दुर्गा सप्तशती: भीतर के असुरों से युद्ध और देवी का जागरण

हम दुर्गा सप्तशती को अक्सर एक धार्मिक ग्रंथ की तरह पढ़ते हैं—श्लोक, पूजा, पाठ, आरती—और फिर जीवन अपनी उसी पुरानी रफ्तार से चलता रहता है। लेकिन ज़रा ठहरकर अगर इसे एक कहानी की तरह पढ़ा जाए, तो पता चलता है कि यह बाहर के युद्धों से ज्यादा हमारे भीतर चल रहे युद्धों की कथा है। यह देवी और असुरों की कहानी नहीं, बल्कि हमारे मन और हमारी चेतना की कहानी है।

मनुष्य का मन बड़ा विचित्र है। वह कभी जागा हुआ होता है, तो कभी सोया हुआ। जब वह जागा होता है, तो स्पष्ट देखता है, सही-गलत का भेद समझता है; और जब सोया होता है, तो वही मन भ्रमों में उलझ जाता है। दुर्गा सप्तशती की शुरुआत भी यहीं से होती है—विष्णु सोए हुए हैं। और जैसे ही चेतना सोती है, भीतर से मधु और कैटभ जैसे असुर जन्म लेते हैं। यह कोई बाहरी घटना नहीं, हमारे रोज़ के अनुभव की बात है। जब हम सजग नहीं होते, तब हमारे भीतर ही गलत धारणाएँ, मीठे भ्रम और कठोर अहंकार पनपने लगते हैं। हम खुद को सही मानते रहते हैं, भले ही भीतर कुछ सड़ रहा हो।

फिर एक क्षण आता है जब भीतर से पुकार उठती है—कुछ ठीक नहीं है। वही पुकार ब्रह्मा की प्रार्थना है, और उसी के साथ भीतर की शक्ति जागती है—देवी। जैसे ही चेतना जागती है, भ्रम का अंत होना शुरू हो जाता है। यह पहला संकेत है कि जीवन में सबसे बड़ी साधना बाहर कुछ जोड़ना नहीं, बल्कि भीतर जागना है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मनुष्य केवल भ्रम में ही नहीं जीता, वह शक्ति के नशे में भी जीता है। और यही हमें महिषासुर की कथा तक ले आता है। महिषासुर केवल एक राक्षस नहीं है, वह हमारी वही प्रवृत्ति है जो कहती है—मेरे पास ताकत है, इसलिए मैं सही हूँ। यह ताकत धन की हो सकती है, पद की हो सकती है, ज्ञान की हो सकती है या शरीर की भी। जब यह ताकत विवेक से कट जाती है, तो महिषासुर बन जाती है।

यहाँ एक अद्भुत बात सामने आती है—देवता अलग-अलग होकर हार जाते हैं, लेकिन जब सब मिलते हैं, तब देवी का जन्म होता है। यह बहुत गहरा संकेत है। हमारे भीतर भी कई अच्छी शक्तियाँ होती हैं—ज्ञान, धैर्य, करुणा, अनुशासन, साहस—लेकिन जब ये बिखरी रहती हैं, तब हम हार जाते हैं। जब ये एकजुट होती हैं, तब भीतर एक नई शक्ति पैदा होती है, जिसे हम देवी कह सकते हैं।

महिषासुर बार-बार रूप बदलता है। कभी भैंसा, कभी मनुष्य, कभी कुछ और। यह भी कोई संयोग नहीं है। हमारे भीतर का अहंकार भी ऐसा ही है—कभी क्रोध बन जाता है, कभी तर्क बन जाता है, कभी पीड़ित होने का अभिनय करने लगता है। हम सोचते हैं कि हमने उसे जीत लिया, लेकिन वह किसी और रूप में सामने आ जाता है। इसीलिए यह युद्ध लंबा चलता है। अंत में विजय तब मिलती है जब भीतर का संतुलन, संयम और सजगता एक साथ खड़े होते हैं।

लेकिन मन की यात्रा इससे भी आगे जाती है। अब आते हैं शुंभ और निशुंभ। ये दोनों बहुत साधारण लगते हैं, पर असल में सबसे खतरनाक हैं। एक कहता है—मैं महान हूँ। दूसरा कहता है—सब मेरा है। यही तो जीवन की अधिकांश समस्याओं की जड़ है। हम अपने विचारों को अपना मानते हैं, अपने रिश्तों को अपना मानते हैं, अपने पद और उपलब्धियों को अपना मानते हैं, और धीरे-धीरे यह ‘मेरा’ और ‘मैं’ इतना भारी हो जाता है कि हम उसके नीचे दबने लगते हैं।

इसी बीच धूम्रलोचन आता है—धुएँ से भरी हुई दृष्टि। वह स्थिति जब हम चीजों को साफ नहीं देख पाते। न सही समझ आता है, न गलत। हर बात धुंधली लगती है। ऐसे समय में जीवन बहुत उलझ जाता है। लेकिन जैसे ही थोड़ी स्पष्टता आती है, जैसे ही भीतर की दृष्टि साफ होती है, बहुत-सी उलझनें अपने आप समाप्त हो जाती हैं। सत्य को हमेशा लंबी बहस की जरूरत नहीं होती, कभी-कभी एक साफ नजर ही काफी होती है।

फिर आते हैं चंड और मुंड—उग्रता और संवेदनहीनता का मेल। जब मनुष्य क्रोध में होता है और साथ ही संवेदना खो देता है, तब वह सबसे खतरनाक होता है। वह सही को भी गलत कर सकता है, और गलत को भी सही ठहरा सकता है। ऐसे समय में भीतर की शक्ति को भी उग्र रूप लेना पड़ता है। इसलिए देवी काली बनती हैं—यह संकेत है कि हर स्थिति में एक ही तरह की कोमलता काम नहीं करती।

और फिर आता है सबसे अद्भुत पात्र—रक्तबीज। उसके रक्त की हर बूंद से नया असुर पैदा हो जाता है। यह दृश्य भले ही पौराणिक लगे, लेकिन असल में यह हमारे मन की सबसे सटीक तस्वीर है। एक इच्छा पूरी होती है, दस और पैदा हो जाती हैं। एक समस्या हल होती है, दूसरी खड़ी हो जाती है। एक डर जाता है, दूसरा आ जाता है। हम सोचते हैं कि हमने कुछ खत्म कर दिया, लेकिन वह फैल जाता है।

रक्तबीज हमें सिखाता है कि समस्याओं को केवल ऊपर-ऊपर से खत्म नहीं किया जा सकता। अगर जड़ को नहीं समझा, तो वे बार-बार जन्म लेंगी। इसलिए काली उसका रक्त जमीन पर गिरने ही नहीं देतीं—अर्थात समस्या को वहीं पकड़ो जहाँ वह पैदा हो रही है। यह भीतर की गहरी सजगता का प्रतीक है।

दुर्गा सप्तशती बार-बार यह भी कहती है—“या देवी सर्वभूतेषु…” यानी देवी हर प्राणी में, हर भावना में, हर शक्ति में मौजूद हैं। यह बहुत बड़ा विचार है। इसका मतलब है कि देवी केवल मंदिर की मूर्ति नहीं हैं। जब आप किसी की मदद करते हैं, वह देवी है। जब आप कठिन समय में धैर्य रखते हैं, वह देवी है। जब आप सही बात के लिए खड़े होते हैं, वह देवी है। जब आप अपने ही गलत विचार को छोड़ने का साहस करते हैं, वह भी देवी है।

इस पूरे ग्रंथ को अगर एक वाक्य में समझना हो, तो शायद यूँ कहा जा सकता है कि मनुष्य के भीतर एक ऐसी शक्ति छिपी है जो उसे उसके सबसे बड़े डर, सबसे गहरे भ्रम और सबसे जिद्दी अहंकार से भी मुक्त कर सकती है। लेकिन वह शक्ति तभी जागती है जब मनुष्य ईमानदारी से अपने भीतर झाँकता है।

इसलिए दुर्गा सप्तशती केवल पूजा का ग्रंथ नहीं है, यह आत्म-जागरण की कथा है। यह हमें बताती है कि जीवन केवल सहज नहीं है, इसमें संघर्ष है; लेकिन वही संघर्ष हमें अपने असली स्वरूप तक पहुँचाता है। और जब हम उस स्वरूप को पहचान लेते हैं, तब पता चलता है कि जिस देवी को हम बाहर खोज रहे थे, वह तो हमेशा से हमारे भीतर ही थी—बस जागने का इंतज़ार कर रही थी।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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