गीता सार: कर्तव्य, समत्व और समर्पण का जीवन-दर्शन

गीता सार – “कर्तव्य करते हुए, अहंकार त्यागकर, सत्य में स्थिर होकर, समर्पण में जीना ही गीता है।”

अध्याय 1 से शुरुआत होती है “युद्ध” से, पर असल में यह बाहर का युद्ध नहीं—भीतर का युद्ध है। अर्जुन का रथ कुरुक्षेत्र में खड़ा है, लेकिन उसके भीतर का मन-रथ कांप रहा है। “धर्म” और “स्नेह”, “कर्तव्य” और “करुणा”, “नीति” और “निजता”—ये सब एक ही समय में खींचते हैं। अर्जुन कहता है—“न च शक्नोम्यवस्थातुं… भ्रमतीव च मे मनः” (1.30)—“मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा; मन भ्रमित-सा हो रहा है।” यह वही स्थिति है जब आज का आदमी नौकरी, रिश्ते, समाज, आत्मसम्मान—सबके बीच अचानक ‘फ्रीज़’ हो जाता है। गीता यहीं से बताती है कि जीवन का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं, निर्णय-हीनता है; और निर्णय-हीनता का कारण अक्सर “भावनाओं का अतिप्रवाह” होता है। अर्जुन आगे कहता है—“गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्… त्वक्चैव परिदह्यते” (1.30)—हाथ से धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है। यानी मानसिक तनाव शरीर में उतर आया है—आज जिसे हम एंग्ज़ायटी, पैनिक, बर्नआउट कहते हैं। पहला अध्याय हमारे समय की सबसे आधुनिक सच्चाई है: शरीर 21वीं सदी का है, पर मन अभी भी कुरुक्षेत्र में ही उलझता है।

दूसरे अध्याय में कृष्ण डॉक्टर की तरह “डायग्नोसिस” करते हैं। वे पहले अर्जुन की कमजोरी को नाम देते हैं—“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ” (2.3)—“ऐसी दुर्बलता मत अपनाओ।” फिर वे बताते हैं कि करुणा और मोह एक जैसे नहीं। मोह वह करुणा है जिसमें “मैं” छुपा होता है—अपना दुख, अपनी छवि, अपनी भावुकता। कृष्ण आत्मा का फ्रेम रखते हैं—“न जायते म्रियते वा कदाचित्” (2.20)—आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यहाँ गीता मृत्यु-उत्सव नहीं मना रही; वह डर का इलाज कर रही है। क्योंकि भय ही आदमी को गलत निर्णयों में धकेलता है। और फिर आता है गीता का सबसे व्यावहारिक, सबसे उद्धृत, सबसे गलत समझा गया सूत्र—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (2.47)। लोग इसे ‘फल छोड़ दो’ कहकर भाग्यवादी बन जाते हैं, जबकि कृष्ण कह रहे हैं—फल को मालिक मत बनाओ। काम करो, पर काम को अपने अहंकार का पोस्टर मत बनाओ। आज के जीवन में यह श्लोक “परफॉर्मेंस” और “प्रेशर” के बीच संतुलन है: आप अपना सर्वश्रेष्ठ दें, पर रिज़ल्ट को अपनी पहचान का न्यायाधीश न बनाएं। इसी अध्याय में “स्थितप्रज्ञ” का मॉडल आता है—वह जो प्रशंसा में उड़ता नहीं, निंदा में टूटता नहीं, सफलता में उन्मत्त नहीं, विफलता में समाप्त नहीं। यह भावनात्मक स्थिरता आज की सबसे महंगी स्किल है।

तीसरे अध्याय में कृष्ण काम की फिलॉसफी को समाज की संरचना से जोड़ देते हैं। अर्जुन की उलझन है—अगर ज्ञान श्रेष्ठ है, तो कर्म क्यों? कृष्ण कहते हैं—“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्” (3.5)—कोई क्षणभर भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। आप कर्म न भी करें, तो भी “न करने” का कर्म चल रहा है। आज के शब्दों में: इनएक्शन भी एक्शन है, और उसकी कीमत भी लगती है। फिर आता है कर्म का शुद्ध अर्थ—“यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः” (3.9)—यज्ञ-भाव से किया कर्म मुक्त करता है, वरना बांधता है। यज्ञ का अर्थ धूपबत्ती नहीं—यज्ञ का अर्थ है “कर्म का समर्पण”: मैं काम कर रहा हूँ, पर काम मुझे नहीं खा रहा। यही अध्याय बताता है कि समाज चलाने के लिए “कर्तव्य” जरूरी है, वरना सब अधिकारों की दुकान खोलकर बैठ जाएंगे।

चौथे अध्याय में कृष्ण कर्मयोग को ज्ञानयोग की ऊँचाई से जोड़ते हैं। वे कहते हैं—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति” (4.7)—जब धर्म की ग्लानि होती है, तब पुनर्स्थापन होता है। इसका आज का अर्थ यह नहीं कि कोई चमत्कार आएगा; इसका अर्थ यह है कि जब व्यवस्था गिरती है, तब जिम्मेदार लोग उठते हैं—और व्यवस्था का नैतिक पुनर्निर्माण करते हैं। फिर वे ज्ञान की आग की बात करते हैं—“ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते” (4.37)—ज्ञान, कर्मों के बंधन को जला देता है। ज्ञान यहाँ किताबें नहीं—कर्म के पीछे का सही दृष्टिकोण है। इसी अध्याय में “गुरु, प्रश्न, सेवा” की त्रिवेणी है—“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया” (4.34)। आज के विद्यार्थी/प्रोफेशनल के लिए यह सीधा संदेश है: सीखना है तो ‘अहं’ की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी—झुकना, पूछना, और अभ्यास करना पड़ेगा।

पाँचवें अध्याय में कृष्ण कर्म और संन्यास के झगड़े को सुलझाते हैं। वे कहते हैं—“संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ” (5.2)—दोनों कल्याणकारी हैं, पर कर्मयोग अधिक सहज है। यानी दुनिया छोड़कर शांति नहीं; दुनिया में रहते हुए शांति। और फिर वह सूत्र जो आज की ऑफिस-लाइफ का “मानसिक एचआर” बन सकता है—“विद्याविनयसम्पन्ने… पण्डिताः समदर्शिनः” (5.18)—ज्ञानी सबमें समभाव देखता है। समभाव का मतलब सबको एक जैसा ट्रीट करना नहीं; समभाव का मतलब है—भीतर का सम्मान समान रहना। सफल व्यक्ति से भी, साधारण व्यक्ति से भी, विरोधी से भी। यह अध्याय भीतर की स्वच्छता का अध्याय है।

छठे अध्याय में कृष्ण मन के अनुशासन पर आते हैं—ध्यान, अभ्यास, वैराग्य। अर्जुन साफ कहता है—“चञ्चलं हि मनः कृष्ण… बलवद्दृढम्” (6.34)—मन चंचल है, जिद्दी है। कृष्ण जवाब देते हैं—“अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते” (6.35)—अभ्यास और वैराग्य से पकड़ा जाता है। आज के शब्दों में: हैबिट + डिटैचमेंट। रोज़ थोड़ी प्रैक्टिस, और गैरज़रूरी चीज़ों से दूरी। यही अध्याय कहता है कि योग कोई ‘पोज़’ नहीं; योग एक मेंटल पोस्टर है—आप अपने मन के मालिक बनें, मन आपका मालिक न बने। और अंत में वह भरोसा—जो आज की निराशा में दवा है—“न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति” (6.40)—भलाई करने वाला नष्ट नहीं होता। परिणाम तुरंत न दिखे, पर दिशा गलत नहीं होती।

सातवें अध्याय में कृष्ण “ज्ञान+विज्ञान” की बात करते हैं—सिर्फ मानना नहीं, समझना। वे कहते हैं—“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते” (7.19)—बहुत अनुभव के बाद आदमी समझता है कि सब कुछ एक व्यापक व्यवस्था में है। आज के जीवन में यह अध्याय “अहं” को छोटा और “दृष्टि” को बड़ा करता है। हम अपने दुख/सुख को ब्रह्मांड का केंद्र मान लेते हैं; गीता कहती है—केंद्र तुम नहीं, तुम्हारा कर्म-भाव है।

आठवें अध्याय में “अंतकाल” की चर्चा आती है, पर इसका सार डर नहीं—दिशा है। “अन्तकाले च मामेव स्मरन्” (8.5)—अंत समय में जिसे याद करते हो, वही बनते हो। इसका आधुनिक मतलब: जीवन भर जिस चीज़ की प्रैक्टिस करोगे, दबाव में वही बाहर निकलेगी। अगर जीवन भर क्रोध, ईर्ष्या, लोभ का अभ्यास है, तो संकट में वही निकलेगा। अगर जीवन भर संयम, सेवा, सत्य का अभ्यास है, तो संकट में वही निकलेगा। यह अध्याय कहता है: मृत्यु का रहस्य नहीं, जीवन का अभ्यास महत्वपूर्ण है।

नौवें अध्याय में कृष्ण “राजविद्या” देते हैं—भक्ति का अर्थ। “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति” (9.26)—भाव से दिया छोटा-सा अर्पण भी स्वीकार है। यह अध्याय धार्मिक दिखता है, पर असल में यह “इंटेंशन” का अध्याय है। आज के जीवन में यह कहता है: बड़े दान का शोर मत करो, छोटे कर्म का भाव शुद्ध करो। और फिर एक वाक्य जो टूटे हुए मन को जोड़ता है—“अपि चेत्सुदुराचारो… साधुरेव स मन्तव्यः” (9.30)—अगर कोई बहुत गिरा हुआ भी है, पर सही दिशा में चल पड़ा है, तो उसे साधु मानो। यानी आदमी को उसके अतीत से नहीं, उसकी दिशा से पहचानो।

दसवें अध्याय में कृष्ण “विभूतियाँ” बताते हैं—मैं सबमें कैसे प्रकट हूँ। “अहं आत्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः” (10.20)—मैं सबके भीतर आत्मा रूप में हूँ। इसका आज का अर्थ: उत्कृष्टता जहाँ दिखे, उसे ईश्वर का संकेत मानो—चाहे वह विज्ञान हो, कला हो, सेवा हो, कौशल हो। यह अध्याय जीवन में “आदर” पैदा करता है: आप किसी के टैलेंट को देखकर ईर्ष्या नहीं करेंगे, प्रेरणा लेंगे।

ग्यारहवें अध्याय में विराट रूप आता है—यह गीता का सिनेमाई चरम है। अर्जुन कहता है—“दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता” (11.12)—हजार सूर्यों के समान प्रकाश। यह अध्याय बताता है कि सत्य अक्सर हमारी सुविधा से बड़ा होता है। जब अर्जुन भयभीत होता है, तो कृष्ण उसे शांत करते हैं—यह दृश्य हमें बताता है: जीवन में कुछ दृश्य ऐसे होंगे जो हमारे नियंत्रण से बड़े होंगे—बीमारी, मृत्यु, दुर्घटना, समय का कठोर निर्णय। तब अहं पिघलता है और स्वीकार जन्म लेता है। इस अध्याय का संदेश यह नहीं कि “डरो”; संदेश यह है कि “जीवन को छोटा मत समझो।”

बारहवें अध्याय में भक्ति का बहुत मानवीय रूप है—कौन प्रिय है? “अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च” (12.13)—जो किसी से द्वेष नहीं करता, मित्र और करुणामय है। यह अध्याय बताता है कि भक्त होने का प्रमाण मंदिर में नहीं, व्यवहार में है। जो क्षमा कर सकता है, जो शांत रह सकता है, जो दूसरों का अपमान किए बिना असहमति रख सकता है—वही गीता का “प्रिय” है।

तेरहवें अध्याय में “क्षेत्र” और “क्षेत्रज्ञ” आता है—शरीर/मन का क्षेत्र और उसे जानने वाली चेतना। यह अध्याय आधुनिक मनोविज्ञान की तरह कहता है: तुम अपने विचार नहीं हो, तुम विचारों को देखने वाले हो। यह दूरी पैदा होते ही चिंता घटती है। और फिर ज्ञान के लक्षण—विनम्रता, अहिंसा, क्षमा—ये सब “स्पिरिचुअल सजावट” नहीं, भीतर की वैज्ञानिक स्वच्छता हैं।

चौदहवें अध्याय में तीन गुण—सत्त्व, रज, तम—मानव-व्यवहार का नक्शा बनते हैं। आज की भाषा में: मूड्स, ड्राइव, और डलनेस। कोई दिन सत्त्व का—स्पष्टता; कोई दिन रज का—भागदौड़; कोई दिन तम का—आलस/उदासी। गीता कहती है: गुणों को पहचानो, उनसे संचालित मत हो। यह अध्याय आत्म-प्रबंधन है।

पंद्रहवें अध्याय में “ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्” (15.1)—उल्टा अश्वत्थ वृक्ष—एक प्रतीक है: दुनिया की जड़ ऊपर है (चेतना/सत्य), और शाखाएँ नीचे (अनुभव/विषय)। हम शाखाओं में उलझ जाते हैं और जड़ भूल जाते हैं। फिर आता है—“ममैवांशो जीवलोके” (15.7)—जीव मेरा अंश है। इसका आज का अर्थ: आत्मसम्मान किसी पद/पैसे का मोहताज नहीं; इंसान की गरिमा जन्म से है।

सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी संपदा का वर्गीकरण है—यह नैतिक मनोविज्ञान है। दैवी गुण: अभय, शुद्धता, करुणा; आसुरी: दंभ, क्रोध, कठोरता। यह अध्याय कहता है—आपका चरित्र आपकी असली पहचान है, आपकी उपलब्धि नहीं। और समाज का पतन तब होता है जब दंभ को “कॉन्फिडेंस” और क्रूरता को “स्मार्टनेस” कहा जाने लगे।

सत्रहवें अध्याय में श्रद्धा के प्रकार आते हैं—सात्त्विक, राजस, तामस। यहाँ गीता सबसे सूक्ष्म बात कहती है—श्रद्धा भी “क्वालिटी” रखती है। हर विश्वास शुद्ध नहीं होता। आज के जीवन में यह अध्याय अंधविश्वास, फेक-न्यूज़, और भीड़-मानसिकता पर भी लागू होता है: जो श्रद्धा विवेक के बिना है, वह तामस की तरफ झुकती है।

अठारहवें अध्याय में गीता का समापन “निर्णय” पर है—जीवन का अंतिम निष्कर्ष। कृष्ण कहते हैं—“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” (18.66)। इसे लोग गलत समझकर ‘सब छोड़ दो’ मान लेते हैं। असल अर्थ है: जब सारे तर्क, सारे डर, सारे सामाजिक दबाव तुम्हें तोड़ने लगें, तब भीतर के सत्य की शरण लो—जो तुम्हें सही कर्म की तरफ ले जाए। फिर अर्जुन कहता है—“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा” (18.73)—मोह नष्ट हुआ, स्मृति (स्व-बोध) लौट आई। यही गीता का लक्ष्य है: आदमी अपने आप को याद कर ले—मैं कौन हूँ, मेरा कर्म क्या है, मेरा धर्म क्या है, और मुझे कैसे जीना है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

📚 मेरी व्यंग्यात्मक पुस्तकें खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें – “Girne Mein Kya Harz Hai” और “Roses and Thorns
Notion Press –Roses and Thorns अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 0)

Join the conversation and share your thoughts

No comments yet

Be the first to share your thoughts!