Dr Shailesh Shukla
Mar 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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सरकारी व्यवस्था की सुस्त गति में यदि कोई शक्ति अचानक फाइलों को पंख लगाकर उड़ाती दिखाई देती है, तो वह है भ्रष्टाचार। यह व्यंग्य लेख बताता है कि कैसे रिश्वत की अनौपचारिक व्यवस्था आम नागरिक, अधिकारी और ठेकेदार—सभी के लिए “सुविधाजनक तंत्र” बन चुकी है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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लोकतंत्र की डाल पर हम खड़े नहीं हैं,
अपनी-अपनी पूँछ से लटके हुए हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब राजनीति पूजा करने लगे
और पूजा राजनीति करने लगे—
तब शंभो भी सोच में पड़ जाते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 17, 2026
Blogs
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“आपने प्रशासन को जगाया है न? अब भुगतो।
विकास की सुरसा अब खुले मुँह आपके नथुनों तक पहुँच चुकी है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 9, 2026
व्यंग रचनाएं
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पेट की राजनीति बड़ी सीधी है—खाली पेट सिर्फ़ खाना माँगता है, भरा पेट सवाल। बब्बन चाचा के पेट से देश की प्रगति नापी जा सकती है, क्योंकि जहाँ खाना दिखा, वहाँ लोकतंत्र अपने आप चुप हो जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 5, 2026
व्यंग रचनाएं
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यह गीता मोक्ष नहीं दिलाती, यह कुर्सी दिलाती है—और वही इसका सबसे बड़ा धर्म है।जहाँ कर्म दूसरों से कराया जाता है और फल स्वयं भोगा जाता है, वहीं से राजनीति का शास्त्र शुरू होता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 5, 2026
Book Review
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‘बाराखड़ी’ केवल व्यंग्य-रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों की वर्णमाला है। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी अपने तीखे लेकिन संतुलित व्यंग्य के माध्यम से पाठक को हँसाते नहीं, बल्कि सोचने को विवश करते हैं।
इस समीक्षा में ‘लड़की का बाप’, ‘घोटालाटूर’, ‘खाली देगची और भूखी पंगत’, ‘गरीबी हटेगी’, ‘पहचान हो तो ठीक रहता है’ जैसी रचनाओं के चयनित उद्धरणों के सहारे यह दिखाने का प्रयास है कि कैसे लेखक हास्य को साधन बनाकर गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाते हैं।
यह संग्रह पाठकों के साथ-साथ व्यंग्यकारों के लिए भी एक पाठशाला की तरह है, जहाँ शिल्प, संवेदना और सरोकार का संतुलन सीखने को मिलता है। ‘बाराखड़ी’ आज के समय को समझने के लिए एक अनिवार्य व्यंग्य-पाठ है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 21, 2026
व्यंग रचनाएं
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यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
व्यंग रचनाएं
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दुनिया की कूटनीति कभी-कभी इतनी जटिल नहीं होती, जितनी एक रूसे फूफा की नाराज़गी।
एक फोन कॉल, थोड़ी तारीफ़ और ज़रा-सा अपनापन—
न हो तो टैरिफ, ट्वीट और ताने वैश्विक स्तर पर चलने लगते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
समसामयिकी
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“युद्ध अब अचानक नहीं फूटता—वह पहले बाज़ार में उतरता है, फिर जीवन में।”
“जब शांति लाभकारी नहीं रह जाती, तब युद्ध नैतिक घोषित कर दिया जाता है।”
“हर युद्ध के बाद कोई विजेता नहीं होता—सिर्फ़ आँकड़े होते हैं।”
“इतिहास मनुष्य से एक ही प्रश्न पूछता है—क्या तुमने पहले से सीखा?”