जूता बचाओ, शादी बचाओ अभियान
मित्रो, देश वाकई बदल रहा है। अब केवल मौसम विभाग ही भविष्यवाणी नहीं कर रहा , खाप पंचायतें भी वैवाहिक मौसम का पूर्वानुमान जारी करने लगी हैं। एक खबर चौंकाने वाली हो सकती है लेकिन सच है छत्तीसगढ़ के किसी गाँव का मामला है वहां यह निर्णय लिया गया की शादी में जूते चुराई पर रोक लगाईं जाए l इनका मानना है कि शादी में “जूता चुराई” की परंपरा, विवाहोत्तर तलाक की बढ़ती दर का मूल कारण है। यानी अब प्रेम, समझ, संस्कार, संवाद सब फालतू बातें हैं—असल दोषी दूल्हे का जूता है।
खाप का तर्क बड़ा वैज्ञानिक है। उनका कहना है कि जब लड़की पक्ष पहली ही रात दूल्हे का जूता उठा लेता है, तो वही क्षण दरअसल वैवाहिक सत्ता परिवर्तन का उद्घोष होता है। दूल्हा बेचारा उस दिन से समझ जाता है कि जिस घर में जूता सुरक्षित नहीं, वहाँ उसकी प्रतिष्ठा कैसे सुरक्षित रहेगी?
मैंने सोचा, यह शोध नोबेल पुरस्कार के योग्य है। वर्षों से समाजशास्त्री बेकार में संवादहीनता, आर्थिक तनाव, ईगो क्लैश, करियर कॉन्फ्लिक्ट जैसी चीज़ों पर शोध कर रहे थे। किसी ने यह नहीं सोचा कि असली विस्फोट तो बारात के मंडप में हो चुका होता है—जब साली साहिबा जूता लेकर भागती हैं और दूल्हा अपने भविष्य को नंगे पाँव ताकता रह जाता है।
दरअसल जूता चुराई एक सांस्कृतिक खेल नहीं, वैवाहिक ट्रेलर है। उस समय जो मोलभाव होता है—“पाँच हजार देंगे”, “नहीं, दस हजार से कम नहीं”—वही आगे चलकर ईएमआई, शॉपिंग और ससुराल यात्राओं की रिहर्सल बन जाता है। खाप का मानना है कि अगर उसी दिन जूता शांति से वापस मिल जाए, तो वैवाहिक जीवन भी शांति से चल सकता है।
कुछ वरिष्ठ जन ये भी सुझाव दे सकते है कि अब शादी में जूते की जगह चप्पल पहनी जाए। वैस भी कहते हैं शादी के पहने हुए चप्पल जितनी जल्दी टूट जाएँ उतना ही शादी ज्यादा टिकने के आसार होते हैं । चप्पलों के साथ यह थोड़ा जल्दी हो सकता है l खाप अपनी प्रगतिशीलता का प्रमाण देते हुए यह प्रस्ताव भी रख सकता है कि दूल्हा शादी में नंगे पाँव आए—न रहेगा जूता, न होगी चोरी, न बढ़ेगा तलाक। सामाजिक सुधार का यह सरलतम सूत्र है।
मैं सोच रहा हूँ, अगला कदम क्या होगा? शायद यह घोषणा भी हो कि विदाई के समय रोना-धोना बंद कर दिया जाए, क्योंकि आँसू नमक बढ़ाते हैं और नमक से रिश्तों में खारापन आता है।
हमारा समाज कारण खोजने में बड़ा दक्ष है—बस असली कारण छोड़कर। संवाद की कमी, बराबरी की असहजता, बदलती भूमिकाएँ—ये सब भारी शब्द हैं। जूता हल्का है, इसलिए दोष उसी पर डाल देना सुविधाजनक है। आखिर जूता भी क्या करे? वैसे भी जूता आजकल पहने के के लिए कम और चलने के लिए ज्यादा काम आ रहा है ।शादियों में जूतमपैजार की घटनाएं भी इस से कम होंगी l
तब तक आप निश्चिंत रहिए। अगली बार किसी शादी में जाएँ तो जूते पर नज़र रखिए—कहीं आपका वैवाहिक भविष्य फीते में उलझ न जाए। समाज सुरक्षित रहेगा, बस जूते सुरक्षित रहें।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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