नकल में नवाचार

नकल में नवाचार

देश में इन दिनों एक बड़ा बौद्धिक उद्घाटन हुआ है। पता चला कि नक़ल में भी नवाचार हो सकता है—बस उसे “इंडिजिनस” कहकर मंच पर पेश करना आना चाहिए। किसी विश्वविद्यालय ने चीनी रोबोडॉग को स्वदेशी बताकर प्रस्तुत कर दिया। पराया माल भी अपना-सा लगने लगता है, यदि उसे सही उच्चारण और आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया जाए। मोहतरमा अंग्रेज़ी में कुछ ऐसी ही गिटपिटा रही थीं, जैसे किसी और के बगीचे के आम तोड़ते हुए पकड़ी गई हों और अब उसे “इंटरनेशनल कोलैबोरेशन” बता रही हों।

मुझे तो आश्चर्य इस बात का है कि लोग इस पर इतना चिल्ल-पों क्यों मचा रहे हैं? हम तो सदियों से यही करते आए हैं। हमारी परंपरा में मौलिकता एक संदिग्ध गतिविधि मानी जाती है। जो सचमुच कुछ नया करने की सोच ले, वह कुल-परंपरा का नाश करने वाला समझा जाता है—माँ-बाप के सपनों को चकनाचूर करने वाला। “बेटा, जैसा सब करते हैं वैसा करो”—यह वाक्य हमारे सांस्कृतिक संविधान की प्रस्तावना है।

साहित्य के क्षेत्र में तो नक़ल हमारी राष्ट्रीय धरोहर है। कवि सम्मेलन में कई कविताएँ ऐसी ही मिलती हैं जिनका जन्म किसी और की डायरी में हुआ था, पर परवरिश किसी और के कंठ में। शेर ग़ालिब का होता है, दर्द मीर का, तुकबंदी मंचीय कवि की, और तालियाँ आयोजक की। हम इतने उदार हैं कि दूसरों के विचार भी अपने नाम से छापकर उन्हें प्रसिद्धि दिला देते हैं—भले उन्हें स्वयं पता न हो कि वे प्रसिद्ध हो चुके हैं।

अब लोकतंत्र की ही बात ले लीजिए। हम गर्व से कहते हैं कि हमारा लोकतंत्र सबसे बड़ा है। बड़ा है—क्योंकि हमने उसे कई देशों से थोड़ा-थोड़ा उधार लेकर बनाया है। संविधान में भी हमने विश्व-भ्रमण किया—कहीं से मौलिक अधिकार, कहीं से नीति-निर्देशक तत्व, कहीं से संसदीय प्रणाली। यह अलग बात है कि मौलिक कर्तव्यों को हमने परिशिष्ट में रख छोड़ा है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर ही याद आएँ।

शिक्षा व्यवस्था में नक़ल को तो हमने लोकतांत्रिक अधिकार का दर्जा दे दिया है। सामूहिक दस्तावेज़ की साझा विरासत को आगे बढ़ाते हुए छात्र राष्ट्रीय एकता का जीवंत प्रदर्शन करते हैं। पीछे वाला आगे वाले से प्रेरणा लेता है, आगे वाला बाएँ वाले से, और निरीक्षक सबको देख-देखकर राष्ट्रीय समरसता पर प्रसन्न होता रहता है। परीक्षा कक्ष अब ज्ञान का नहीं, सहयोगात्मक शोध का केंद्र बन चुका है।

राजनीति में तो नक़ल एक उच्च कोटि की कला है। एक दल घोषणा-पत्र जारी करता है, दूसरा उसी को नए कवर में छाप देता है।

अब विश्वविद्यालय ने यदि किसी विदेशी रोबोट को स्वदेशी बताकर मंच पर रख दिया तो इसमें नया क्या है? हमने तो विचारों को भी आयात-निर्यात करके देसी बना लिया है। हम इसे चोरी मानते ही नहीं। हम सीना ठोककर कहते हैं—यह हमारा मौलिक अधिकार है। हमने तो छह दिखाया था, आपने उसे नौ समझ लिया तो यह आपकी दृष्टि-दोष है। अगर हम चोर होते तो क्या इतनी शान से प्रेस कॉन्फ्रेंस करते? हम शर्मिंदा नहीं हैं—यह तो हमारी उदारता है कि हम स्पष्टीकरण दे रहे हैं। और एक आप हैं कि खामख़्वाह इस मामूली घटना पर प्रश्न उठा रहे हैं। अरे, हमारा कैलिबर देखिए—पराए माल को अपना बताकर शोध के खाते में पाँच सौ पचास करोड़ समायोजित कर लिए। प्रेरणा लेनी हो तो इस कला से लीजिए—शायद आपके भी काम आ जाए।

नकल में नवाचार—इसमें महारत हासिल है हमें।

हम सब इस महान परंपरा के वारिस हैं। हम विचारों की खेती कम और प्रतिलिपियों की फसल अधिक उगाते हैं। बस इतना प्रयास करना है कि नक़ल भी करें और पकड़े भी न जाएँ। इस बाबत थोड़ा और प्रयास करेंगे—शायद अगली बार आपको यह शिकायत करने का अवसर ही न मिले।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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