कीमतें आसमान नहीं छू रहीं—असल में हमारी मान्यताएँ उछल रही हैं।

कीमतें आसमान नहीं छू रहीं—असल में हमारी मान्यताएँ उछल रही हैं।

जिस तरह आज सोना–चाँदी बाज़ार में हाय–हाय मचाए हुए हैं, ऐसा लगता है मानो किसी दैवी अवतार ने हाथ में रेट लिस्ट पकड़ ली हो। जबकि सच्चाई यह है कि सोने में कोई नया गुण पैदा नहीं हो गया है। न वह आज ज़्यादा चमकदार है, न ज़्यादा शुद्ध, न पहले से ज़्यादा दुर्लभ। वह वही पुरानी धातु है—जिसे न खाया जा सकता है, न पहना जा सकता है, न उससे घर गरम होता है। फिर भी पूरा बाज़ार उसके सामने सिर झुकाए खड़ा है। आज सोना भाव खा रहा है—क्योंकि हमने उसे बहुत पहले भाव देना शुरू कर दिया था।

असल बात यह है कि सोने को भाव बाज़ार ने नहीं दिया, हमने दिया है। और जब किसी चीज़ को हम लगातार भाव देते रहते हैं, तो एक दिन वह भाव खाने लगती है। आज सोना वही कर रहा है—हमारी दी हुई श्रद्धा पर पल रहा है। अगर ठंडे दिमाग़ से देखें तो सोना भी लोहे, एल्युमिनियम या ताँबे की तरह एक धातु ही है। फर्क बस इतना है कि लोहे को हमने मेहनत से जोड़ दिया, एल्युमिनियम को उद्योग से, और सोने को—आकांक्षा से। हमने तय कर लिया कि सोना सम्मान है, सुरक्षा है, प्रतिष्ठा है। बेटी के भविष्य की गारंटी है, लक्ष्मी देवी की कृपा का प्रमाण है, और मुश्किल समय में आख़िरी सहारा है। बस, यहीं से खेल शुरू हो गया।

यह पूरा मामला मान्यताओं का है।
मान्यताएँ तय करती हैं कि कौन-सी धातु तिजोरी में जाएगी और कौन-सी कबाड़ में।
मान्यताएँ ही तय करती हैं कि कौन-सी चीज़ पूजी जाएगी और कौन-सी औज़ार बनेगी।

बाज़ार बहुत चालाक है। वह जानता है कि सोना धातु नहीं, डर का इलाज है—महँगाई का डर, भविष्य का डर, मुद्रा के अवमूल्यन का डर। इसलिए वह सोना नहीं बेचता, डर बेचता है। और हम डर को महँगे दाम पर खरीदने में कभी मोलभाव नहीं करते। आपने देखा होगा—किसी विज्ञापन में सोने के गहने पहने एक कमसिन, कसी हुई काया वाली महिला खड़ी है, सिर्फ़ आपको लुभाने के लिए। बाज़ार ने सोने और सुंदरता का संयोजन स्थापित कर दिया है। अब सिर्फ़ सोना पहनना काफ़ी नहीं, इसलिए साथ में स्त्री के उन्नत उरोज भी प्रदर्शित किए जाते हैं—मानो स्त्री के ग्लैमर और सेक्स अपील में सोने का तड़का लगा दिया गया हो।

कभी हमने सोचा कि अगर कल समाज यह तय कर ले कि सोना सिर्फ़ एक धातु है—तो क्या होगा? शायद वही सोना किसी फैक्ट्री में वायर बन रहा होगा, किसी गाड़ी का मडगार्ड या किसी छत का शेड बन चुका होगा, और उसकी कीमत भी उतनी ही होगी जितनी किसी दूसरी धातु की। लेकिन अब सिर्फ़ बाज़ार को दोष देना भी ठीक नहीं। क्योंकि सोने पर सवाल उठाना सिर्फ़ बाज़ार पर नहीं, हमारी सदियों पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठाना है।

दरअसल यह सवाल सोने की कीमत से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर है। इसलिए इसका उत्तर भी बाज़ार की भाषा में नहीं, विचार की भाषा में ही ठीक बैठेगा। सोना इतना महँगा क्यों है—यह प्रश्न तभी अटपटा लगता है जब हम उसे रोटी, कपड़े और मकान के तराज़ू पर तौलने लगते हैं। सच यह है कि सोना कभी भी उपयोगिता की चीज़ नहीं रहा; वह हमेशा आकांक्षा की चीज़ रहा है। यह न भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, न आपको कहीं पहुँचा देता है। फिर भी सदियों से आदमी इसे छाती से लगाए बैठा है—मानो इसमें कोई ऐसी शक्ति छुपी हो जो जीवन की अनिश्चितता से सुरक्षा देती हो।

अगर इस पर थोड़ा और गहराई से विचार करें तो समझ में आता है कि सोने की असली कीमत उसकी भौतिक प्रकृति में नहीं, उसकी मानसिक स्वीकृति में है। वह चमकदार है, पर सिर्फ़ इसी वजह से नहीं बिकता। वह जंग नहीं खाता, रासायनिक रूप से लगभग निष्क्रिय है, सैकड़ों साल वैसा ही रहता है—ये गुण उसे “स्थायित्व” का प्रतीक बना देते हैं। और मनुष्य, जो स्वयं सबसे अस्थिर प्राणी है, स्थायित्व के हर प्रतीक से चिपक जाना चाहता है।

भारत इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है। कभी ऐसा समय था जब देश में खाने को अनाज नहीं था, फिर भी सोना आयात हो रहा था। यह विरोधाभास अर्थशास्त्र का नहीं, संस्कृति का था। भारत को यूँ ही “सोने की चिड़िया” नहीं कहा गया—यहाँ सोना सिर्फ़ संपत्ति नहीं, संस्कार था। बेटी की विदाई, देवी की मूर्ति, राजा का मुकुट, भगवान की आरती—हर जगह सोना मौजूद था, जैसे यह कोई धातु नहीं बल्कि आशीर्वाद हो।

ध्यान दीजिए—सोना सबसे ज़्यादा कहाँ मिलता है?
औरतों पर लदे आभूषणों में, बैंकों के लॉकरों में, और मंदिरों के गर्भगृह में। मंदिरों में सोने की यह सघन उपस्थिति—माया का अध्यात्म से यह संयोग—शायद वेदांत का कोई उलटा दर्शन है।

असल में सोने का मूल्य उसकी कमी (scarcity) से कम और हमारे विश्वास (trust) से ज़्यादा पैदा होता है। हम सब मान लेते हैं कि सोना मूल्यवान है—और यही सामूहिक मान्यता उसे मूल्यवान बना देती है। यही कारण है कि बाज़ार सोने को नहीं बेचता, हमारी मान्यताओं को भुनाता है। हमारी असुरक्षाएँ, हमारी इच्छाएँ, हमारी सामाजिक स्वीकृतियाँ—सब कुछ उस चमक में घुलकर दाम बन जाता है।

सोना सिर्फ़ एक धातु है—लेकिन हमने उसे सपना बना दिया है।
हमने तय कर लिया है कि वह भरोसे का पर्याय है, और बाज़ार ने उसी भरोसे को पैकेज कर दिया है।
इसलिए सोना महँगा नहीं है—हमारी इच्छाएँ महँगी हैं।
सोना तो बस उनका सबसे टिकाऊ आईना है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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