Dr. Mukesh Aseemit Creations—शब्द, स्वर और संवेदना का संसार
शब्दों में व्यंग्य, सुरों में संवेदना और रचनाओं में अपने समय की धड़कन—‘Dr. Mukesh Aseemit Creations’ साहित्य, मौलिक संगीत, कविता, भक्ति और सामाजिक चिंतन का एक रचनात्मक YouTube मंच है।
शब्दों में व्यंग्य, सुरों में संवेदना और रचनाओं में अपने समय की धड़कन—‘Dr. Mukesh Aseemit Creations’ साहित्य, मौलिक संगीत, कविता, भक्ति और सामाजिक चिंतन का एक रचनात्मक YouTube मंच है।
बजट आया, बसंत आया, सत्ता ने इसे बहार कहा, विपक्ष ने पतझड़ और आम आदमी ने अपनी खाली थाली देखी। इसी बीच राष्ट्रपति भवन में दिवंगत कवियों का काल्पनिक महासम्मेलन सजता है, जहाँ हर कवि अपने अंदाज़ में बजट का हिसाब पूछता है।
लोकतंत्र, राजनीतिक बहस, आरोप-प्रत्यारोप और पंचायत की अराजकता पर आधारित डॉ. राम कुमार जोशी का तीखा एवं हास्यपूर्ण हिंदी व्यंग्य।
"टैंकर देखकर प्यास बुझाओ" प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रदीप औदिच्य की एक मार्मिक और तीखी व्यंग्य रचना है, जिसमें ग्रामीण भारत की जल समस्या, सरकारी विभागों की लालफीताशाही, कागजी विकास, हैंडपंपों की दुर्दशा और फोटो-आधारित राजनीति पर करारा कटाक्ष किया गया है।
आज के समय में सिर्फ बात करना काफी नहीं है, बात में वज़न भी होना चाहिए। राजनीति से लेकर मीडिया, ज्योतिष, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा जगत तक हर जगह "भारी" शब्द का बोलबाला है। डॉ. मुकेश असीमित का यह व्यंग्य उसी मानसिकता पर चुटीला कटाक्ष है, जहाँ हल्की बातों की कोई कीमत नहीं और हर चीज़ को खबर बनने के लिए भारी होना ज़रूरी है।
“जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।” “व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है।” “मैंने केवल अवसर लिए, नियमों को समझा और संबंध निभाए।” “जब ‘मैं ही राष्ट्र’ हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?” “पहले जमीन अपने नाम कराओ, फिर विकास का इंतजार करो।”
जब साहित्य प्रयोगशाला बन जाए, पुरस्कार गुरुत्वाकर्षण से गिरने लगें और चापलूसी ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की जगह ले ले — तब न्यूटन, आर्किमिडीज़ और डार्विन भी व्यंग्य में प्रवेश कर जाते हैं। डॉ. मुकेश ‘असीमित’ का समकालीन साहित्य पर तीखा, चुटीला और वैज्ञानिक कटाक्ष।
बब्बन चाचा ने परदादा की संदूक में रखी मूँछें निकालकर इतिहास को चेहरे पर चिपका लिया। अब वे हर सुबह ‘इतिहास अलाप’ करते हैं और वर्तमान को ताले में बंद कर देते हैं—क्योंकि आजकल असली मेहनत से ज्यादा आसान है विरासत पहन लेना।
शहर की टूटी सड़कों और बजबजाती नालियों के बीच जब नेताजी की छवि भी पैबंददार हो गई, तो समाधान आसमान से उतरा—हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा। फर्क बस इतना पड़ा कि फूल जनता पर कम और नालियों में ज़्यादा गिरे, मगर नेताजी की छवि पर चढ़ा नया प्लास्टर खूब चमक गया।
महिला दिवस पर मंचों, भाषणों और सोशल मीडिया के शोर के बीच एक सवाल बार-बार उठता है—क्या सचमुच महिलाओं के जीवन में कुछ बदलता है? यह व्यंग्य रचना उसी विडंबना को उजागर करती है, जहाँ सम्मान के समारोह तो बहुत हैं, पर असली महिला आज भी श्रम, जिम्मेदारियों और असमानताओं के चक्र में उलझी हुई है।