‘अंतिम दर्शन का दर्शनशास्त्र’-भूमिका

‘अंतिम दर्शन का दर्शनशास्त्र’
— लेखक : डॉ. मुकेश असीमित
किसी भी पुस्तक की भूमिका लिखना पारंपरिक रूप से विद्वानों का प्रिय आध्यात्मिक व्यायाम रहा है। चेहरे पर गंभीरता, भाषा में गाम्भीर्य और पंक्तियों में इतना भार कि लगता है जैसे ‘ज्ञान’ स्वयं भी भूमिका लिखते समय किसी दीवार से टिककर सुस्ताने लग जाए। विद्वानों के अनुसार भूमिका हमेशा गंभीर होनी चाहिए। पर मेरे दुर्भाग्य या सौभाग्य से मेरी गंभीर बातों को लोग प्रायः हँसी में उड़ा देते हैं—और मेरी हल्की बातों को गंभीरता से ले लेते हैं। अब ऐसे असंतुलित पाठक–संसार में कोई भूमिका भी गंभीर लिख दे , या कहीं कोई महानुभाव भमिका लिखने के लिए सच में पाण्डुलिपि पढ़ ले और ‘अंतिम सत्य’ जैसी कोई टिप्पणी लिख दे, तो मेरे “अंतिम दर्शन” का दर्शनशास्त्र वहीं भूमिका में ही समाप्त हो जाए।
इसी जोखिम से बचने के लिए मैंने निश्चय किया कि भूमिका भी मैं ही लिखूँ। किसी नामचीन महर्षि-स्तर के लेखक से यह ‘दर्शनशास्त्रीय कर्म’ करवाऊँगा तो लोग समझेंगे कि यह कोई बाज़ार का नया अध्यात्म-उपक्रम है। और आज का पाठक इतना समझदार है कि दो पन्ने पलटकर ही समझ लेता है कि यह वास्तब में कुछ पठनीय है या सिर्फ शब्दों की पटाखेबाज़ी।
मेरे पहले संग्रह ‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ की बिक्री देखकर इतना तो समझ आया कि किताबें खरीदी भी गईं और, ईश्वर की कृपा से, किसी ने लौटाईं भी नहीं। किसी पाठक ने भुगतान वापस माँगा नहीं, शिकायत भेजी नहीं, और न ही गुस्से में पुस्तक की प्रति वापस भेजी—इससे मैं अनुमान लगाने को स्वतंत्र हूँ कि शायद उन्हें पुस्तक पसंद आई होगी।
अब यह कहना कठिन है कि पाठक मेरी रचनाओं से प्रभावित थे या मेरे बार-बार गिरकर भी उठ खड़े होने की जिद से, पर चलिए—कभी-कभी ऐसा भ्रम भी लेखक के लिए ईंधन का काम कर जाता है। उसी भ्रम, उसी हवा, उसी आत्म-चुटकी की ऊर्जा में बहते-बढ़ते मैं अब यहाँ तक पहुँच गया हूँ—
“अंतिम दर्शन का दर्शनशास्त्र” लेकर।
सच कहूँ तो मुझे किताब बिकने का डर कभी नहीं सताता; असली खौफ़ यह है कि कहीं किताब सिर्फ बिक कर ही न रह जाए—पढ़ी भी जाए या नहीं! हमारी भारतीय परंपरा में किताब खरीदना ‘पुण्य’ माना जाता है, और उसे पढ़ लेना… खैर, वह तो लगभग ‘प्रायश्चित’ जैसा पाप समझा जाता है। किताबों की हालत भी आजकल सोहनपापड़ी जैसी हो गई है—घर-घर में मिलती हैं, पर किसी को याद नहीं कि किसने दी और किसने कभी खोली भी या नहीं।


लेखक का आत्म-व्यंग्य वैसे भी एक प्रकार का ‘अर्धचंद्राकार दार्शनिक कवच’ है—छिद्रयुक्त सही, पर गरिमा बचाए रखता है। गिरने से कमर टूटे तो टूटे, ‘अंतिम दर्शन’ अक्षुण्ण रहता है।
अब ज़रा इस व्यंग्य के रनवे पर भरी गयी मेरी दूसरी उड़ान की कथा के बारे में भी कुछ जिक्र करूँ । मेरी कलम की बैटरी अभी चार्ज है, इंक की टंकी आधी भरी है, और व्यंग्य के रनवे पर मैं अपनी खड़ाऊँ सँभालकर खड़ा हूँ।
उड़ान कितनी ऊँची जाएगी, कहाँ जाकर उतरेगी—इसका ज्ञान मुझे नहीं है , ये तो पाठक ही बेहतर बताएँगे । लेखक टेकऑफ़ भरता है, लैंडिंग तो आलोचक तय करते हैं। कहीं भाषा में ‘दार्शनिक फड़फड़ाहट’ दिखी, तो साहित्यिक नियंत्रण-टॉवर से तुरंत आदेश आ सकता है—
“असीमित जी, तुरंत नीचे उतरें। आपकी उड़ान में चिंतन का अतिरिक्त भार पाया गया है।”
अब जब आप सवार हो ही चुके हैं ,तो सीट बेल्ट भी बाँध लीजिये l सफ़र में आने वाला हर हिचकोला व्यंग्य का प्राकृतिक टर्ब्युलेंस है
मेरी हर रचना समाज की गोद में ही जन्म लेती है। समाज की कोई भी चूक मुझे व्यंग्य का विषय लगती है, और मेरी कोई भी टिप्पणी समाज को चूक ही लगती है। लेखक—विशेषतः व्यंग्यकार—और समाज के बीच यह गलतफहमी उतनी ही पुरानी है जितनी उनकी परस्पर निर्भरता। विडंबना यह है कि दोनों एक-दूसरे को सुधारने चले निकलते हैं, और दोनों को लगता है—गलत दूसरा है। यह सदाबहार भ्रम आगे भी फलता-फूलता रहेगा, क्योंकि व्यंग्य वहीं पनपता है जहाँ समझ और गलतफहमी साथ-साथ उगती हों।
लोग कहते हैं—
“व्यंग्य समाज का आईना है।”
मैं कहता हूँ—
“मित्र, आईना उठाने का साहस समाज का हो सकता है, पर उसे ढोने की क्षमता लेखक में नहीं रहती; इसलिए मैं आईने की जगह चश्मा लेकर चलता हूँ।”
कभी नंबर का चश्मा, कभी धूप का, कभी धुँधलापन लिए हुए।
समय बदलता है तो नंबर बदलना पड़ता है, दृष्टि बदलती है तो फ़ोकस।
और कई बार सत्य की रोशनी इतनी तेज़ हो जाती है कि उसे हल्का धुँधला करना ही पड़ता है—
ताकि व्यंग्य अपने पूरे तेज़ से चमक सके,
और पाठक को चोट नहीं, संकेत मिले।
अब कुछ लोग पूछते हैं—क्या यह संग्रह कोई बड़ा साहित्यिक या दार्शनिक उद्देश्य लेकर आया है?
उत्तर वही है—नहीं।
दर्शन का भार उठाने का साहस इस पुस्तक ने नहीं किया। मेरे व्यंग्य का एक ही ध्येय है—पाठक एक बार मुस्कुरा दें और उस मुस्कान में एक पल को सोच भी लें। यदि पढ़ते हुए मन एक क्षण को ठिठक जाए तो मेरा काम पूरा। और यदि खीज जाए—तो भी काम पूरा। दर्शन का अंतिम सत्य यही है कि हर प्रतिक्रिया भी एक शिक्षा है।
इस संग्रह में वही सब मिलेगा जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में हर मोड़ पर विराजमान है—हमारी प्यारी अव्यवस्था, चिरस्थायी भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र की धौंस, और नागरिकों की बालसुलभ मासूमियत। व्यंग्य मैं नहीं लिखता—समाज स्वयं मुझे ड्राफ्ट करके भेज देता है। मैं तो बस उसे थोड़ा व्याकरण, थोड़ी स्याही और थोड़ा साहस दे देता हूँ।
अंततः—यदि इस भूमिका को पढ़कर मुस्कान खिंच जाए तो समझिए, ‘अंतिम दर्शन का दर्शनशास्त्र’ अपनी उड़ान भर चुका है।
यदि झुँझलाहट हो तो समझें कि लेखक अभी पंख फड़फड़ा रहा है।
और यदि कुछ भी महसूस न हो—तो मान लें कि यह ‘अंतिम दर्शन’ एयरपोर्ट पर ही निरस्त कर दिया गया।
जिद तो है ,लिखना तो है ही—और शायद एक दिन ऐसा भी आएगा
जब यह लिखना सचमुच कुछ अर्थ पा जाएगा।”
— डॉ. मुकेश असीमित

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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