की सुविधाएँ चाहती हैं।

इसीलिए वे गौरा से पूछती हैं—

“ना घर-द्वारा, ना अटरिया,
ना खाट, ना कोई सेज,
बाघम्बर ओढ़े डोलैं,
कछु ना जग से नेह।”

भोलेनाथ संसार की माया से निर्लिप्त हैं। उनके लिए सोना और मिट्टी समान हैं। वे किसी राजसिंहासन पर नहीं, कैलास पर्वत पर समाधिस्थ रहते हैं। माता मैना को शिव का यही विरक्त और औघड़ स्वरूप अपनी पुत्री के सांसारिक जीवन के लिए अनुपयुक्त दिखाई देता है।

गौरा की दृष्टि में भस्म नहीं, ब्रह्म हैं शिव

माता की चिंताओं का उत्तर गौरा बहुत सहजता और दृढ़ विश्वास के साथ देती हैं—

“गौरा हँस कै बोली मैया,
तू का जाने बात,
जिनके मन में जग समायो,
वे ही मेरे नाथ।”

यही इस गीत का आध्यात्मिक केंद्र है।

जिसे संसार एक भस्मधारी औघड़ जोगी समझता है, गौरा को उसी में संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन होते हैं। माता को शिव के तन पर लगी राख दिखाई देती है, लेकिन गौरा उस राख के भीतर छिपे वैराग्य, सत्य और अनंत चेतना को पहचानती हैं।

वे कहती हैं—

“तोय दिखैं बस राख भभूती,
मोय ब्रह्म दिखाय,
जाको जग औघड़ कहता मैया,
मोय वोई मन भाय।”

सच्चा प्रेम बाहरी रूप, वैभव और सुविधाओं के आधार पर अपना निर्णय नहीं करता। गौरा का प्रेम शिव के बाहरी स्वरूप से नहीं, उनके भीतर बसे उस परम सत्य से है, जिसके सामने तीनों लोक नतमस्तक होते हैं।

गौरा को महल नहीं, भोले के चरण चाहिए

गौरा न तो राजमहलों की इच्छा रखती हैं और न ही सोने-चाँदी के आभूषणों की। उन्होंने भोलेनाथ के चरणों में ही अपने जीवन की सच्ची राह खोज ली है—

“ना मोय महलन की अभिलाषा,
ना मोय गहना चाह,
भोले के चरनन में मैया,
मोय मिल गई राह।”

जिस शिव के आगे तीनों लोक झुकते हैं और देवता भी अपना शीश नवाते हैं, उन्हें पाने के बाद गौरा को किसी अन्य संपदा की आवश्यकता नहीं रहती। वे भोलेनाथ को केवल इस जन्म में नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर तक अपने पति के रूप में पाना चाहती हैं।

यह प्रेम अधिकार का नहीं, संपूर्ण समर्पण का प्रेम है। गौरा की तपस्या यह संदेश देती है कि जब मन अपने आराध्य को पहचान लेता है, तब संसार के सारे प्रलोभन स्वयं ही छोटे पड़ जाते हैं।

“वोई मेरो भरतार”—प्रेम की अंतिम स्वीकृति

गीत के अंतिम मुखड़े में गौरा किसी संकोच के बिना अपने निर्णय की घोषणा करती हैं—

“हाँ मैं अड़ि रही शंकर पै,
हाँ मैं तप करै री,
मन दे बैठी भोले बाबा कूँ,
अब का डर करै री।”

अब उन्हें न संसार की चिंता है, न किसी प्रश्न का भय। उन्होंने अपना मन भोलेनाथ को समर्पित कर दिया है। माथे पर चंद्रमा, जटाओं में गंगा, तन पर भभूति और गले में नाग धारण करने वाले महादेव ही उनके आराध्य और उनके भरतार हैं।

“जाके माथे चंदा बिराजै,
जटा में गंगा धार,
अंग भभूती, गले भुजंगा,
वोई मेरो भरतार।”

यही पंक्ति पूरे गीत को एक भावपूर्ण उत्कर्ष प्रदान करती है। माता की चिंता से आरंभ हुई कथा अंततः गौरा की निर्भीक और गौरवपूर्ण स्वीकृति पर पहुँचती है—“भोले मेरो भरतार।”

गीत का आध्यात्मिक संदेश

यह गीत केवल शिव–पार्वती विवाह की कथा नहीं सुनाता, बल्कि जीवन का एक गहरा सत्य भी समझाता है। संसार प्रायः व्यक्ति का मूल्यांकन उसके रूप, वस्त्र, धन और बाहरी सुविधाओं से करता है; लेकिन सच्ची दृष्टि उसके भीतर छिपे सत्य को पहचानती है।

माता मैना को शिव का औघड़ रूप दिखाई देता है, जबकि गौरा को उनमें ब्रह्म दिखाई देते हैं। यही सामान्य दृष्टि और प्रेमपूर्ण आध्यात्मिक दृष्टि का अंतर है।

गौरा की तपस्या हमें यह संदेश देती है कि सच्चा प्रेम प्रदर्शन नहीं चाहता। वह वैभव नहीं, सत्य चुनता है; रूप नहीं, स्वरूप पहचानता है और सुविधा नहीं, समर्पण की राह अपनाता है।

पूरा शिव–गौरा विवाह गीत सुनें

भगवान शिव और माता गौरा के अलौकिक प्रेम, तपस्या और समर्पण को समर्पित यह भावपूर्ण भजन आप Dr Mukesh Aseemit Creations YouTube चैनल पर सुन सकते हैं।

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हर हर महादेव!
वोई मेरो भरतार… भोले मेरो भरतार…

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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