ढलती उमर पर चढ़ता होली का रंग !

Prem Chand Dwitiya Mar 8, 2026 व्यंग रचनाएं 1

कस्बे के अज्ञान चबूतरे पर जमा हुई यह होली की टोली केवल रंग-गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि ढलती उम्र के अकेलेपन, अनुभव और हास्य का संगम है। सेवानिवृत्त अधिकारी, प्रोफेसर, पंडित और पुराने मित्र — सब मिलकर होली के बहाने जीवन की त्रासदियों को ठिठोली में बदल देते हैं।

A Grand Launch of “Antim Darshan Ka darshan shastra ”

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 18, 2026 News and Events 0

The satirical collection “Antim Darshan Ka darshan shastra ” by Dr. Mukesh Aseemit was launched at the World Book Fair with literary warmth and intellectual vibrancy. The event brought together senior Hindi writers, satirists, critics, and readers, celebrating satire as a continuous worldview rather than a momentary literary event.

जब लाइट चली गई… और ज़िंदगी फिर भी जलती रही

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 5, 2026 हास्य रचनाएं 0

बचपन में लाइट जाना उत्सव था—कहानियाँ, तारे और परिवार। आज लाइट जाए या ग्रिड फेल हो—ज़िंदगी स्क्रीन के सहारे चलती है। यह कार्टून उसी बदलाव पर एक हल्का, चुभता और मुस्कराता व्यंग्य है।

नाम में क्या रखा है?

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज के समय में नाम समाधान नहीं, विकल्प बन गया है। जहाँ समस्याएँ हटाना कठिन हो, वहाँ नाम बदल देना सबसे आसान नीति है। यह व्यंग्य उसी नाम-प्रधान विकास दर्शन पर एक तीखा मुस्कुराता कटाक्ष है।

मोगली आज़म (लघु नाटिका)

Ram Kumar Joshi Dec 13, 2025 हिंदी लेख 2

“मुगल-ए-आज़म के आधुनिकीकरण पर आधारित यह व्यंग्य-नाटिका सोलहवीं सदी के ठाठ-बाट को इक्कीसवीं सदी की भोंडी आधुनिकता से टकराते हुए दिखाती है—जहाँ बादशाह का दरबार दारू, डांस, ड्रामा और डिजिटल विद्रोह में बदल जाता है।”

पूँजीवाद की टंकी से फ्लश करता बाजार 

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 21, 2025 व्यंग रचनाएं 0

पूँजीवाद आज हमारे जीवन का रिमोट कंट्रोल बन चुका है। वह तय करता है कि हमें क्या खरीदना है, क्या छोड़ना है और किस चीज़ में ‘स्मार्ट चॉइस’ बनने का भ्रम पैदा करना है। बाजार अब सिर्फ चीजें नहीं बेचता, हमारी कमजोरियाँ, असुरक्षाएँ और आदतें भी खरीद लेता है। हर फ्लश, हर swipe, हर click के पीछे एक पूरा तंत्र सक्रिय है—जो हमें उपभोक्ता से ज्यादा उपलब्ध दिमाग मानता है। इस व्यंग्य में दिखाया गया है कि कैसे एक विशाल टंकी की तरह पूँजीवाद ऊपर बैठा है, और नीचे पूरा समाज उसकी एक हल्की-सी फ्लश से बहने लगता है।

कवि सम्मेलन की रिपोर्ट

Ram Kumar Joshi Sep 28, 2025 हिंदी कविता 0

कवि सम्मेलन की भव्य सजावट, मंच पर कवि और हजारों दर्शक—लेकिन कविता की जगह मसखरी और चुटकुले। थैलियों में नोट और कवियों का ठाठ, राष्ट्रकवियों की आड़ में हास्यास्पद हरकतें। यह व्यंग्य बताता है कि आज कवि सम्मेलनों का मकसद मनोरंजन और कमाई रह गया है, साहित्यिक संदेश नहीं।

Book Review of Roses and Thorns | Satire, Humor & Roses and Thorns

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 22, 2025 Book Review 1

The well-known humorist, blogger, and satirist Dr. Ankit Sharma—who is not just a “doctor by name” but also by profession—recently read my book Roses and Thorns. This review is shared exactly as I received it. And playfully, if you still feel my book (₹190) isn’t worth it, recover your money directly from him! 😀

The Philosophy of “Purushkaar” (Award-ism)

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 21, 2025 English-Write Ups 0

The hunger for awards has turned into a literary disease—treated at roadside “Purushkaar stalls” like quack clinics. A writer without an award looks impotent; with one, even neighbors doubt it’s genuine: “So, where did you pull this off from?” The real nightmare begins with the Thank You Speech—who to mention, who to skip? This, indeed, is the philosophy of Award-ism.

हारे हुए प्रत्याशी की हाल-ए-सूरत-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 3, 2025 व्यंग रचनाएं 0

चुनाव हारने के बाद नेताजी के चेहरे की मुस्कान स्थायी उदासी में बदल गई। कार्यकर्ता सांत्वनाकार बन चुके हैं, बासी बर्फी पर मक्खियाँ भिनभिना रही हैं, और भैंस का उदाहरण देते हुए आलाकमान ने नेताजी को समझाया — “राजनीति भी दुधारु भैंस है, एक दिन बाखरी होनी ही पड़ती है।”