Binni And Family -“बिन्नी, उसके दादाजी और हमारे अपने घरों की कहानी”

कल रात अमेज़न प्राइम पर Binny and Family देखी और सच बताऊँ—आज सुबह से मन में वही फिल्म घूम रही है। कुछ फिल्मों का असर ऐसा ही होता है, वे खत्म होकर भी खत्म नहीं होतीं। मन में चुपचाप बैठ जाती हैं, जैसे कोई बुज़ुर्ग घर के कोने में बैठकर बिना बोले बहुत कुछ समझा रहा हो। यही वजह है कि आज मुझसे रहा नहीं गया और यह लिखना पड़ा—अच्छी फिल्म दिखे और साझा न की जाए, यह तो आजकल “शेयरिंग इज़ केयरिंग” के उसूल के खिलाफ़ है।

यह फिल्म पिछले साल सितंबर में थिएटर में आई थी, वह भी इतनी चुपचाप कि जैसे कोई पारिवारिक राज़ हो जिसे सबके सामने लाने में झिझक हो। लिमिटेड स्क्रीन्स, लगभग न के बराबर प्रमोशन, और छोटे शहरों में तो एक भी शो नहीं। ऐसे समय में जब हर औसत फिल्म भी ढोल-नगाड़ों के साथ लॉन्च होती है, वहाँ इतनी सादगी से आई इस फिल्म का थिएटर में दब जाना दुखद भी लगता है और प्रतीकात्मक भी। शायद यह फिल्म भी उसी तरह चुपचाप आई, जैसे हमारे घरों में दादा-दादी आते हैं—बिना शोर किए, बिना नोटिस दिए, लेकिन अपने साथ बहुत कुछ लेकर।

फिल्म देखते हुए सबसे अजीब और सबसे सुखद अहसास यही होता है कि यह एक हिंदी फिल्म है और इसमें एक सामान्य परिवार दिखाया गया है। न पिता राक्षस है, न दादा-दादी किसी पितृसत्तात्मक डरावने कार्टून की तरह पेश किए गए हैं। माता-पिता माता-पिता जैसे हैं, बच्चे बच्चे जैसे। आज के दौर में यह बात खुद में ही चौंकाने वाली है, क्योंकि हिंदी सिनेमा ने जैसे तय कर लिया हो कि पिछली पीढ़ी को या तो खलनायक बनाकर दिखाना है या फिर पूरी तरह अप्रासंगिक।

बिन्नी एक टीनएज लड़की है, जिसका परिवार कुछ साल पहले लंदन शिफ्ट हुआ है। नई जगह, नया कल्चर, स्कूल, दोस्त, और वही उम्र की स्वाभाविक उच्छृंखलता—चिड़चिड़ापन, पर्सनल स्पेस का आग्रह, हर सलाह से एलर्जी। माता-पिता समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन पिता का किरदार खास तौर पर ध्यान खींचता है—एक मध्यमवर्गीय, संघर्ष से निकले इंसान का, जिसके स्वभाव में एडजस्ट करना और समझौता करना बसा हुआ है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब बिन्नी के दादा-दादी कुछ समय के लिए लंदन आते हैं। बिन्नी के लिए यह निजी आज़ादी पर हमला है—कमरा शेयर करना, कपड़ों और देर रात बाहर जाने पर सवाल, और वह सब जो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से करती आई है। दादाजी कुछ बातें कहते हैं जो आज के कॉन्टेक्स्ट में “अनकूल” मानी जा सकती हैं, लेकिन फिल्म उन्हें उसी गरिमा के साथ रखती है—वे डरावने नहीं हैं, चिंतित हैं। फर्क बहुत बड़ा है।

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यहीं से फिल्म रिश्तों की उस महीन परत को छूती है जहाँ कोई पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत नहीं होता। हालात बदलते हैं, दादी की तबीयत बिगड़ती है, और कुछ फैसले देर से लिए जाते हैं। जब नुकसान होता है, तब बिन्नी को पहली बार एहसास होता है कि पर्सनल स्पेस से बड़ा भी कुछ होता है—किसी का होना। यह बोध किसी भारी-भरकम भाषण से नहीं, बल्कि चुप्पी, अपराधबोध और पछतावे से आता है।

फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा दादाजी और पोती का रिश्ता है, जो धीरे-धीरे बदलता है। जन्मदिन का दृश्य, केक, हैट, बाहर घूमना—ये सब छोटे-छोटे पल हैं, लेकिन इन्हीं में जीवन बसता है। दादाजी का अपने दुख से बाहर आना और बिन्नी का उन्हें समझने की कोशिश करना फिल्म को भावुक बनाता है, मेलोड्रामैटिक नहीं।

हाँ, कुछ जगहों पर फिल्म से असहमति भी होती है। खासकर एंडिंग में, जहाँ सीख का बोझ थोड़ा उल्टा रख दिया गया है। लगता है कि कहानी ने जितना पोती के बदलने की यात्रा दिखाई, उसका श्रेय अंत में किसी और को दे दिया गया। लेकिन शायद इसे दादाजी का बड़प्पन मानकर भी देखा जा सकता है—वे वही करते हैं जो बड़े अक्सर करते हैं, अपनी पीड़ा और सीख को बच्चों के नाम कर देते हैं।

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प्रेम को लेकर फिल्म कुछ बातें कहती है जिनसे हर कोई सहमत हो, ज़रूरी नहीं। लेकिन इन छोटी असहमतियों के बावजूद फिल्म का मूल स्वर साफ़ है—रिश्ते संवाद से नहीं, संवेदना से चलते हैं। पीढ़ियों के बीच की खाई भाषणों से नहीं, साथ बैठकर केक काटने से पाटी जाती है।

आज जब ज़्यादातर फिल्में या तो शोर मचाती हैं या संदेश थोपती हैं, Binny and Family चुपचाप अपना काम करती है। बिना गाइडेंस की ज़रूरत वाली, पूरे परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकने वाली यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि सामान्य होना भी कितना असाधारण हो सकता है। अगर आपने अब तक नहीं देखी है, तो ज़रूर देखिए—और अगर देख ली है, तो किसी अपने के साथ इस पर बात भी कीजिए। शायद वहीं से कोई भूला हुआ रिश्ता फिर से सांस लेने लगे।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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