हमारे शहर में भी ‘मोयतो’ की धूम

डिज़ाइनर ग्लास जिसमें परोसा गया वो भी ऐसे था जैसे कोई कमसिन सुकुमारी बीच गर्ल जैसी काया लिए इठलाई खडी हो , उसमे स्ट्रा भी अपनी कमर को बीच में से बेली डांस की मुद्रा में 90 डिग्री झुकाए सजाई गयी थी, ग्लास के एक कोने में नींबू की एक कतली को फंसाया हुआ था और साथ ही गर्मी की तेज धूप में सूख चुकी एक हरी मिर्च भी फंसी हुई थी .

लो जी, हमारे शहर में भी आ गया ‘मोज़िटो’… नहीं, नहीं, ‘मोयतो’। इसे ‘मोयतो’ कहते हैं, यह भी मेरे बेटे ने बताया, जब मैंने रेस्टोरेंट से आकर उसे फोन पर बताया कि आज तो हम भी ‘मोज़िटो’ पीकर आए हैं। पहले तो उसे समझ में ही नहीं आया कि पापा आज कैसे पीए हुए जैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। पता नहीं क्या पीकर आ गए! फिर उसने मुझे करेक्ट करते हुए कहा, “पापा, उसे ‘मोयतो’ कहते हैं।”

दरअसल, शहर में एक नया-नया फ़ास्ट फ़ूड सेंटर खुला है। वैसे तो शहर में कई देसी फ़ास्ट फ़ूड के ठेले गली-मोहल्लों में अटे पड़े हैं, जहाँ करीने से सजी हुई मसालेदार—मेरा मतलब तीखी मिर्चीदार—चाट-पापड़ी, पानी-पतासे, दही-बड़े, गुंजिया और उनके ऊपर भिनभिनाती मक्खियों की टॉपिंग इन्हें लुभावना बनाती है। ठेले वाले के पसीने से तरबतर हाथों की कुछ टपकी हुई बूंदों से पतासी का घोल और भी नमकीन हो जाता है। शहरवासी लाइन में लगकर इस देसी फ़ास्ट फ़ूड के चटखारे लेने और बाद में खट्टी डकारें लेने के आदी हो चुके हैं।

ऐसे में फ़ास्ट फ़ूड का यह विलायती संस्करण शहर में खुलना वास्तव में शहरवासियों की आराम से कट रही ज़िंदगी में भूचाल लाने जैसा है। शाम को काम-धंधे से थके-हारे लौटे पतियों को घर में घुसते ही बस बीबी की एक ही फरमाइश सुनाई दे पड़ रही है—“सुनो जी, शहर में फ़ास्ट फ़ूड सेंटर खुला है, हमें भी ले चलो।”

पति बेचारे इस शर्त के साथ कि “आज तुम्हारी री-री मिटा देता हूँ, फिर साल भर की छुट्टी,” उन्हें इस फ़ास्ट फ़ूड सेंटर में ले जा रहे हैं। नाम भी सेंटर का बढ़िया-सा विलायती रखा गया है, ताकि लोगों को सोशल मीडिया में सेल्फी खींचकर पोस्ट करने और इम्प्रेशन झाड़ने में आसानी हो कि लो जी, हम भी लुत्फ़ उठा रहे हैं फ़ास्ट फ़ूड सेंटर का!

खैर, हमारी टेबल पर आधे घंटे बाद जो हमने मंगवाया, वह विलायती बला आ गई। हम भी बड़ी उत्सुकता से इस लुभावनी विलायती बला का इंतज़ार कर रहे थे। मन ही मन सोच रहे थे, चलो आज तक जो फिल्मों में देखा है कि कैसे हीरो-हीरोइन डेट पर जाते हैं, वहाँ ऐसी ही कोई बला-बला मंगाते हैं और फिर उसकी पींगें लेते हुए प्यार की पींग बढ़ाते हैं।

हमें तो अभी तक यही लगा था कि यह कोई अंग्रेज़ी शराब जैसी चीज़ होती है, इसलिए ऑर्डर देने से पहले हमने यह सुनिश्चित कर लिया था कि इसमें अंग्रेज़ी जैसी कोई चीज़ तो नहीं है ना? वेटर ने कहा, “नहीं सर, बस नाम ही अंग्रेज़ी है। यह हमारे देसीपन को सुहाता पाचक पेय पदार्थ ही है।”

हमने अपने रूटीन मध्यमवर्गीय क्लास-टाइप का ऑर्डर दिया—“एक के दो करके ले आना।”

वेटर हँसा, बोला, “सर, इसमें हाफ नहीं होता।”

हमने कहा, “चलो, कोई नहीं, स्ट्रॉ दो ले आना।”

और हमें एक ही प्याले में दो स्ट्रॉ डालकर कुछ रोमांटिक-सा वह फ़िल्मी सीन याद आ गया। सोचा, चलो हम भी कुछ फ़िल्मी करते हैं। हम भी श्रीमती जी के साथ इस एक प्याले में दोनों पीकर हमप्याला हो जाएँगे। श्रीमती जी की शिकायत भी थी कि डेटिंग पर नहीं ले गए, सीधे ही ब्याह रचा दिया। आज उस टीस को भी दूर करने का अवसर था।

जैसे ही ऑर्डर आया, हमने निगाह चारों तरफ घुमाई। अपने अतिउत्साहित, गर्वित दिल को ठेस लगी, जब देखा कि रेस्टोरेंट में सभी टेबलों पर बैठे हुए जवान, बूढ़े, कपल, लड़के-लड़कियाँ और बुर्के, लहंगे, साड़ी से आवृत्त महिलाएँ—सभी ने इसी बला का ऑर्डर दिया हुआ था। कोई पीने में व्यस्त, कोई उसे घूरने में व्यस्त, कोई उसके साथ सेल्फी खिंचाने में व्यस्त।

हमने इसे गौर से देखा, उसके बाद श्रीमती जी को देखा, फिर काफ़ी देर देखने के बाद इसे श्रीमती जी की तरफ सरका दिया। फिर श्रीमती जी उसका बारीकी से मुआयना करने लगीं। उसका नाम, जो वेटर ने बताया था, हम भूल गए थे। इसलिए दुबारा मेनू कार्ड देखा। नाम का उच्चारण अटपटा-सा था, तो उसे याद रखने के लिए मेनू कार्ड से नाम का फोटो खींच लिया, ताकि बाद में बता तो सकें कि इस बला का आखिर नाम क्या था।

डिज़ाइनर ग्लास, जिसमें परोसा गया, वह भी ऐसा था जैसे कोई कमसिन सुकुमारी बीच-गर्ल जैसी काया लिए इठलाती खड़ी हो। उसमें स्ट्रॉ भी अपनी कमर को बीच में से बेली-डांस की मुद्रा में 90 डिग्री झुकाए सजाई गई थी। ग्लास के एक कोने में नींबू की एक कतली फँसाई हुई थी और साथ ही गर्मी की तेज धूप में सूख चुकी एक हरी मिर्च भी फँसी हुई थी। प्याले ने सिर्फ अपने सिरे के ऊपरी भाग में थोड़ी-सी उथली जगह दे दी थी, जिसमें वह द्रव्य समाया हुआ था, जिसे हमें पीना था।

ऐसा लग रहा था जैसे किसी नरेगा के मज़दूर ने सूखे बंजर खेत में तालाब की खुदाई की हो। बस इतनी-सी जगह उस प्याले में थी। हमें भी किसी गुमनाम शायर का शेर याद आ गया—

आज इतनी भी मयस्सर नहीं मयखाने में,छोड़ दिया करते थे जितनी कभी पैमाने में।”

बीच में भरे द्रव्य में कुछ पुदीने की पत्तियाँ तैर रही थीं, मानो कोई जलपरी स्विमिंग पूल में तैर रही हो। बीच-बीच में कुछ बर्फ के हिमखंड भी पड़े हुए थे। लग रहा था मानो गर्मी की तेज धूप से पिघलकर हिमखंड सीधे इस प्याला-रूपी सागर में समा गए हों। वाह रे ग्लोबल वार्मिंग! सीधा नज़ारा, वह भी मेरे प्याले में!

“सर, कुछ और ऑर्डर है?”

इन शब्दों के साथ हमारी तंद्रा टूटी। वेटर हमें जल्दी से प्याला खाली करके टेबल खाली करने का इनडायरेक्ट आदेश दे चुका था। कुछ लोग वहाँ खड़े हमारे इस सौंदर्य-दर्शन के खत्म होने का इंतज़ार कर रहे थे।

हमने और श्रीमती जी ने झट से मोबाइल निकाला और पाँच आड़ी, तिरछी, उलटी-सीधी सेल्फियाँ उस ‘मोयतो’ बला के साथ लीं। तुरत-फुरत फेसबुक पर डाला, इस कोशिश में कि कुछ लाइक्स और कमेंट हम भी बटोर लें। जब सभी फेसबुक की बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं, तो हमें भी ‘फोटो खींचो और फेसबुक पर डालो’ रूपी पुण्य कार्य कर लेना चाहिए।

इसके बाद उस पेय पदार्थ को एक ही साँस में स्ट्रॉ द्वारा खींच लिया गया। एक डकार वैसे तो अपने रौद्र स्वरूप में आने को आतुर होकर हमारे गले तक आई, लेकिन हमने उसे लोक-लाज के लिहाज़ से रेस्टोरेंट के बाहर जाने तक दबाए रखा।

वहाँ से उठकर बिल अदा किया। जैसे ही बाहर निकले, श्रीमती जी ने पूछा, “कितने का था?”

मैंने कहा, “90 रुपये का।”

“स्वाद कैसा लगा?”

मैंने कहा, “वैसा ही, जैसा नींबू पानी तुम बनाती हो। उसमें पुदीना डालती हो, थोड़ा जलजीरे का मसाला भी। हाँ, जो ब्लू कलर था, वह कौन-सी कंपनी का था, यह पता नहीं लग पाया।”

श्रीमती जी के चिंतित भावों की अग्नि को शांत करते हुए मैंने बात आगे बढ़ाई—

“अरे, ज़्यादा दिमाग मत लगाओ। 10 रुपये का जलजीरा और 80 रुपये उस डिज़ाइनर ग्लास के, साथ ही उस बला के विलायती नाम के हैं, जो तुम्हें अब भी याद नहीं है। और हाँ, आज हमें भी इस बला ने आम आदमी से उठाकर उन अत्याधुनिक, सेवन-स्टार, मॉडर्न ज़माने की श्रेणी में खड़ा कर दिया है! यह सब मिलाकर तो इसकी कीमत कुछ भी नहीं है!”

श्रीमती जी ने मोबाइल में उसके नाम का खींचा हुआ फोटो एक बार दुबारा देखा और मन ही मन उसका थोड़ा उच्चारण किया। घर जाकर श्रीमती जी यूट्यूब पर इस ‘मोयतो’ बला को बनाने की विधि के वीडियो देख रही हैं।

अब अगले पंद्रह दिन घर में रोज़ इस होममेड ‘मोयतो’ का देसी संस्करण बनाया जाएगा। उसके लिए खास डिज़ाइनर ग्लास भी ऑर्डर दे दिए गए हैं।

आपको भी पीना है तो पधारिए मेरी झोंपड़ी में—

अहो भाग्य हमारे!

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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