Vivek Ranjan Shreevastav
Mar 23, 2026
हिंदी कविता
1
कुरुक्षेत्र से लेकर विश्व युद्धों तक मानव इतिहास संघर्षों से भरा रहा है, जहाँ विजय और पराजय के बीच अंततः पीड़ा ही शेष रही। यह कविता आधुनिक युद्धोन्माद के बीच प्रेम को एक ऐसी “पैट्रियाड मिसाइल” के रूप में खोजती है, जो नफरत की “स्कड मिसाइलों” को जन्म लेने से पहले ही निष्क्रिय कर सके।
Shakoor Anvar
Mar 21, 2026
गजल
0
फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं—
यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है,
और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है—
कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?
Ram Kumar Joshi
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
2
यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
Poems
0
यह रचना हिंदी को “राजभाषा” के तमगे से बाहर निकालकर
दफ़्तर, घर, गली और मनुष्य के बीच खड़ी दीवार पर सवाल करती है—
क्या भाषा सिर्फ़ एक दिन का उत्सव है
या रोज़ की साँस?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 31, 2025
हिंदी कविता
0
वर्ष पच्चीस एक ही नहीं था—वह हर व्यक्ति के लिए अलग निकला।
कहीं हँसी थी, कहीं आँसू;
कहीं खजाना भरा, कहीं खाली हाथ।
यह कविता समय की उसी भीड़ को दर्ज करती है
जहाँ हर जीवन अपना-सा सच लेकर चलता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 29, 2025
हिंदी कविता
0
चार दीवारों के भीतर
धीरे-धीरे
गलता जीवन,
और बाहर
चमकता ताला—
संस्कार ज़िंदा थे,
बस माता-पिता नहीं रहे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 26, 2025
हिंदी कविता
1
“मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ, और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।”
“‘राजभाषा’ कहलाती मैं, फिर क्यूँ हर वाक्य के बाद खिचड़ी सी हो जाती मैं।”
“ये तालियाँ हैं या सिर्फ़ एक दिन का उत्सव—हिंदी दिवस।”
“हमें हिंदी से मोहब्बत है—जीती-जागती, सुलगती, बोलती-लड़ती मोहब्बत!”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 8, 2025
Book Review
4
"तुम मेरे अज़ीज़ हो" सिर्फ प्रेम का नहीं, आत्म-संवाद, स्मृति और मौन की यात्रा है। पंकज त्रिवेदी की सरल भाषा में छिपे गहन भाव, प्रेम को एक दार्शनिक और अनुभूतिपरक अनुभव में बदल देते हैं। यह संग्रह पढ़ने नहीं, भीतर महसूस करने के लिए है।