भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक और नागरिक अधिकारों का अंतिम
प्रहरी माना जाता है। संसद कानून बना सकती है, सरकार प्रशासन चला सकती है, किंतु
संविधान की आत्मा की रक्षा का अंतिम दायित्व न्यायपालिका पर ही है। यही कारण है कि
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को लोकतंत्र का नैतिक स्तंभ कहा जाता है। किंतु किसी
भी लोकतांत्रिक संस्था की वास्तविक शक्ति उसकी आलोचना से बच निकलने में नहीं, बल्कि
आलोचना को सुनने और उससे स्वयं को बेहतर बनाने की क्षमता में निहित होती है। आज
भारत में यह प्रश्न अत्यंत गंभीरता से उठ रहा है कि क्या न्यायपालिका को आलोचना से ऊपर
माना जा सकता है, अथवा उसे भी लोकतांत्रिक विमर्श के अंतर्गत जवाबदेही और पारदर्शिता के
मानकों पर परखा जाना चाहिए।
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायपालिका केवल कानूनी संस्था नहीं, बल्कि
सार्वजनिक विश्वास पर आधारित नैतिक संस्था भी है। न्यायालयों के पास न सेना है, न पुलिस
बल; उनकी वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास में निहित होती है। यदि जनता को यह लगने
लगे कि न्यायपालिका आलोचना से डरती है या अपने विरुद्ध उठने वाली हर आवाज़ को
“अवमानना” कहकर दबाना चाहती है, तो धीरे-धीरे उसका नैतिक अधिकार कमजोर पड़ सकता
है। लोकतंत्र में कोई भी संस्था इतनी पवित्र नहीं हो सकती कि वह जनचर्चा और आलोचना से
परे हो जाए।
भारत में न्यायालय की अवमानना का कानून औपनिवेशिक मानसिकता की देन माना जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को अवमानना के
लिए दंड देने की शक्ति प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त न्यायालय अवमानना अधिनियम,
1971 भी इस शक्ति को परिभाषित करता है। दृष्टि आईएएस के एक विश्लेषण में बताया गया
है कि भारतीय कानून के अनुसार अवमानना दो प्रकार की होती है—सिविल अवमानना और
आपराधिक अवमानना। आपराधिक अवमानना में न्यायालय की “गरिमा को ठेस पहुँचाने” या
न्यायपालिका को “स्कैंडलाइज़” करने जैसे व्यापक शब्दों का प्रयोग किया गया है। यही वह क्षेत्र
है जहाँ लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और न्यायिक संवेदनशीलता के बीच टकराव पैदा होता है।
समस्या यह है कि “न्यायपालिका की आलोचना” और “न्यायपालिका का अपमान” हमेशा एक ही
बात नहीं होते। यदि कोई व्यक्ति किसी निर्णय की तार्किक आलोचना करता है, न्यायिक
पारदर्शिता पर प्रश्न उठाता है, या न्यायिक नियुक्तियों में सुधार की मांग करता है, तो उसे
लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। किंतु भारत में कई बार ऐसा प्रतीत हुआ है
कि न्यायपालिका आलोचनात्मक टिप्पणियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। वर्ष
2020 में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही ने इसी बहस को
राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्जीवित कर दिया था। अनेक विधि विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों और
बुद्धिजीवियों ने तब यह तर्क दिया था कि न्यायपालिका की गरिमा आलोचना को दंडित करने
में नहीं, बल्कि आलोचना का उत्तर अपनी निष्पक्षता और पारदर्शिता से देने में निहित है।
वास्तविकता यह है कि भारतीय न्यायपालिका के भीतर समय-समय पर भ्रष्टाचार और
अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं। 1990 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय के
न्यायाधीश वी. रामास्वामी पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे थे और संसद में
उनके विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालांकि राजनीतिक कारणों से वह प्रस्ताव
पारित नहीं हो सका, किंतु इस घटना ने यह मिथक तोड़ दिया कि न्यायपालिका पूर्णतः त्रुटिहीन
संस्था है। इसके बाद भी अनेक उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर संपत्ति, प्रभाव और भ्रष्टाचार
से जुड़े आरोप लगते रहे हैं।
कई मामलों में मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि कुछ न्यायाधीशों के पास उनकी
घोषित आय से कहीं अधिक मूल्य की संपत्तियाँ पाई गईं। कुछ मामलों में आयकर छापों और
जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने भी संदेह को बढ़ाया। हाल के वर्षों में न्यायपालिका से जुड़े कुछ
विवादों में “सैकड़ों करोड़ की संपत्ति” जैसे शब्द सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने। यद्यपि किसी
भी आरोप की अंतिम सत्यता केवल न्यायिक जांच से ही सिद्ध हो सकती है, फिर भी यह प्रश्न
महत्वपूर्ण है कि यदि ऐसे आरोप सामने आते हैं तो क्या समाज को उन पर चर्चा करने का
अधिकार नहीं होना चाहिए? क्या भ्रष्टाचार के संभावित मामलों पर प्रश्न उठाना भी अवमानना
माना जाएगा?
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि सार्वजनिक पद पर बैठा कोई भी व्यक्ति आलोचना से
ऊपर नहीं हो सकता। न्यायाधीश भी अंततः सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं और उनके निर्णय
करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। इसलिए जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि
वह न्यायिक प्रक्रियाओं, नियुक्तियों और आचरण पर प्रश्न उठा सके। यह आलोचना तथ्याधारित
और जिम्मेदार होनी चाहिए, किंतु उसका दमन लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध होगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो कई लोकतांत्रिक देशों ने न्यायपालिका के प्रति अधिक उदार और
पारदर्शी दृष्टिकोण अपनाया है। अमेरिका में न्यायालय की अवमानना का दायरा भारत की
तुलना में कहीं अधिक सीमित है। वहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अत्यंत व्यापक रूप से
संरक्षित किया गया है। अमेरिकी न्यायपालिका के विरुद्ध तीखी सार्वजनिक आलोचनाएँ सामान्य
बात मानी जाती हैं। अमेरिकी मीडिया और विश्वविद्यालयों में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की
कठोर समीक्षा होती है, किंतु केवल आलोचना के आधार पर अवमानना की कार्रवाई बहुत दुर्लभ
है। दृष्टि आईएएस के एक तुलनात्मक अध्ययन में बताया गया है कि अमेरिका में अवमानना
का उपयोग मुख्यतः न्यायिक आदेशों के उल्लंघन या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा के मामलों तक
सीमित है।
ब्रिटेन, जहाँ से भारत ने अवमानना कानून की विरासत प्राप्त की, वहाँ भी पिछले दशकों में इस
कानून का दायरा काफी सीमित कर दिया गया है। 2013 में ब्रिटेन ने “स्कैंडलाइजिंग द कोर्ट”
जैसी अवधारणा को लगभग अप्रासंगिक बना दिया। यह स्वीकार किया गया कि लोकतांत्रिक
समाज में न्यायालयों की आलोचना को अपराध नहीं माना जाना चाहिए, जब तक कि वह सीधे
न्यायिक प्रक्रिया को बाधित न करे। ब्रिटिश विधि आयोग ने भी यह माना कि न्यायपालिका की
प्रतिष्ठा आलोचना को दबाने से नहीं, बल्कि अपने कार्य की गुणवत्ता और पारदर्शिता से बनती
है।
कनाडा में न्यायपालिका पर आलोचना को लोकतांत्रिक विमर्श का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता
है। वहाँ न्यायिक परिषदें न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों की जांच करती हैं। यदि किसी
न्यायाधीश पर नैतिक या वित्तीय अनियमितता का आरोप हो, तो उसकी स्वतंत्र जांच की
व्यवस्था है। इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया में भी न्यायपालिका के विरुद्ध सार्वजनिक आलोचना को
व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, बशर्ते वह न्यायिक प्रक्रिया में बाधा न उत्पन्न करे।
यूरोपीय देशों में पारदर्शिता की संस्कृति और भी अधिक विकसित है। जर्मनी, स्वीडन और नॉर्वे
जैसे देशों में न्यायपालिका की प्रशासनिक प्रक्रियाएँ काफी खुली होती हैं। कई देशों में न्यायाधीशों
की संपत्ति घोषणाएँ सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा होती हैं। वहाँ यह समझ विकसित हो चुकी है
कि पारदर्शिता न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और अधिक वैधता
प्रदान करती है।
भारत में समस्या यह है कि न्यायपालिका स्वयं अपनी जवाबदेही तय करती हुई दिखाई देती है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाला कॉलेजियम सिस्टम लंबे समय से विवादों में है। आलोचकों
का कहना है कि इसमें पारदर्शिता का अभाव है और “जज ही जजों की नियुक्ति कर रहे हैं”
जैसी स्थिति लोकतांत्रिक दृष्टि से आदर्श नहीं मानी जा सकती। कई बार नियुक्तियों और
स्थानांतरणों के पीछे के कारण सार्वजनिक नहीं किए जाते, जिससे संदेह और अविश्वास बढ़ता
है।
इसी प्रकार न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए भी कोई पूर्णतः स्वतंत्र
और प्रभावी तंत्र नहीं है। यदि किसी मंत्री, सांसद या नौकरशाह पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता
है, तो उसके विरुद्ध जांच एजेंसियाँ सक्रिय हो जाती हैं। किंतु न्यायपालिका के मामले में प्रक्रिया
अत्यंत जटिल और सीमित है। इससे जनता में यह धारणा बनती है कि न्यायपालिका स्वयं को
जवाबदेही से ऊपर मानती है।
हालांकि यह भी सत्य है कि भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर आत्मसुधार के प्रयास
किए हैं। कुछ न्यायाधीशों ने स्वेच्छा से अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक किया। न्यायालयों
की कार्यवाही का डिजिटलीकरण हुआ। कुछ महत्वपूर्ण मामलों की लाइव स्ट्रीमिंग शुरू हुई।
कॉलेजियम के निर्णयों का आंशिक प्रकाशन भी शुरू हुआ। ये कदम सकारात्मक हैं, किंतु अभी
भी पर्याप्त नहीं कहे जा सकते।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आलोचना वास्तव में न्यायपालिका को कमजोर करती है?
इतिहास बताता है कि किसी भी संस्था की विश्वसनीयता पारदर्शिता से बढ़ती है, दमन से नहीं।
मीडिया, नागरिक समाज और विधि विशेषज्ञ यदि न्यायिक प्रक्रियाओं पर प्रश्न उठाते हैं, तो यह
लोकतंत्र की जीवंतता का संकेत है। यदि न्यायपालिका आलोचना को स्वीकार कर उससे सीखती
है, तो उसका नैतिक अधिकार और अधिक मजबूत होगा।
यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि आलोचना और अराजकता में अंतर होता है। निराधार
आरोप, व्यक्तिगत चरित्रहनन और दुर्भावनापूर्ण अभियान निश्चित रूप से अनुचित हैं।
न्यायपालिका को ऐसे मामलों में स्वयं की रक्षा का अधिकार है। किंतु तथ्याधारित, तार्किक और
सार्वजनिक हित में की गई आलोचना को दंडित करना लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक
प्रवृत्ति बन सकता है।
आज सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के युग में सूचनाओं का प्रवाह अत्यंत तीव्र हो चुका
है। अब संस्थाएँ बंद कमरों में रहकर अपनी विश्वसनीयता नहीं बचा सकतीं। जनता अधिक
जागरूक है और जवाबदेही की मांग पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। ऐसे समय में
न्यायपालिका को भी यह स्वीकार करना होगा कि लोकतांत्रिक सम्मान आदेश से नहीं, बल्कि
विश्वास से प्राप्त होता है।
यदि न्यायपालिका वास्तव में अपनी गरिमा को सुदृढ़ करना चाहती है, तो उसे आलोचना से
भयभीत होने के बजाय पारदर्शिता की दिशा में और साहसिक कदम उठाने होंगे। न्यायाधीशों की
संपत्ति का अनिवार्य सार्वजनिक विवरण, न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता, शिकायतों की स्वतंत्र
जांच, और अवमानना कानून की पुनर्समीक्षा जैसे कदम समय की मांग हैं।
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य केवल स्वतंत्र न्यायपालिका पर निर्भर नहीं करता, बल्कि ऐसी
न्यायपालिका पर निर्भर करता है जो स्वतंत्र होने के साथ-साथ उत्तरदायी भी हो। न्यायपालिका
की प्रतिष्ठा आलोचना को दबाने से नहीं, बल्कि यह दिखाने से बनेगी कि वह स्वयं को भी
संविधान और लोकतंत्र के मानकों के अधीन मानती है।
अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आलोचना लोकतंत्र की शत्रु नहीं, बल्कि उसकी
जीवनरेखा है। न्यायपालिका यदि इस सत्य को स्वीकार कर लेती है, तो वह केवल एक
शक्तिशाली संस्था ही नहीं, बल्कि वास्तव में एक महान लोकतांत्रिक संस्था बन सकती है। और
शायद यही वह क्षण होगा जब जनता न्यायपालिका को केवल भय या औपचारिक सम्मान से
नहीं, बल्कि वास्तविक विश्वास और नैतिक श्रद्धा से देखेगी।
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