पहचान शब्दों से नहीं, साधना से बनती है
हम सब अपने बारे में एक कहानी गढ़ते हैं। कोई कहता है—मैं ईमानदार हूँ। कोई कहता है—मैं आध्यात्मिक हूँ। कोई स्वयं को कर्मयोगी घोषित करता है, कोई संवेदनशील, कोई देशप्रेमी। पर जीवन का मौन न्यायाधीश हमारे शब्द नहीं सुनता; वह हमारे चयन देखता है। हम वास्तव में कौन हैं, यह हमारे दावों से नहीं, हमारी दिशा से तय होता है।
मनुष्य की पहचान उसके पीछे भागने वाली चीज़ों से बनती है। जिसे पाने के लिए वह बेचैन रहता है, वही उसकी असली प्राथमिकता है। यदि हम दिनभर सफलता की बातें करें, पर मन अधिकतर तुलना और ईर्ष्या में उलझा रहे, तो हमारी दिशा अभी भी बाहरी मान्यता की ओर है। यदि हम सेवा की बात करें, पर सुविधा छोड़ने को तैयार न हों, तो सेवा अभी विचार है, स्वभाव नहीं।
हमारा मन एक कम्पास की तरह है। वह जिस ओर बार-बार घूमता है, वही हमारा उत्तर है। कुछ लोगों का मन अवसर खोजता है, कुछ का बहाने। कुछ का मन सीखने में रमता है, कुछ का शिकायतों में। धीरे-धीरे मन की यह आदत ही व्यक्तित्व का रूप ले लेती है। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि हमारे विचारों का अधिकांश समय कहाँ व्यतीत होता है—विकास में या व्यर्थ की व्यस्तता में?
प्रतिबद्धता पहचान की अंतिम कसौटी है। हम कहते बहुत हैं, पर निभाते कितना हैं? यदि स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है, तो क्या हम नियमित अभ्यास के लिए समय निकालते हैं? यदि परिवार प्रिय है, तो क्या हम उनके साथ उपस्थित भी हैं, या केवल औपचारिकता निभाते हैं? यदि ज्ञान प्रिय है, तो क्या हम सीखने के लिए असुविधा स्वीकार करते हैं? जिस बात के लिए हम निरंतर प्रयास करते हैं, वही हमारे चरित्र का स्थायी रंग बन जाती है।
जीवन प्रतिदिन छोटे-छोटे निर्णयों से बनता है। एक घंटा किसे दिया, एक विचार को कितना महत्व दिया, किस संगति को चुना—ये छोटे चयन मिलकर हमारी बड़ी पहचान गढ़ते हैं। हम जो पढ़ते हैं, जिसे सुनते हैं, जिन लोगों से प्रेरित होते हैं—वही धीरे-धीरे हमारे भीतर घर बना लेते हैं। इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य अपने वातावरण और अपने विचारों का संयुक्त परिणाम है।
प्रेरणा का अर्थ केवल उत्साह नहीं है; प्रेरणा का अर्थ है—सच का सामना। स्वयं से पूछना कि यदि कोई देख न रहा हो, तब भी क्या मैं यही करूँगा? यदि प्रशंसा न मिले, तब भी क्या मैं इसी दिशा में बढ़ूँगा? जब हमारे उत्तर बाहरी तालियों से स्वतंत्र हो जाते हैं, तभी आत्मबल जन्म लेता है।
अंततः, हम अपने शब्दों से नहीं, अपनी साधना से पहचाने जाते हैं। जो हम निरंतर सोचते हैं, वही हम बनते हैं। जो हम लगातार साधते हैं, वही हमारी नियति गढ़ता है। इसलिए यदि अपनी पहचान ऊँची बनानी है, तो अपने ध्यान को ऊँचा कीजिए, अपने लक्ष्य को स्पष्ट कीजिए और अपनी प्रतिबद्धता को दृढ़ कीजिए।
दुनिया को प्रभावित करने से पहले स्वयं को गढ़ना आवश्यक है। क्योंकि जो व्यक्ति भीतर से स्पष्ट और प्रतिबद्ध है, उसकी पहचान घोषित नहीं करनी पड़ती—वह उसके जीवन से स्वतः झलकती है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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