भूमिका
कभी-कभी किसी पुराने गीत की एक पंक्ति मन में इस तरह ठहर जाती है कि वह समय के साथ एक बिल्कुल नई रचना का बीज बन जाती है। फिल्म सिलसिला के कालजयी गीत की भावभूमि—“मैं और मेरी तन्हाई…”—बरसों से मन के किसी कोने में बसी हुई थी। उसी आत्मसंवादी शैली ने एक दिन मेरे मन में एक नया प्रश्न जगाया—यदि मैं अपनी हिंदी के साथ अकेले बैठकर बातें करूँ, तो वह मुझसे क्या कहेगी?
यहीं से जन्म हुआ मेरी कविता—“मैं और मेरी हिंदी” का।
यह उस प्रसिद्ध गीत का रूपांतरण नहीं, बल्कि उसकी आत्मसंवादी शैली से प्रेरित एक स्वतंत्र और समकालीन रचना है। इसमें तन्हाई की जगह हिंदी मेरे सामने बैठी है—कुछ उदास, कुछ नाराज़, कुछ व्यंग्य करती हुई और फिर भी अपने लोगों के बीच पूरी जीवंतता से साँस लेती हुई।
अब इस कविता को संगीतबद्ध करके एक भावपूर्ण गीत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पूरा गीत YouTube पर उपलब्ध है। लिंक इस ब्लॉग पोस्ट में नीचे साझा किया गया है—एक बार अवश्य सुनिए।
इस कविता के जन्म की कहानी
हम हर वर्ष हिंदी दिवस मनाते हैं। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, हिंदी के सम्मान में फूल-मालाएँ अर्पित की जाती हैं और राजभाषा के गौरव पर लंबे वक्तव्य दिए जाते हैं। लेकिन समारोह समाप्त होते ही हिंदी फिर सरकारी फाइलों के किसी कोने, कार्यालय की किसी पट्टिका अथवा भाषण की शुरुआती दो पंक्तियों तक सीमित होकर रह जाती है।
हिंदी को सम्मान तो मिलता है, लेकिन सहज स्वीकार्यता कितनी मिलती है?
दफ्तरों और औपचारिक बैठकों में अंग्रेज़ी बोलना आज भी कई बार योग्यता, आधुनिकता और प्रतिष्ठा का प्रमाण मान लिया जाता है। वहीं अपनी बात सहज हिंदी में रखने वाला व्यक्ति कभी-कभी कम पढ़ा-लिखा या पिछड़ा समझ लिया जाता है। यह विरोधाभास भीतर तक विचलित करता है।
इन्हीं अनुभवों और प्रश्नों ने कविता की इन पंक्तियों को जन्म दिया—
मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ
और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।
यह केवल हिंदी भाषा की पीड़ा नहीं है। यह उस मानसिकता पर प्रश्न है जो भाषा को संप्रेषण का माध्यम कम और सामाजिक हैसियत का पैमाना अधिक मानने लगी है।
हिंदी की वर्तमान स्थिति: विस्तार भी, विडंबना भी
आज हिंदी के सामने एक विचित्र स्थिति है। एक ओर हिंदी सिनेमा, गीत-संगीत, सोशल मीडिया, डिजिटल वीडियो, पॉडकास्ट और इंटरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया में सुनी और समझी जा रही है। नई पीढ़ी हिंदी में रील बना रही है, कविता सुन रही है और अपनी बात लाखों लोगों तक पहुँचा रही है।
दूसरी ओर औपचारिक शिक्षा, उच्च प्रशासन, चिकित्सा, विज्ञान, तकनीक और कॉरपोरेट जगत में हिंदी को अभी भी वह सहज स्थान नहीं मिल पाया है जिसकी वह अधिकारी है।
हिंदी कहीं पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है, परंतु अनेक स्थानों पर उसकी उपस्थिति प्रतीकात्मक है—
कभी बोर्ड पर,
कभी पोस्टर पर,
कभी भाषण की शुरुआत में—
और फिर कहीं सरकारी
फाइलों के रोस्टर पर।
सबसे बड़ी चिंता हिंदी और अंग्रेज़ी के बीच संघर्ष पैदा करना नहीं है। अंग्रेज़ी सहित प्रत्येक भाषा ज्ञान और संवाद का द्वार है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी भाषा का ज्ञान श्रेष्ठता और किसी दूसरी भाषा से प्रेम हीनता का प्रमाण बना दिया जाता है।
हमें अंग्रेज़ी का विरोध नहीं करना है; हमें हिंदी के प्रति अपने संकोच और हीनभावना का विरोध करना है।
हिंदी केवल राजभाषा नहीं, जनभाषा है
हिंदी की वास्तविक शक्ति सरकारी आदेशों में नहीं, जनजीवन में है। वह माँ की लोरी में है, भाई-बहन की आत्मीय बातचीत में है, गाँव की चौपाल में है और चाय की दुकान पर चलती बहस में है। वह किसान की शिकायत, मजदूर की पुकार, प्रेमी की प्रतीक्षा और आम आदमी के आक्रोश में है।
इसीलिए कविता कहती है—
तुम अभी भी यहीं हो,
कहीं न कहीं
गली की बातचीत में,
माँ की लोरी, बहिन की प्रीत में,
चाय की दुकान की बातों की जुगाली में,
और उस किसान की गाली में,
जो सिस्टम से हार चुका है।
यहाँ हिंदी किसी सजावटी भाषा के रूप में नहीं, बल्कि समाज की जीवित धड़कन बनकर सामने आती है। वह कोमल भी है और प्रतिरोधी भी। वह लोरी गाती है तो अन्याय के विरुद्ध आवाज़ भी उठाती है।
हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए क्या करना होगा?
हिंदी का प्रचार केवल हिंदी दिवस के आयोजनों से नहीं होगा। उसे हमारे दैनिक व्यवहार, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और रचनात्मक अभिव्यक्ति में स्थान देना होगा।
हमें कुछ सहज प्रयास करने होंगे—
- हिंदी बोलने वाले व्यक्ति को कमतर समझना बंद करना होगा।
- सरल, स्वाभाविक और संवादपरक हिंदी का प्रयोग बढ़ाना होगा।
- चिकित्सा, विज्ञान, कानून और तकनीक जैसे विषयों की उपयोगी सामग्री हिंदी में उपलब्ध करानी होगी।
- बच्चों को हिंदी पढ़ने के साथ उसमें सोचने और रचनात्मक लेखन के लिए प्रेरित करना होगा।
- डिजिटल मंचों पर गुणवत्तापूर्ण हिंदी गीत, कविता, लेख, पॉडकास्ट और वीडियो बढ़ाने होंगे।
- अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए हिंदी को जोड़ने वाली भाषा के रूप में विकसित करना होगा।
- अनावश्यक रूप से कठिन और बोझिल शब्दों के स्थान पर जनसामान्य की सहज भाषा अपनानी होगी।
हिंदी का भविष्य आदेशों से नहीं, उसके उपयोग से सुरक्षित होगा। जिस भाषा में ज्ञान, रोजगार, तकनीक और मनोरंजन उपलब्ध होगा, नई पीढ़ी स्वाभाविक रूप से उसी से जुड़ेगी।
कविता को संगीतबद्ध करने का उद्देश्य
कविता पढ़ी जाती है, लेकिन संगीत के साथ वही कविता कई बार सीधे हृदय तक पहुँच जाती है। “मैं और मेरी हिंदी” को संगीतबद्ध करने के पीछे मेरा उद्देश्य इसके संदेश को अधिक लोगों तक पहुँचाना था।
इस रचना में आत्मसंवाद भी है, व्यंग्य भी, पीड़ा भी और एक प्रकार का भाषायी प्रतिरोध भी। संगीत ने इन भावों को एक नई संवेदना प्रदान की है। कहीं हिंदी अकेली दिखाई देती है, कहीं वह प्रश्न करती है और अंत में अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ घोषणा करती है—
हाँ, हमें हिंदी से मोहब्बत है,
औपचारिक और जाली नहीं,
पोस्टर वाली नहीं,
जीती-जागती, सुलगती,
बोलती-लड़ती मोहब्बत!
यही इस गीत का मूल संदेश है। हिंदी से प्रेम केवल नारे में नहीं, हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
कविता: मैं और मेरी हिंदी
मैं और मेरी हिंदी
अक्सर ये बातें करते हैं—
अगर तुम सच में
मेरी ज़िंदगी में होतीं,
तो क्या होता?
तुम कहतीं—
मुझे सिर्फ़ फाइलों की जिल्द ढाँपती क्यों हूँ?
तुम पूछतीं—
मीटिंग के बाहर मेरी आवाज़ काँपती क्यों है?
तुम इस बात पर हैरान होतीं
कि मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ
और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।
तुम उस बात पर हँसतीं—
कि “राजभाषा” कहलाती मैं,
फिर क्यों हर वाक्य के बाद
खिचड़ी-सी हो जाती मैं।
मैं और मेरी हिंदी
अक्सर ये बातें करते हैं।
ये दफ़्तर है
या अंग्रेज़ी का खुला हुआ दालान?
ये आदेश है
या किसी और भाषा में दिया गया चालान?
ये फ़ाइल है
या तुम्हारा वह हसीं चेहरा,
जिसने दस्तख़त से पहले
अंग्रेज़ी का बाँध लिया सेहरा?
ये शब्द हैं
या मेरी पहचान के टुकड़े—
जो नोटशीट के नीचे
फुटनोट बनकर गिरे पड़े?
ये तालियाँ हैं
या सिर्फ़ एक दिन का उत्सव—
हिंदी दिवस,
जिसके बाद फिर ख़ामोश कलरव?
मैं सोचता हूँ कब से गुमसुम,
जबकि मुझे भी ये ख़बर है
कि तुम पूरी तरह ग़ायब नहीं हो—
पर मौजूद भी कहीं-कहीं हो।
कभी बोर्ड पर,
कभी पोस्टर पर,
कभी भाषण की शुरुआत में—
और फिर कहीं सरकारी
फाइलों के रोस्टर पर।
मगर ये दिल है
जो कहता है—
तुम अभी भी यहीं हो,
कहीं न कहीं
गली की बातचीत में,
माँ की लोरी, बहिन की प्रीत में,
चाय की दुकान की बातों की जुगाली में,
और उस किसान की गाली में,
जो सिस्टम से हार चुका है।
मजबूर ये हालत
इधर भी है, उधर भी—
हिंदी की पुकार,
घर में और दफ़्तर भी।
कहने को बहुत कुछ है,
पर किससे कहें हम?
जब ख़ुद अपनी भाषा में
बात रखने पर
जाहिल कहलाएँ हम।
दिल कहता है
दुनिया की ये नक़ली रस्में हटा दें—
वह दीवार,
जो भाषा और इंसान के बीच है,
आज गिरा दें।
क्यों दिल में सुलगते रहें,
लोगों को बता दें—
हाँ, हमें हिंदी से मोहब्बत है,
औपचारिक और जाली नहीं,
पोस्टर वाली नहीं,
जीती-जागती, सुलगती,
बोलती-लड़ती मोहब्बत!
अब दिल में यही बात
इधर भी है, उधर भी है।
मैं और मेरी हिंदी।
पूरा गीत अवश्य सुनें
इस कविता को अब संगीतबद्ध करके संपूर्ण वीडियो के रूप में YouTube पर प्रस्तुत किया गया है। शब्दों और संगीत के इस आत्मीय संवाद को एक बार अवश्य सुनें।
▶️ पूरा गीत सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें:
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हिंदी को केवल एक दिन याद न करें—उसे प्रतिदिन बोलें, पढ़ें, लिखें और सम्मानपूर्वक आगे बढ़ाएँ।
—डॉ. मुकेश असीमित
Music with Mukesh
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