राष्ट्रीय विज्ञान दिवस : प्रयोगशाला से समाज तक की यात्रा
कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब एक साधारण भारतीय लैब में, बिना किसी विदेशी सहायता के, केवल सूर्य की रोशनी और एक प्रिज़्म के सहारे कोई वैज्ञानिक ऐसी खोज कर ले, जिसने पूरी दुनिया के भौतिकी के नियमों को नया मोड़ दे दिया। क्या आप उस क्षण पर गर्व नहीं करेंगे? निस्संदेह करेंगे। वह केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं होगी, उसे आप पूरे राष्ट्र की चेतना का उदय कह सकते हैं।
आज 28 फ़रवरी है — वही ऐतिहासिक दिन, जब 1928 में डॉ. सी. वी. रमन ने यह सिद्ध किया कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी माध्यम से गुजरता है, तो कुछ फोटॉनों की तरंगदैर्घ्य बदल जाती है। यही ‘रमन प्रभाव’ था। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, संसाधनों की भारी कमी थी, और यह स्थापित धारणा थी कि मौलिक वैज्ञानिक शोध केवल यूरोप और अमेरिका की बपौती है। ऐसे दौर में एक भारतीय वैज्ञानिक ने इस मिथक को तोड़ दिया। विश्व भर के वैज्ञानिक चकित रह गए—एक गुलाम देश का एक सामान्य नागरिक ऐसी खोज कैसे कर सकता है? इस खोज ने वैज्ञानिक तथ्यों को नई दिशा दी और भारत को विश्व वैज्ञानिक मानचित्र पर स्थापित कर दिया।
रमन की प्रयोगशाला भव्य नहीं थी। उनके पास अत्याधुनिक उपकरण नहीं थे। पर उनके पास जिज्ञासा थी, तर्कशीलता थी, और सबसे बढ़कर वह साहस था जो स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता है। विज्ञान वहीं जन्म लेता है, जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता हो और उत्तर खोजने का धैर्य हो।
हम आज ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ मना रहे हैं, लेकिन यह केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति बनकर न रह जाए। यह आत्ममंथन का अवसर भी है। क्या हमने विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं और परीक्षाओं तक सीमित कर दिया है? क्या हमारे बच्चों के लिए विज्ञान सिर्फ अंक प्राप्त करने का माध्यम बन गया है? या वह जिज्ञासा, खोज और तर्क का उत्सव भी है?
डॉ. रमन का मानना था कि विज्ञान समाज का हिस्सा बनना चाहिए। उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में महत्वपूर्ण योगदान दिया, ‘रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की स्थापना की, और भारतीय वैज्ञानिकों को आत्मनिर्भर बनने का संदेश दिया। उनका स्पष्ट कथन था—“हमें पश्चिम से ज्ञान उधार लेने की आवश्यकता नहीं है, हमारी धरती पर ही विज्ञान को जन्म देने की क्षमता है।”
आज के दौर को देखते हुए उनका यह कथन कितना प्रासंगिक है, यह आप स्वयं समझ सकते हैं। विज्ञान केवल उपकरणों से नहीं, मानसिकता से बनता है। वैज्ञानिक सोच का अर्थ है—हर सूचना को परखना, हर परंपरा को तर्क की कसौटी पर कसना, और हर समस्या को समाधान की दृष्टि से देखना। जब समाज में अंधविश्वास, अफवाह और भावनात्मक उन्माद तर्क पर हावी हो जाते हैं, तब विज्ञान दिवस केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
हम अक्सर प्रश्न करते हैं—आजादी के इतने दशकों बाद भी दूसरा ‘रमन’ क्यों नहीं पैदा हुआ? शायद इसलिए कि रमन जैसा व्यक्तित्व केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि एक वातावरण से जन्म लेता है—जिज्ञासा, परिश्रम और स्वतंत्र चिंतन के वातावरण से। यदि हम बच्चों को केवल ‘सही उत्तर’ रटाना सिखाएँगे, लेकिन ‘सही प्रश्न’ पूछना नहीं सिखाएँगे, तो विज्ञान की धारा अवरुद्ध हो जाएगी।
आज आवश्यकता है कि हम विज्ञान को अंकों के दायरे से मुक्त कर अनुभव से जोड़ें। विद्यालयों की प्रयोगशालाएँ सक्रिय हों, पर उससे भी अधिक सक्रिय हों बच्चों के मन। माता-पिता बच्चों के ‘क्यों’ से परेशान न हों, बल्कि उसे प्रोत्साहित करें। शिक्षक पाठ्यपुस्तकों की सीमाओं से बाहर निकलकर जिज्ञासा का दीप प्रज्वलित करें। मीडिया सनसनी के स्थान पर वैज्ञानिक तथ्यों को प्राथमिकता दे।
विज्ञान का अर्थ केवल रॉकेट और रोबोट नहीं है। यह हमारी दैनिक जीवन शैली में भी समाहित है—स्वच्छता की आदतों में, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में, पर्यावरण संरक्षण में, और विवेकपूर्ण निर्णय लेने में। जब हम किसी अफवाह को बिना जांचे साझा नहीं करते, जब हम चिकित्सकीय सलाह का पालन करते हैं, जब हम प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार करते हैं—तब हम विज्ञान के पक्ष में खड़े होते हैं।
एक साधारण प्रयोगशाला में भी असाधारण खोज संभव है। शर्त केवल इतनी है कि भीतर जिज्ञासा की लौ प्रज्वलित रहे। क्या हम यह संकल्प नहीं ले सकते कि विज्ञान को केवल ‘विषय’ नहीं, बल्कि ‘विचार’ बनाएँगे? तर्कशीलता को अपनी आदत बनाएँगे, प्रश्न पूछने की संस्कृति को प्रोत्साहित करेंगे। क्योंकि जब समाज की चेतना वैज्ञानिक होगी, तभी प्रयोगशालाओं में नई क्रांतियाँ जन्म लेंगी।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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