समय का धर्म: BC, AD और Year Zero की उलझी हुई कहानी

हम जब भी कोई तारीख लिखते हैं—2026, 1998, 500 BC या 100 AD—तो हमें लगता है कि हम कोई बिल्कुल स्पष्ट, निर्विवाद और वैज्ञानिक चीज़ दर्ज कर रहे हैं। जैसे कोई गणितीय तथ्य लिख दिया हो, जिसमें न भावना है, न पक्षपात, न कोई छिपी हुई कहानी। लेकिन जैसे ही आप इस सतह को थोड़ा-सा खुरचते हैं, भीतर से एक बिल्कुल अलग दुनिया झाँकने लगती है—जहाँ कैलेंडर केवल दिन गिनने का यंत्र नहीं, बल्कि कथा, सत्ता और पहचान का एक ऐसा ताना-बाना बन जाता है, जो धीरे-धीरे हमारी सोच को भी आकार देता रहता है।

BC और AD को ही ले लीजिए। देखने में ये दो छोटे-से संक्षेप लगते हैं—Before Christ और Anno Domini। लेकिन इनका काम केवल समय को बाँटना नहीं है, बल्कि समय को एक केंद्र देना भी है। जब आप “AD 2026” लिखते हैं, तो आप अनजाने में यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि पूरी मानव-इतिहास की धुरी एक खास बिंदु के आसपास घूमती है—क्राइस्ट के जन्म के आसपास। यह केवल तारीख नहीं, एक संदेश भी है, जो हर दिन, हर दस्तावेज़, हर कागज़ पर बार-बार दोहराया जाता है। बिना किसी शोर के, बिना किसी घोषणा के, एक विचार आपके दिमाग में स्थायी रूप से स्थापित कर दिया जाता है कि “समय का केंद्र यही है।” यह वही सूक्ष्मता है, जहाँ विचार तलवार से नहीं, आदत से फैलते हैं—और तारीख़ जैसी साधारण चीज़ उस आदत का सबसे भरोसेमंद माध्यम बन जाती है।

जब इस पर सवाल उठे, तो शब्द बदल दिए गए—BC और AD की जगह BCE और CE आ गए। अब भाषा थोड़ी “तटस्थ” लगने लगी—Before Common Era और Common Era। सुनने में सब कुछ बहुत आधुनिक और समावेशी प्रतीत होता है, जैसे धर्म को हटा दिया गया हो और एक सार्वभौमिक ढाँचा स्थापित कर दिया गया हो। लेकिन जरा ठहरकर देखें तो प्रश्न वही खड़ा रहता है—यह “कॉमन एरा” शुरू कहाँ से होती है? वही बिंदु, वही जन्म, वही संदर्भ। यानी नाम बदल गया, पर केंद्र जस का तस बना रहा। जैसे किसी दुकान का बोर्ड बदल जाए, लेकिन अंदर बिकने वाली चीज़ वही पुरानी रहे। भाषा के स्तर पर तटस्थता आ गई, पर संरचना के स्तर पर वही पुराना आधार कायम रहा।

यहीं से वह उलझन शुरू होती है जो पहली नज़र में छोटी लगती है, लेकिन सोचते ही गहरी हो जाती है—Year Zero की अनुपस्थिति। अगर पूरा कैलेंडर एक जन्म-क्षण के आधार पर खड़ा है, तो क्या उस जन्म का कोई स्पष्ट “शून्य वर्ष” होना चाहिए? लेकिन यहाँ तो सीधे 1 BC से 1 AD पर छलांग लग जाती है। बीच में कोई Year 0 नहीं। अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह वास्तविक क्षण कहाँ गया, जहाँ से गणना शुरू होनी चाहिए थी? क्या जन्म 1 BC में हुआ, या 1 AD में, या फिर जैसा कई ऐतिहासिक शोध संकेत देते हैं, शायद 4 BC या 6 BC के आसपास? अगर आधार ही खिसका हुआ हो, तो ऊपर खड़ी पूरी इमारत में एक हल्की-सी डोलाहट बनी रहती है—भले वह बाहर से कितनी ही सुदृढ़ क्यों न दिखे।

और फिर एक और रोचक विरोधाभास सामने आता है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। यदि पूरा समय-गणना तंत्र एक जन्म के इर्द-गिर्द बनाया गया है, और उस जन्म को 25 दिसंबर से जोड़ा जाता है, तो वर्ष की शुरुआत उसी दिन से क्यों नहीं होती? नया साल 1 जनवरी से क्यों शुरू होता है? यहाँ तर्क से ज्यादा परंपरा और ऐतिहासिक निर्णय काम करते दिखते हैं। यानी जिस स्तंभ पर पूरी इमारत टिकाई गई है, उसी स्तंभ के पास प्रवेश-द्वार किसी और दिशा में खोल दिया गया है। यह वैसा ही है जैसे घर का मुख्य दरवाज़ा एक तरफ हो और नामपट्टिका दूसरी तरफ—दोनों जुड़े हुए भी हैं और अलग भी।

इस पूरी चर्चा में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—इतिहास और प्रमाण के बीच की दूरी। यहाँ मुद्दा यह नहीं है कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का अस्तित्व था या नहीं था, बल्कि यह है कि उस अस्तित्व की तारीख़, उसका सटीक निर्धारण, और उससे जुड़ी घटनाएँ कितनी स्पष्ट हैं। जब स्वयं आधार बिंदु को लेकर विभिन्न मत और शोध मौजूद हों, तब उसी आधार को पूरी मानव-समय-रेखा का सार्वभौमिक केंद्र बना देना अपने आप में एक दिलचस्प स्थिति पैदा करता है। यह वैसा ही है जैसे किसी नक्शे का केंद्र-स्थान ही थोड़ी धुंध में हो, लेकिन बाकी सारी दिशाएँ उसी के हिसाब से तय की जा रही हों।

यहीं आकर यह प्रश्न और गहरा हो जाता है कि आखिर कैलेंडर का उद्देश्य क्या होना चाहिए। क्या वह केवल संख्याएँ देने का औज़ार है, जिससे हम दिन, महीना और वर्ष गिन सकें? या वह समय की प्रकृति, उसकी गति और उसके संदर्भ को भी किसी हद तक स्पष्ट करे? जब हम इस दृष्टि से देखते हैं, तो यह समझ में आता है कि ग्रेगोरियन कैलेंडर की वर्ष-गणना केवल खगोलीय गणित का परिणाम नहीं है, बल्कि उसमें ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कथाएँ भी गहराई से बुनी हुई हैं।

अंततः BC, AD, BCE और CE केवल शब्द नहीं रह जाते—वे एक मानसिक ढाँचा बन जाते हैं, जिसके भीतर हम समय को देखने के आदी हो जाते हैं। हम बिना सोचे मान लेते हैं कि समय की धुरी यहीं से गुजरती है, जबकि उस धुरी की स्थिति खुद बहस और व्याख्या का विषय हो सकती है। और शायद यही इस पूरी चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है—कि जिसे हम सबसे अधिक “साफ-सुथरा” और “वैज्ञानिक” मानते हैं, उसके भीतर भी इतिहास की सिलवटें, परंपरा के पैबंद और मानवीय निर्णयों की छाप मौजूद होती है।

इसलिए बात कैलेंडर को नकारने की नहीं, बल्कि उसे समझने की है। यह समझने की कि समय को मापने की हमारी पद्धति केवल आकाश की चाल से नहीं, बल्कि मनुष्य की सोच, उसकी मान्यताओं और उसकी ऐतिहासिक यात्राओं से भी बनती है। और जब यह समझ आ जाती है, तब तारीख लिखते समय भी मन के किसी कोने में एक हल्की-सी जिज्ञासा बनी रहती है—कि हम सिर्फ साल नहीं लिख रहे, हम एक कहानी का हिस्सा भी लिख रहे हैं।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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