डिजिटल लत और परिवारों के बिखरते ताने-बाने

डिजिटल लत और परिवारों के बिखरते ताने-बाने

भारत के एक छोटे शहर राजपालयम में, तमिलनाडु के दक्षिणी छोर पर, एक 15 वर्ष का लड़का शाम ढलते ही
छत पर चढ़ जाता है क्योंकि वहाँ इंटरनेट बेहतर चलता है। उसके माता-पिता ने — पिता एक दुकान में काम करते हैं, माँ
एक कपड़ा कारखाने में — हफ्तों की मिन्नत के बाद 45,000 रुपये का फोन खरीदा ताकि वह अपना पसंदीदा ऑनलाइन
खेल सुचारू रूप से खेल सके। वह प्रतिदिन छह घंटे खेल में बिताता है, जिसमें से तीन घंटे बातचीत — टेक्स्ट, चैट,
इंस्टाग्राम शेयरिंग और डिस्कॉर्ड सर्वर — में चले जाते हैं। यह कहानी किसी एक परिवार की नहीं है। यह 2026 के भारत
की सामूहिक कहानी है जहाँ डिजिटल उपकरण बच्चों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। भारत सरकार के आर्थिक
सर्वेक्षण 2025-26 ने डिजिटल लत को देश के सामने एक प्रमुख चुनौती के रूप में चिह्नित किया है — शायद पहली
बार किसी इतने प्रतिष्ठित सरकारी दस्तावेज ने इस समस्या को इतनी गंभीरता से स्वीकार किया है। सर्वेक्षण ने स्पष्ट कहा
कि 15-29 वर्ष के लगभग सभी युवाओं में मोबाइल और इंटरनेट उपयोग लगभग सार्वभौमिक होने के बाद अब पहुँच
बाधा नहीं रही — ध्यान अब व्यवहारगत स्वास्थ्य चिंताओं पर केंद्रित होना चाहिए जैसे डिजिटल लत, सामग्री की
गुणवत्ता, कल्याण प्रभाव और डिजिटल स्वच्छता।
आँकड़े चौंकाने वाले हैं। भारत में इंटरनेट कनेक्शन 2014 में 25.1 करोड़ से बढ़कर 2024 में लगभग 97 करोड़
हो गए। 2024 में 48 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता ऑनलाइन वीडियो देखते थे और 43 प्रतिशत सोशल मीडिया का
उपयोग करते थे। लोकलसर्कल्स द्वारा 302 जिलों के 57,000 से अधिक अभिभावकों पर किए गए सर्वेक्षण के अनुसार,
49 प्रतिशत शहरी भारतीय माता-पिता ने बताया कि उनके 9-17 वर्ष के बच्चे प्रतिदिन 3 घंटे या अधिक सोशल मीडिया,
वीडियो और ऑनलाइन गेमिंग पर बिताते हैं — 22 प्रतिशत ने 6 घंटे से अधिक बताया, 27 प्रतिशत ने 3-6 घंटे, और
केवल 6 प्रतिशत ने एक घंटे तक। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2024 के अनुसार, 14-16 वर्ष के 82.2 प्रतिशत
बच्चे स्मार्टफोन का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन केवल 57 प्रतिशत इसे शिक्षा के लिए उपयोग करते हैं जबकि 76 प्रतिशत
सोशल मीडिया के लिए। भारतीय विद्यालयों के अध्ययनों के अनुसार 11 से 37 प्रतिशत किशोर समस्याग्रस्त सोशल
मीडिया उपयोग के संकेत दिखाते हैं। बाल चिकित्सा दिशानिर्देश दो वर्ष से कम आयु में कोई स्क्रीन उपयोग नहीं, प्रीस्कूल
बच्चों के लिए केवल एक घंटा पर्यवेक्षित उपयोग, और उसके बाद सख्त सीमाओं की अनुशंसा करते हैं — लेकिन अधिकांश
परिवारों में इन दिशानिर्देशों का पालन नगण्य है।
वैश्विक स्तर पर संकट और भी विकराल है। 2026 में दुनिया भर में लगभग 210 करोड़ लोग सोशल मीडिया
की लत से ग्रस्त हैं, जो कुल उपयोगकर्ताओं का लगभग 3.9 प्रतिशत है। भारत में 18.4 प्रतिशत सोशल मीडिया
उपयोगकर्ता लत या उच्च-जोखिम श्रेणी में हैं — हर पाँचवाँ उपयोगकर्ता। अमेरिका में प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार 95
प्रतिशत किशोर सोशल मीडिया उपयोग करते हैं, 90 प्रतिशत यूट्यूब और 63 प्रतिशत टिकटॉक पर हैं। गैलप के अनुसार
किशोर औसतन 5 घंटे प्रतिदिन सोशल मीडिया पर बिताते हैं। जामा साइकियाट्री के अनुसार प्रतिदिन 3 घंटे से अधिक
उपयोग चिंता और अवसाद से जुड़ा है। वेल कॉर्नेल मेडिसिन के अनुसार लत से पीड़ित बच्चों में आत्मघाती विचार 2-3
गुना अधिक होते हैं। फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी के अनुसार टिकटॉक सबसे नशीला प्लेटफॉर्म है। 46 प्रतिशत किशोरियाँ
कहती हैं सोशल मीडिया उनकी शारीरिक छवि के बारे में बुरा महसूस कराता है। 18-22 वर्ष के 40 प्रतिशत युवा
बाध्यकारी उपयोग की रिपोर्ट करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार समस्याग्रस्त सोशल मीडिया व्यवहार 2018 में
7 प्रतिशत से बढ़कर 2022 में 11 प्रतिशत हो गया और यह प्रवृत्ति 2026 में जारी है।

परिवारों पर प्रभाव विनाशकारी है। जिस घर में रात के खाने की मेज पर बातचीत होती थी, वहाँ अब हर
सदस्य अपनी स्क्रीन में डूबा रहता है। सोशल मीडिया ने किशोरों की आत्म-छवि, सामाजिक तुलना और मान्यता की
आवश्यकता को इस तरह बदला है कि पारिवारिक संवाद की जगह डिजिटल अलगाव ने ले ली है। अत्यधिक स्क्रीन
उपयोग खराब नींद, कम एकाग्रता और बिगड़ते शैक्षणिक प्रदर्शन से जुड़ा है — नींद में बाधा एक सार्वभौमिक मध्यस्थ है
क्योंकि रात्रिकालीन स्क्रॉलिंग और नीली रोशनी नींद की अवधि कम करती है। साइबर बुलिइंग भारतीय बच्चों के 3 से 60
प्रतिशत तक को प्रभावित करती है। अमेरिका और यूरोप के दीर्घकालिक अध्ययन द्विदिशात्मक प्रभाव दिखाते हैं — उच्च
अवसाद वाले बच्चे समस्याग्रस्त उपयोग की ओर अधिक आकर्षित होते हैं जो फिर लक्षणों को बिगाड़ता है। विवाहों में
डिजिटल उपकरणों का बढ़ता तनाव, अभिभावकों का खुद सोशल मीडिया में डूबे रहना और फिर बच्चों से संयम की
अपेक्षा — यह विरोधाभास भारतीय परिवारों में गहरा संकट पैदा कर रहा है। एक पीढ़ी पहले तक जो बच्चे गली-मोहल्ले
में खेलकर सामाजिक कौशल सीखते थे, वे अब वर्चुअल दुनिया में रिश्ते बना रहे हैं जहाँ न शारीरिक भाषा है, न
भावनात्मक गहराई।
सरकारें अब कानूनी रास्ते तलाश रही हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया खाते
रखने पर प्रतिबंध लगाया है। भारत में आंध्र प्रदेश ने केंद्र से आयु-आधारित नियमन पर विचार करने का आग्रह किया है,
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार डिजिटल डिटॉक्स दृष्टिकोण पर काम कर रही है। अमेरिका में अप्रैल 2026 तक 2,465 से
अधिक मुकदमे दायर हो चुके हैं। मेटा को 375 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगा — 75,000 उल्लंघनों के लिए। लॉस
एंजिलिस की जूरी ने 60 लाख डॉलर का पुरस्कार दिया जिसमें मेटा 70 प्रतिशत और यूट्यूब 30 प्रतिशत उत्तरदायी
ठहराया गया। टिकटॉक ने कैलिफोर्निया में एक बड़े मुकदमे में गोपनीय समझौता किया। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण ने
सुझाव दिया कि प्लेटफॉर्मों को आयु सत्यापन लागू करने के लिए जिम्मेदार बनाया जाए, बच्चों के लिए बेसिक फोन या
शिक्षा-केंद्रित टैबलेट को बढ़ावा दिया जाए, और आईएसपी स्तर पर पारिवारिक डेटा योजनाएँ लागू की जाएँ। डिजिटल
व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियमों के मसौदे में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सत्यापित अभिभावकीय सहमति का
प्रावधान है जो ईयू जीडीपीआर और अमेरिकी सीओपीपीए के अनुरूप है।
लेकिन कानून अकेले इस सभ्यतागत संकट का समाधान नहीं कर सकता। जब तक प्लेटफॉर्मों का व्यापार मॉडल
उपयोगकर्ताओं को अधिकतम समय तक जकड़े रखने पर आधारित है — लाइक, कमेंट, इनफिनिट स्क्रॉल और
एल्गोरिदमिक सामग्री जो डोपामाइन प्रतिक्रिया उत्तेजित करती है — बच्चों को बचाना कठिन है। शोध बताते हैं कि
डिजिटल डिटॉक्स से चिंता में 16 प्रतिशत, अवसाद में 25 प्रतिशत और अनिद्रा में 14 प्रतिशत कमी हुई। सुरक्षात्मक
कारकों में मजबूत अभिभावक-बाल संवाद, ऑनलाइन गतिविधि की सक्रिय मध्यस्थता और विद्यालय-आधारित डिजिटल
साक्षरता कार्यक्रम शामिल हैं। मेटा नियमित रूप से भारत को सबसे बड़े उपयोगकर्ता आधारों में गिनता है। अस्पताल और
राज्य कार्यक्रम डिजिटल लत क्लिनिक खोल रहे हैं। यह केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं — राष्ट्रीय सुरक्षा चिंता
भी है क्योंकि देश का भविष्य युवा पीढ़ी की गुणवत्ता पर निर्भर है। भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश की बात बार-बार
होती है, लेकिन यह तभी साकार होगा जब युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों। अंततः प्रश्न यह है कि क्या हम
बच्चों को ऐसी तकनीक के हवाले कर देंगे जो उनकी मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक बंधनों को नष्ट कर रही है, या
सामूहिक रूप से एक ऐसा डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र बनाएँगे जो मानवीय गरिमा और बाल सुरक्षा को सर्वोपरि रखे?

Dr Shailesh Shukla

Dr Shailesh Shukla

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन…

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन परियोजना, मझगवाँ, पन्ना (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), एम.ए.(जनसंचार), पीएचडी प्रकाशन : भारत सहित विश्व के अनेक देशों से प्रकाशित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - अस्मिता, राजभाषा भारती,

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