माटी का घरौंदा रे: आखिर किस बात का घमंड? जीवन की नश्वरता समझाता एक निर्गुण भजन
मनुष्य जीवन भर जोड़ता रहता है—धन, मकान, प्रतिष्ठा, रिश्ते और उपलब्धियाँ। धीरे-धीरे इन्हीं चीजों के बीच उसे यह भ्रम होने लगता है कि जो कुछ उसने बनाया है, वह हमेशा उसके साथ रहने वाला है।
लेकिन जीवन कभी-कभी बहुत साधारण-सा प्रश्न पूछ देता है—
जब तन भी स्थायी नहीं, साँस भी अपने अधिकार में नहीं, तो फिर आखिर किस बात का घमंड?
इसी भाव को केंद्र में रखकर रचा गया निर्गुण भजन “माटी का घरौंदा रे” मनुष्य को निराश नहीं करता, बल्कि उसे अपने जीवन को एक अलग दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित करता है।
माटी का घरौंदा है यह जीवन
बचपन में हम मिट्टी का घरौंदा बनाते थे। बड़ी लगन से उसे सजाते, उसकी दीवारें बनाते और कुछ देर के लिए उसे अपना संसार मान बैठते।
फिर कभी हवा आती, कभी पानी और कभी हमारा ही हाथ लग जाता—घरौंदा मिट्टी में मिल जाता।
शायद हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है।
हम घर बनाते हैं, पद पाते हैं, धन जोड़ते हैं और अपने चारों ओर पहचान की अनेक दीवारें खड़ी कर लेते हैं। ये सब जीवन के लिए आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब साधन ही हमारी पहचान बन जाते हैं।
इसी प्रश्न को भजन का मुखड़ा बड़ी सहजता से सामने रखता है—
माटी का घरौंदा रे, किस बात का घमंड।
पल भर की यह छाँव रे, झूठा सारा प्रपंच॥
साँस भी उधार की है
मनुष्य को अपनी संपत्ति पर अधिकार दिखाई देता है, लेकिन अपनी अगली साँस पर भी उसका पूरा अधिकार नहीं।
यही निर्गुण दर्शन की खूबसूरती है। वह संसार छोड़कर भागने की बात नहीं करता; वह संसार में रहते हुए संसार के अहंकार से मुक्त होने की बात करता है।
भजन का भाव इसी सत्य को छूता है—
साँस उधारी, तन भी उधारी, झूठा तेरा दंभ।
नाम बिना सब सूना लागे, बाकी केवल भ्रम॥
यहाँ “नाम” केवल किसी शब्द को दोहराने तक सीमित नहीं है। उसे सत्य, चेतना, सद्कर्म और उस परम सत्ता की स्मृति के रूप में भी समझा जा सकता है, जिसके सामने मनुष्य का अहंकार बहुत छोटा पड़ जाता है।
मुट्ठी बाँधकर आए, खाली हाथ जाना है
नवजात शिशु की बंद मुट्ठी और मृत्यु के समय खाली हाथ—इन दोनों के बीच ही मनुष्य की पूरी दौड़ समाई हुई है।
हम कहते रहते हैं—मेरा घर, मेरा धन, मेरा पद, मेरा परिवार, मेरी प्रतिष्ठा।
लेकिन समय धीरे-धीरे “मेरा” शब्द की परतें उतारता जाता है।
रिश्तों का अर्थ यह नहीं कि उनसे विरक्ति हो जाए। बल्कि यह समझ आए कि जब साथ सीमित समय का है तो उसमें अहंकार कम और प्रेम अधिक क्यों न हो?
भीतर का धन कौन-सा है?
निर्गुण परंपरा बार-बार मनुष्य को बाहर से भीतर की ओर मोड़ती है।
हम सुख को वस्तुओं में खोजते हैं। सम्मान दूसरों की आँखों में खोजते हैं। शांति परिस्थितियों में खोजते हैं। जबकि संभव है कि जिसकी तलाश में हम इतनी दूर भटक रहे हैं, उसका स्रोत हमारे भीतर ही हो।
इसलिए प्रश्न उठता है—
भीतर जो अमृत बहता है, उसको क्यों न खोज?
बाहर-बाहर भटके पगले, भीतर बैठा ओज॥
यह “भीतर लौटना” संसार त्यागना नहीं है। इसका अर्थ है अपने व्यवहार, इच्छाओं, क्रोध, लोभ और अहंकार को पहचानना।
आखिर साथ क्या जाएगा?
यदि धन नहीं, मकान नहीं और पद नहीं—तो क्या जीवन में कुछ भी अर्थपूर्ण नहीं?
इसके ठीक विपरीत।
जीवन की नश्वरता ही जीवन को मूल्यवान बनाती है।
किसी दुखी मनुष्य का हाथ पकड़ना, किसी जरूरतमंद की सहायता करना, प्रेम देना, ज्ञान बाँटना और अपने हिस्से की दुनिया को थोड़ा बेहतर छोड़ जाना—शायद यही वह संपत्ति है जिसे समय इतनी आसानी से मिटा नहीं पाता।
इसीलिए भजन कहता है—
सेवा बो दे, प्रेम उगा ले, यही अमर पहचान।
कितनी सुंदर कल्पना है—सेवा को बीज मानिए और प्रेम को उसकी फसल।
सुनिए पूरा भजन — “माटी का घरौंदा रे”
इस विचार को केवल पढ़ने के बजाय संगीत के माध्यम से अनुभव करना चाहें तो Dr Mukesh Aseemit Creations | Music with Mukesh पर पूरा निर्गुण भजन सुन सकते हैं।
पूरा वीडियो यहाँ देखें:
https://youtu.be/9STLqZXFhAg
भजन सुनते हुए शायद स्वयं से एक प्रश्न जरूर पूछिए—
जिसे पाने के लिए मैं इतना भाग रहा हूँ, उसमें से वास्तव में कितना मेरे साथ जाने वाला है?
घमंड छोड़ने का अर्थ महत्वाकांक्षा छोड़ना नहीं
अक्सर आध्यात्मिक विचारों को निष्क्रियता समझ लिया जाता है।
“सब यहीं रह जाएगा” का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य मेहनत करना छोड़ दे, घर न बनाए या सफलता की इच्छा न रखे।
अर्थ केवल इतना है—
घर बनाइए, लेकिन घर का अहंकार मत बनाइए।
धन कमाइए, लेकिन धन को अपनी पहचान मत बनाइए।
सफलता पाइए, लेकिन किसी दूसरे को छोटा समझने की कीमत पर नहीं।
क्योंकि अंततः शरीर भी उसी माटी का है जिससे वह घरौंदा बना था।
जाते-जाते…
जीवन शायद बहुत लंबी कहानी नहीं है।
दो साँसों के बीच मिला एक अवसर है।
इस अवसर में हम चाहें तो केवल अपना घरौंदा सजाते रहें, या कुछ ऐसा भी कर जाएँ जिसकी सुगंध हमारे जाने के बाद बची रहे।
माटी का घरौंदा एक दिन मिट जाएगा।
प्रश्न यह नहीं कि हमने कितना जोड़ा—
प्रश्न यह है कि जब तक वह घरौंदा खड़ा था,
हमने उसमें कितना प्रेम बसाया।
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