“दीवारों का कैनवास और-दीवारें फिर बोल उठी
बचपन में ले चलता हूँ… क्या करूँ, सारी मीठी यादें तो बचपन के पिटारे में ही रह गईं। बिल्कुल उसी दादी माँ के पिटारे की तरह, जिसे हम उनकी नज़रों से बचाकर उत्सुकतावश खोल ही लेते थे। मन में कौतूहल—आख़िर दादी इस पिटारे में क्या छुपाकर रखती हैं? और जब खोलते तो उनमें से निकल आतीं कुछ मीठी संतेरे की गोलियां , जिनका स्वाद आज के बड़े-बड़े कैडबरी–फाइव स्टार पैक में भी चुटकीभर नहीं मिलता। वही अनोखा स्वाद—मीठी यादों का।
तो याद करते हैं उन दीवारों को, जिन्होंने हमारी ज़िंदगी का पहला कैनवास रचा। कच्ची–पक्की दीवारें… स्कूल की गलियाँ… घर की मिट्टी और गोबर से लिपी–पुती दीवारें। यही तो थीं हमारी एकलव्य कला की पट्टिकाएँ, जहाँ हम अपनी कल्पनाओं को उकेरते थे। पेन–पेंसिल कहाँ! खड़िया मिटटी का टुकड़ा, स्कूल से कबाड़े गए चाक और बरते का टुकड़ा ,ईंट–पत्थर का खंड, कोई कंकड़, नुकीली टीकटी या बांस की खपच्ची ही हमारी कलम हुआ करती थी। और जो उभरता था उन दीवारों पर—टेढ़ी–मेढ़ी रेखाओं में क, ख, ग, घ, ङ के साथ छिपी हमारी मौलिक प्रतिभा। वही पहली बार दिल के गुबार, पहला प्यार, पहली चिट्ठी का इज़हार—कभी ग़ालिब की शायरी को भी शर्म से पानी कर देने वाली शायरी , कभी मास्टर जी के गंजे सिर के नीचे 440 वोल्ट के खतरे के निशान पर दो हड्डियों की आकृति… सब जगह हमारी रचनात्मकता ही तो बिखरी पड़ी थी।
लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते गए, सब कुछ बदलने लगा। हमें ‘सभ्यता’ का बोरियत भरा पाठ पढ़ाया गया। कहा गया—“दीवारों को गंदा मत करो।” जो हमारे लिए कैनवास थीं, वे अचानक महज़ ‘दीवारें’ कहलाने लगीं। और हमारी कला, हमारी रचनात्मकता, हमारी साहित्यिक प्रतिभा, सबके सामने खड़ी होकर वह सच में एक ‘दीवार’ ही बन गई।
फिर भी, कुछ स्मृतियाँ अब तक उस बड़े कैनवास से चिपकी रह गईं—छूटती ही नहीं। तभी तो, आज भी कहीं–कहीं ट्रेन और बसों की सीटों के पीछे, रेलवे वॉशरूम की दीवारों पर, सरकारी इमारतों की दिवारों पर अपने खोए हुए प्यार के नाम दो–चार शेर चिपका ही आते हैं। नहीं तो गुस्से में किसी लड़की का मोबाइल नंबर ही सार्वजनिक कर डालते हैं।चलती बस और ट्रेन में अपनी रचनात्मकता को बिना हिले दुले अंजाम देना अपने आप में एक स्किल थी l
कुछ लोगों ने तो अपने प्यार के लिए भारतीय मुद्रा को सबसे बड़ा संदेशवाहक समझ लिया—“आई लव यू फलाना–ढिमकाँ” जैसे संदेश नोटों पर लिखकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला दिए। मगर प्रेम के दुश्मनों ने ऐसे कानून बना दिए कि इन सब पर पाबंदियाँ लग गईं। अब बेचारा प्रेमी न सार्वजनिक इज़हार कर पाए, न किसी सोनम बेबफा को बदनाम कर पाए ,ना ही दीवारों पर अपनी कविता लिख पाए। और अगर लड़की के सामने इजहार करने की हिमाक़त करे तो सर फुटब्बल की नौबत तक आ जाए। कम से कम कहीं तो एक ऐसी सुरक्षित जगह होनी चाहिए, जहाँ इंसान अपने दिल की बात कह सके… बिना अपनी जान और सम्मान की बाज़ी लगाए।
ख़ैर…
फिर आया दौर सरकार की योजनाओं और बाज़ार के प्रचार प्रसार का।सरकार का जन-हितैषी प्रेम सार्वजानिक होने लगा l जो वायदे मुखाग्नि से किये गए , उनके पूर्णाहुति दीवारों की यज्ञशाला में दी गयी l दीवारें एक बार फिर से विशाल कैनवास बनकर उभर आईं। जगह-जगह चिपके बड़े-बड़े पोस्टर—“नसबंदी करवाओ ”, “दो बच्चे सबसे अच्छे”, “बेटी पढ़ाओ”, “गरीबी हटाओ”, “परिवार नियोजन अपनाओ”—इन्हीं नारों से दीवारें लदने लगीं।
बाज़ार भी पीछे कहाँ रहने वाला था। साबुन, तेल, क्रीम, पाउडर लिए कसमसाती क़ामुक निगाहों वाली कच्ची उम्र की बालाएँ पोस्टरों में मुस्करातीं—जिन्होंने जवानों को ही नहीं, बूढ़ों तक को लुभा लिया। दो दिन में गोरा बनने की कला ने अनगिनत ‘कल्लूओं ’ को मुनगेरीलाल के हसीन सपनों का चस्का दिला दिया। मानो दीवारें अब सिर्फ़ पोस्टरों और बैनरों के लिए ही बनी हों।
धीरे-धीरे ये दीवारें राजनीति का अखाड़ा बन गईं। नेताओं की धमाचौकड़ी, जूतमपैजार, थोक भाव वादे, खोखली घोषणाएँ, फ़रेबी नारों से दीवारों का बार-बार बलात्कार हुआ। जनता सिर झुकाए इन्हें ताकती रही। बीच-बीच में चुनाव आयोग ने सुध ली और कुछ दीवारों को राहत मिली—जिन्हें नीली पट्टियों और ‘रिजर्व्ड ’ का कवच मिल गया। वे चमचमाती दीवारें किसी सेलिब्रिटी के चिकने गालों की तरह इतरा उठीं, मगर टूटी-फूटी सरकारी इमारतों की दीवारें अब भी बेसहारा खड़ी रह गईं। उन पर न कोई नारा, न कोई पोस्टर, न ही पुताई–रंगाई—ये सब सिर्फ सरकारी फ़ाइलों में ही पूरी होती रही। लेकिन उनकी यह विरह व्यथा ज्यादा दिन नहीं रही l
फिर इस देश के गुटखा–एसोसिएशन और पीक–वीरों ने इन्हें सँभाला। किसी कलाकारी की तरह अपनी पीक की धार से ऐसी अमूर्त चित्रकारी रची कि दीवारें सचमुच रंगीन हो उठीं। इसी क्रम में देश के दानवीरों ने भी योगदान दिया—वे दानी, जो मूत्रदान करते थे! ये ‘महादान’ रक्तदान, अंगदान, कन्यादान की ही बिरादरी में गिना जाने लगा। इन्हीं को ध्यान में रखकर लिखा जाने लगा—“यहाँ मूत्रदान न करें।” पर हमारे दानवीरों ने इसे आव्हान समझा और अपनी थैली हल्की करने में जुट गए। दीवारें भीगी, पस्त और कराहती सी लगने वाली दीवारें ,जनम-जनम की मानो प्यास से तड़प रही हों ,इस बिन मौसम बारिश में भीग कर मनो तृप्त हो गयी ।
लेकिन कुछ अमूर्त विचारकों को अपनी साहित्यिक प्रतिभा दिखाने का मौक़ा फिर भी न मिला। ये वो विचारक थे जिनके अमूर्त विचार जो दिमाग में भरे हुए सडांद मारने लगी थी,उसका निस्तारण जरूरी हो गया था,उसे बहर निकलकर मूर्त रूप देना अवश्यम्भावी हो गया था l घर का कचरा तो गली-नालियों में फेंक देते थे लोग, मगर दिमाग़ का कचरा कहाँ डालें?
यहीं पर सोशल मीडिया ने उनकी पुकार सुनी। ऑर्कुट जैसी साइटें पहले ही इस स्वाभाविक स्क्रिबलिंग की प्रक्रिया को जीवित कर चुकी थीं। लेकिन फेकबुक (Facebook) ने इसे वैश्विक मंच दे दिया। यहाँ हर कोई अपनी बचपन की अधूरी शायरी, पहले प्यार का इज़हार, आड़ी-तिरछी लकीरें, अधूरे ख्वाब, ग़ुस्से के अंगार—सब कुछ दीवार पर उकेर सकता था।
और जैसे असल ज़िंदगी में आदत रही—“कचरा अपने घर का दूसरे के आँगन में डालो”—वैसे ही फेकबुक ने टैगिंग का हथियार पकड़ा दिया। अब बस अपना कचरा पोस्ट करो और टैग कर दो—पड़ोसी की दीवार पर जा पहुँचेगा। जन्म-मरण, तीज-त्यौहार, सुहागरात, हनीमून, बच्चे की पहली पोटी तक—हर इवेंट तुरत दीवार पर डाल दो।
कुछ तो इतने बेबाक निकले कि कचरा–उत्पादन की लाइव तस्वीरें तक दिखाने से नहीं चूके। और जब दूसरों की ऊँची दीवारों तक चढ़ने में दिक़्क़त आई तो नकली आईडी बनाकर घुस आए बेडरूम (मेरा मतलब है—मेस्सेंजर की दीवारों तक। वहाँ पहुँचकर भी अपने ठरकीपन की वमन करने से पीछे नहीं हटे।
मजेदार बात यही रही की बचपन के दिन लौट आये हैं..l दीवारें फिर से बोलने लगी है..l दीवारें आपके गाँव के स्कूल ,पंचायत,सहकारी भवन से मूव करके अब सोशल मीडिया पर एक नए अंदाज में कोरे कागज की तरह आपका इंतज़ार कर रही है l अपनी रंगबाजी का जलवा दिखाएं और इन्हें रंगीन करें ,ख़राब करें ,इन पर मूत्र विसर्जन करें सब आपकी मर्जी..क्यों की आपको अभिव्यक्ति की आजादी मिली है l
और अगर सरकार इसे ही “अच्छे दिन” कहे तो कोई अचरज नहीं!

डॉ. मुकेश असीमित
✍ लेखक, 📷 फ़ोटोग्राफ़र, 🩺 चिकित्सक