संवेदना , में छिपी अपनी वेदना !

वेदना से कराहते लोगो को समाज में संवेदना व्यक्त करने का एक अपना सिलसिला है । लेकिन वेदना से कराहते लोगों को जो संवेदना का मरहम लगाते हैं उसमें उनकी वेदना भी छिपी रहती है ।इन दिनों संवेदना देने के लिए समाज के अलावा सार्वजनिक जिंदगी के अनेक लोग इस फील्ड में उतर गए हैं । हकीकत में वे काफी सोच विचार ,मंथन के बाद इस संवेदना देने के समर में उतरे हैं । और उन्हें मालूम है की संवेदना देने से सामने वाले की वेदना खत्म हो या ना हो लेकिन उनकी वेदना को राहत जरूर मिलती है।
संवेदना देने से लोकप्रियता हासिल होने के फार्मूले को जानकर अनेक माननीय संवेदनाओं को व्यक्त करने के मामले में पीछे नहीं रहते है ।सोशल मीडिया में संवेदना देने वालो के संदेशों को पढ़कर आजीज हो चुके पं लचकराम जी मॉर्निंग वॉक में बोले कि एक माननीय को बस पता भर चल जाना चाहिए कि संवेदना व्यक्त करने जाना है ,बस वे संवेदना देने के लिए कमर कस लेते है । वे अति संवेदनशील होकर संवेदना प्रुफ है । जरा जरा सी वेदना का उन्हें पता भर लग जाए वह संवेदना देने जाने से चुकते नहीं है ।उन्हें कहीं भी और कहां भी यहां तक कि सफेद तना हुआ पंडाल दिख जाए तो वे संवेदना देने पहुंच जाते हैं ।
इस पर पंडित जी बोले उन्हें एक मित्र का पता चला कि वे सुन्न हो गए यानी की उनके हाथ पैरों ने हल्का-फुल्का काम करना बंद कर दिया है ,यह सुनकर माननीय उनके घर पहुंचे ,वह बैठ नहीं पा रहे थे , उन्होनें बिस्तर पकड़ लिया था ,लेकिन संवेदना प्रकट करने वाले माननीय ने अपने असिस्टेंट और उनके अटेंडर को इशारा कर उन्हें सहारा देकर फोटो खींचने के लिए खड़े करने का कहा ।फोटो खींचने के बाद उनके लिए संवेदना और माननीय की वेदना जब सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो संवेदना से मरीज की फोटो इनके इष्ट मित्रों ,रिश्तेदारों तक खबर पहुंच गई । अब क्या था दूसरे दिन से ही हाल-चाल जानने वालों ,संवेदना व्यक्त करने वालों अपने अपने नुस्खो की राय देने वाले ,निकट के ,दूर के रिश्तेदारों ,मोहल्ले वालों को उनके हाल-चाल जानने के लिए संवेदना व्यक्त करने का रास्ता मिल गया। संवेदना देने वालों के कारण मरीज के साथ परिजनों की वेदना भी बढ़ गई। उनकी आव भगत से वे दुखी हो गए ।जब एक दो संवेदन देने वालों को आवभगत ने प्रॉपर रिस्पांस नहीं मिला तो बोले वे बहुत अनियमित थे लापरवाह थे इस कारण देखो न पलंग पकड़ लिया। यह कहकर यह संवेदना को ताक में रखकर अपनी वेदना व्यक्त करने से नहीं चूके ।
वे बोले वैसे भी संवेदना व्यक्त करने का कोई पैमाना नहीं है गुपचुप तरीके से व्यक्ति की गई संवेदना संवेदना नहीं है। संवेदना के लिए माला डले फोटो के साथ, या फूल चढ़ाते फोटो जब तक लोगों के बीच में सोशल मीडिया से नहीं पहुंचते तब तक संवेदना के कोई मायने नहीं होते हैं । पंडित जी बोले अरे एक तरफ तो वे अपने
खोए परिजन के चित्र के साथ बैठे हैं दूसरी तरफ संवेदना व्यक्त करने के लिए उनके साथ फोटो खींचने के लिए उन्हें आगे पीछे खिसकाना , कई जगह तो उन परिजनों को खड़ा कर फोटो खींचाने के लिए मजबूर कर अपनी वेदना को दूर करते है और संवेदना । को चूर-चूर करते हैं।
यही नहीं संवेदना व्यक्त करने वाला अपने साथ एक फोटो खींचने वाला भी ले जाते हैं वह जैसे ही बैठे, उठे उनका फोटो घर से बाहर निकले उसके पहले ही सोशल मीडिया पर संवेदना की धूम मचा देता है ,लाइक शेयर पा लेता है इससे उनकी वेदना को भारी संवेदना मिल जाती है। इस तरह संवेदना , असली वेदना वाले और ए आई वेदना वाले दोनों को मिल जाती है ।
उधर संवेदनशीलता को कई लोगों ने लोकप्रियता हासिल करने का हथियार बना लिया। एक माननीय ने तो अपने भाषण में कहना शुरू कर दिया कि वह साल में इत्ती जगह बैठ बैठने, इत्ती जगह उठने ,उठावने , इत्ती जगह अंतिम संस्कार में पहुंचे ।विपक्ष का कोई नेता इस बराबरी को नहीं कर सकता। इस तरह संवेदनशील बयान जारी कर वे अपने को कुछ भी हासिल नहीं होने से वे वेदना से लबरेज भरे हैं ।यही नहीं संवेदना ,वेदना के अन्य इफैक्टो में अस्पताल भी होते हैं। अस्पताल में बीमार के हाल-चाल जानने की संवेदना देने के मामले में वह माननीय होने से चर्चा में आने के
लिए डॉक्टर से भिड़ लेते हैं, अस्पताल के पलंग चादर का जिक्र कर अपनी राजनीति की चादर बिछाते है । यहां पर संवेदना देने के अलावा अस्पताल.वालो पर रौब जमा कर मरीज की संवेदना और सहनुमति भी ले लेते हैं ।
इस तरह दुनिया में विभिन्न वेदना से व्यथितों को संवेदना देने का एक ऐसा अस्त्र मिल गया है जो संवेदना से ज्यादा वेदना को व्यक्त करने का माध्यम बन गया है ।

Prem Chand Dwitiya

Prem Chand Dwitiya

Address 34 पत्रकार कॉलोनी बडनगर 456 771 जिला उज्जैन म…

Address 34 पत्रकार कॉलोनी बडनगर 456 771 जिला उज्जैन म प्र है

Comments ( 1)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

4 minutes ago

आजकल संवेदना भी एक सार्वजनिक प्रदर्शन बनती जा रही है। जहाँ पहले दुख के क्षणों में चुपचाप कंधा देना ही पर्याप्त माना जाता था, वहीं अब संवेदना के साथ कैमरा, पोस्ट और लाइक-शेयर भी अनिवार्य सामान बन गए हैं। इस व्यंग्य में बड़ी सटीकता से उस विडंबना को पकड़ा गया है जहाँ असली वेदना से ज्यादा महत्व उसकी तस्वीर को मिल जाता है।

लेख पढ़ते हुए बार-बार यही लगता है कि संवेदनशीलता का यह नया संस्करण दरअसल लोकप्रियता का शॉर्टकट बन गया है। लेखक ने हल्के हास्य और तीखे कटाक्ष के माध्यम से दिखाया है कि कैसे “संवेदना” कई बार पीड़ित की नहीं, बल्कि संवेदना देने वाले की आत्मसंतुष्टि का साधन बन जाती है। यही इस रचना की सबसे बड़ी ताकत है।