डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 22, 2025
आलोचना ,समीक्षा
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पश्चिमी साहित्य में ऑस्टेन, स्विफ्ट, ऑरवेल और हक्सले जिस तीक्ष्ण हास्य से समाज और सत्ता की विसंगतियों को खोलते हैं, वहीं हिंदी में परसाई, शरद जोशी और चतुर्वेदी उसी परंपरा को देसी अंदाज़ में आगे बढ़ाते हैं। व्यंग्य भाषा नहीं देखता—वह मनुष्य की आदतों, पाखंड, लालच, दिखावे और सामाजिक मूर्खताओं पर चोट करता है। यही कारण है कि व्यंग्य वैश्विक भी है और गहरे स्थानीय भी।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 5, 2025
व्यंग रचनाएं
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सड़कों पर “देवता-तोल” का नया युग — जहाँ खतरनाक मोड़ और पुल नहीं, बल्कि चढ़ावे की रसीदें आपकी जान बचाती (या बिगाड़ती) हैं। सरकार टेंडर दे, देवता ठेका ले — वाह री व्यावसायिक भक्ति!
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 4, 2025
आलोचना ,समीक्षा
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“साहित्य के बाजार में आज सबसे सस्ता माल है ‘महानता’। पहले पहचान विचारों से होती थी, अब फॉलोअर्स और लॉन्च-इवेंट से होती है। व्यंग्य अब साधना नहीं, रणनीति बन गया है। व्यवस्था की आलोचना करने वाला अब उसी व्यवस्था का पीआर एजेंट बन बैठा है। असली लेखक कोने में खड़ा है, और मंच पर नकली लेखक चमक रहा है। विरासत अब शाल और शिलालेख में सिमट गई है — सवालों में नहीं। व्यंग्य की परंपरा विरोध में जन्म लेती है, करुणा में जीती है — और उसी करुणा को अब मार्केटिंग ने निगल लिया है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 23, 2025
व्यंग रचनाएं
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दिवाली के बाद—यह चार शब्द किसी भी अधूरे काम, टली हुई ज़िम्मेदारी और बचने की कला का ब्रह्मास्त्र हैं। शादी से लेकर कर्ज़ चुकाने तक, सुबह की वॉक से लेकर किताब छपवाने तक, सबके लिए यही बहाना! दिवाली से पहले सफाई-रंगाई के पटाखे फूटते हैं और दिवाली के बाद उधारी-बिल-किश्त के बम। सच कहें तो असली फुलझड़ी बहानों की ही होती है, जो हमेशा चमकती रहती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 12, 2025
व्यंग रचनाएं
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श्राद्ध पक्ष में कौवों की कमी ने परम्पराओं को भी स्टार्टअप बना दिया। अब्दुल चाचा दो कौवे पालकर खीर चखवाने का 101 रुपये वाला ‘डिलीवरी सेवा’ चला रहे हैं। पर असली ‘कागभुशुंडी’ तो कलियुग का जमाई है—जाति-धर्म से परे, ससुराल की मुंडेर पर बैठकर कांव-कांव करता और थाली में पहला निवाला पक्का करता। कौवे न मिलें तो जमाई ही तर्पण का ब्रांड एम्बेसडर, नाग पंचमी तक आउटसोर्सिंग पक्की! हो जाएगी
Vivek Ranjan Shreevastav
Jul 1, 2025
Blogs
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आधुनिक भारतीय परिवारों में उभरती वर्चुअल पूजा की परंपरा को दर्शाता है, जहाँ सास और बहू तकनीक के माध्यम से पूजा में जुड़ी हैं — एक संस्कृति और टेक्नोलॉजी का मिलन।
Dr Amit Goyal
Jun 22, 2025
हिंदी कहानी
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मैंने अपने क्लीनिक में प्रवेश किया। कई मरीज़ विश्राम कक्ष में बैठे हुए थे। कुछ के चेहरे पर संतोष था—शायद मेरे इलाज से उन्हें लाभ हुआ हो। कुछ आशंकित मुद्रा में बैठे थे—शायद पहली बार आए थे या फिर पूर्ववर्ती इलाज से संतुष्ट नहीं थे। एक वृद्ध सज्जन इधर-उधर टहल रहे थे। सफ़ेद दाढ़ी थोड़ी […]