बस ऐसे ही मन में ख़्यालों के पुलाव की तरह एक भटका हुआ-सा विचार पकने लगा , कि यार! कितना आसान हो जाए साहित्य भी, अगर उसमें विज्ञान का थोड़ा-सा तड़का लग जाए।
फ़ायदा दोनों का हो जाएगा , विज्ञान का भी और साहित्य का भी। अब साहित्य जो समाज का भला करना चाहता है, लेकिन खुद ही ऐसी अवस्था में है कि पहले उसका भला हो जाए, तभी वह समाज का कुछ भला कर सकेगा। मतलब ये कि आजकल का साहित्य, खुद ही आईसीयू में भर्ती है और समाज को संजीवनी घुट्टी पिलाने का दावा कर रहा है!
पर विज्ञान कम से कम इतनी तो मदद कर सकता है कि इन जटिल साहित्यिक समीकरणों को हल करने की कोई विधि सुझा दे। मसलन, साहित्य के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला जा सकता है , जैसे प्रकाश परावर्तन का सिद्धांत और साहित्यिक पुरस्कारों की किरणों का संकेन्द्रण!
और साहित्यिक खेमें, जो लगातार एक-दूसरे में अदला-बदली करते रहते हैं , उन्हें तो हम पेंडुलम (डोलक) के सिद्धांत से समझा सकते हैं! एक खेमा दाएँ झुकता है, तो दूसरा अपने आप बाएँ चला जाता है।
साहित्य के आकाश में जब-जब कोई पुरस्कार टपकता है, मैं न्यूटन को भावभीनी श्रद्धांजलि देने खड़ा हो जाता हूँ।
आज साहित्य का संसार गुटबाज़ी के गुरुत्व से ग्रसित और त्रस्त होकर जिस प्रकार ज़मीनदोज़ हो रहा है, वह न्यूटन के योगदान की गाथा गाता है।
विज्ञान और साहित्य को अलग-अलग खाँचों में नहीं रखा जा सकता , आज के साहित्यिक अवदान में जो गिरावट या विचलन दिखती है, उसमें विज्ञान के कुछ प्रामाणिक सिद्धांतों ने भी अप्रत्याशित भूमिका निभाई है।
मैं चाहता हूँ कि इन सिद्धांतों की एक संक्षिप्त, किंतु तीखी व्याख्या व्यंग्य के सूक्ष्मदर्शी से की जाए , ताकि यह स्पष्ट हो सके कि साहित्य अब केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला बनता जा रहा है, जहाँ न्यूटन, आर्किमिडीज़ और हाइजेनबर्ग भी साहित्य की दौड़ में टँगड़ी लगाने को खड़े मिलेंगे।
साहित्य और विज्ञान के इस अनूठे संगम में डुबकी लगाकर साहित्यिक ब्लैकहोल में फंसी आत्माओं को हँसाने के लिए यह एक तुच्छ-सा प्रयास है।
1. न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत – पुरस्कार का पतन और प्रतिष्ठा का खिंचाव
अब साहित्य में भी गुरुत्वाकर्षण के नियम अपनी पूरी ताकत से काम कर रहे हैं।
जैसे-जैसे कोई लेखक मठाधीशों, गुटों और क्लिक्स की परिधि में प्रवेश करता है, उसकी प्रतिष्ठा की कक्षा में पुरस्कार स्वमेव गिरने लगते हैं।
पुरस्कार और प्रतिष्ठा, आज दो प्रमुख आकर्षण बल बन चुके हैं , जैसे ही कोई लेखक इनके प्रभाव क्षेत्र में आता है, उसकी ‘गिरने’ की गति और बढ़ जाती है। यह गिरावट लेखकीय ऊर्जा के रूप में दर्ज होती है, जो अपने खेमों, पुरस्कार-सम्मान की परिधि में वर्तुलाकार चक्कर लगाने के लिए मजबूर है।
अब साहित्य का सेब सिर पर नहीं गिरता, वह सम्मान समारोह की गोद में गिरता है… साहित्यकारों की गोद हरी हो जाती है ।
2. आर्किमिडीज़ का प्लावन सिद्धांत – हल्की लेखनी का तैरना
जब कोई भारी-भरकम विचारधारा से रहित लेखनी तैरती हुई बड़े-बड़े मंचों तक पहुँच जाती है, जब कोई हलकान-सी कविता साहित्य अकादमी के भवसागर में तैर जाती है, तब मैं आर्किमिडीज़ को “यूरेका” सिद्धांत के आगे नतमस्तक हो जाता हूँ। साहित्य के भवसागर में रचनाओं के तैरने की क्रिया को आर्किमिडीज़ के सिद्धांत से समझाया जा सकता है ,
“जो लेखक का वज़न हल्का, सतही और देखने में बड़ा होना चाहिए, उसे उत्थान बल प्राप्त होता है, जो साहित्य के भवसागर में तैरने के लिए पर्याप्त है, और किसी आयोग-सम्मान का किनारा पकड़ा जा सकता है।”
“कोई भी रचना, जब तक पुरस्कारों के जल में डूबी रहती है, उतनी ही ऊपर उठती है, जितनी प्रतिभा उस रचना से बाहर निकाली जाती है।”
3. न्यूटन के गति का पहला नियम – जड़त्व का साहित्य
इस नियम के अनुसार,
“कोई वस्तु तब तक गति में नहीं आती जब तक उस पर कोई बाहरी बल न लगे।”
जड़त्व का नियम यह कहता है कि जड़ से जुड़े साहित्य के निर्माण के लिए दूसरों को जड़ से उखाड़ना अब आवश्यक हो गया है।
कोई लेखक तब तक स्थिर रहता है जब तक,
- कोई मठाधीश उसे थपकी न दे,
- पुरस्कार की हवा उसे न लगे,
- कोई वाद का कीचड़ या विवाद की आग उसकी पूंछ पर न लगे।
4. प्रकाश का परावर्तन नियम – समीक्षकों की दृष्टि
भौतिकी कहती है कि चिकनी सतह पर प्रकाश परावर्तित होता है।
साहित्य कहता है,
“चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाला लेखक आलोचकों की समीक्षा में दमकता है।”
अब आलोचना, वस्तुनिष्ठता का नहीं, चाटुकारिता के कोण से परावर्तन का विज्ञान बन चुका है। समीक्षक का प्रकाश उन्हीं रचनाओं पर पड़ता है, जो समीक्षा के लिए पहले से चाटुकारित का मक्खन लगाकर चुपड़ी जाती हैं।
5. ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट‘ नहीं, ‘सर्वाइवल ऑफ द फ्लैटरर‘
चार्ल्स डार्विन की विकासवाद की थ्योरी कहती है,
“योग्यतम(फिटेस्ट )ही जीवित रहता है।”
परंतु साहित्य की वर्तमान प्रयोगशाला में यह सिद्धांत कुछ इस प्रकार बदल गया है,
“अधिक चापलूसी (फ्लेटरेस्ट ) वाला ही जीवित रहता है।”
यहाँ लेखन में अयोग्यता नहीं, अनुकूलता महत्वपूर्ण है। जैसे,
- कौन किस गोष्ठी में जाता है,
- किस मंच पर किसे ‘आधुनिक तुलसी’, ‘दिनकर’ या ‘अज्ञेय’ कहता है,
- किस सम्मान को ग्रहण करते समय धन्यवाद में किसे ‘गुरु-समान’ घोषित करता है,
ये सभी तत्व लेखक को इस प्रतिस्पर्धा के दौर में जीवित रहने की काबिलियत प्रदान करते हैं।
कहने का तात्पर्य यही है कि आज का साहित्य, विज्ञान की प्रयोगशाला में विचारधाराओं की लंबी-लंबी परखनलियों में बिंब, अलंकार, रूपक जैसे रसायनों को मिलाकर रचा जा रहा है।
व्हाट्सएप समीक्षाओं और यूट्यूब कवि-सम्मेलनों ने साहित्य के जटिल समीकरणों को सरलतम बना दिया है,
जब साहित्य अपने मौलिक भाव से भटककर पुरस्कारीय परिक्रमा में उलझने लगे,
और जब विचारों की गहराई के स्थान पर लिफ़ाफ़ों की मोटाई मूल्यांकन का मापदंड बनने लगे,
तब हमें विज्ञान की ओर देखना चाहिए।
शायद वही हमें इस समकालीन साहित्य को पुनर्परिभाषित करने में सहायता कर सके।
लेखक
डॉ. मुकेश ‘असीमित‘
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