डॉ मुकेश 'असीमित'
May 29, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज के समय में सिर्फ बात करना काफी नहीं है, बात में वज़न भी होना चाहिए। राजनीति से लेकर मीडिया, ज्योतिष, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा जगत तक हर जगह "भारी" शब्द का बोलबाला है। डॉ. मुकेश असीमित का यह व्यंग्य उसी मानसिकता पर चुटीला कटाक्ष है, जहाँ हल्की बातों की कोई कीमत नहीं और हर चीज़ को खबर बनने के लिए भारी होना ज़रूरी है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।”
यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।
Prem Chand Dwitiya
Feb 4, 2026
व्यंग रचनाएं
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पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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नया साल समय के बदलने का नहीं, सोच के बदलने का उत्सव है।
प्रकृति जहाँ निरंतरता में जीती है, वहीं मनुष्य हर साल खुद से पूछता है—क्या मैं यही रहना चाहता हूँ?
यह लेख नए साल के उत्साह, मनुष्य की अनुकूलन क्षमता और पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने की मानवीय बेचैनी पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि डालता है।
Pradeep Audichya
Dec 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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चौराहे पर बैठा वह कोई साधारण जानवर नहीं था—वह डर, लापरवाही और व्यवस्था की मिली-जुली पैदाइश था। उसकी गुर्राहट में कानून की चुप्पी और उसके सींगों में सत्ता की स्वीकृति चमक रही थी।