बात में वज़न होना चाहिए

डॉ मुकेश 'असीमित' May 29, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज के समय में सिर्फ बात करना काफी नहीं है, बात में वज़न भी होना चाहिए। राजनीति से लेकर मीडिया, ज्योतिष, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा जगत तक हर जगह "भारी" शब्द का बोलबाला है। डॉ. मुकेश असीमित का यह व्यंग्य उसी मानसिकता पर चुटीला कटाक्ष है, जहाँ हल्की बातों की कोई कीमत नहीं और हर चीज़ को खबर बनने के लिए भारी होना ज़रूरी है।

हां हम तिलचट्टे हैं लेकिन तिल तिल कर चट नहीं करते !

Prem Chand Dwitiya May 19, 2026 व्यंग रचनाएं 0

कॉकरोच बिरादरी पर सिस्टम पर हमले का आरोप लगते ही तिलचट्टों की आपात बैठक बुला ली गई। बैठक में वृद्ध, युवा, पर्यावरण प्रेमी और राजनीतिक चेतना से लैस कॉकरोचों ने मनुष्य जाति पर पलटवार किया। उनका सीधा सवाल था—हम तो किचन वेस्ट खाते हैं, जंगलों की तबाही झेलते हैं, मिट्टी को उर्वर बनाते हैं; असली निकृष्ट जीव कौन है?

लाइन में खड़े रहने का हुनर: भारतीय जीवन की सबसे बड़ी स्किल पर व्यंग्य

Prem Chand Dwitiya Apr 15, 2026 व्यंग रचनाएं 1

भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।

शर्म आती नहीं हमें — और यह हमारी राष्ट्रीय उपलब्धि है

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 15, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।” यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।

रंग बदलने के खतरे को लेकर गिरगिटों की हाई लेवल मीटिंग !

Prem Chand Dwitiya Apr 8, 2026 व्यंग रचनाएं 1

रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं। सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं। व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।

एक ही देश में अलग-अलग राजनैतिक सच्चाइयाँ दिखाता सोशल मीडिया

Dr Shailesh Shukla Apr 5, 2026 India Story \बात अपने देश की 1

सोशल मीडिया ने एक देश में कई समानांतर वास्तविकताएँ बना दी हैं एल्गोरिद्म हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं झूठी खबरें सच्चाई से तेज़ फैलती हैं डिजिटल ध्रुवीकरण लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुका है

फागुन में दिलों की कश्तियाँ

Shakoor Anvar Mar 21, 2026 गजल 0

फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?

वोट का हाट बाजार-हास्य व्यंग्य रचना

Pradeep Audichya Nov 10, 2025 व्यंग रचनाएं 0

भरोसीलाल ने चाय के डिस्पोज़ल कप को देखते हुए कहा — “ये चाय है चुनाव और कप है जनता, चुनाव खत्म तो जनता कचरे में!” चुनाव के मौसम में बिजली ओवरटाइम करती है, सड़कें अचानक स्वस्थ हो जाती हैं, और नेता जनता की “कीमत” लगाते हुए मंडी में उतर आते हैं। वोट की कीमत कभी दस हज़ार, कभी तीस हज़ार, तो कभी एक साड़ी और पेय पदार्थ में तय होती है। भरोसीलाल का निष्कर्ष था — “इससे बढ़िया हाट बाजार तो कोई हो ही नहीं सकता!”

मुद्दों की चुहिया – पिंजरे से संसद तक

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 10, 2025 व्यंग रचनाएं 0

मुद्दा कोई साधारण प्राणी नहीं — यह राजनीति की चुहिया है, जिसे वक्त आने पर पिंजरे से निकालकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है। झूठे वायदों की हवा और घोषणाओं के पानी से यह फूली-फली जाती है, और फिर चुनाव आते ही इसका खेल शुरू होता है। नेता डुगडुगी बजाते हैं, जनता तालियाँ पीटती है — और “मुद्दा” लोकतंत्र का मुख्य पात्र बनकर सबका मनोरंजन करता है।