किसका विकास ,किसका विनाश
दुकान… यूँ समझ लीजिए कि भारतीय जुगाड़ का कोई चलता-फिरता लाइव म्यूज़ियम थी। आधी सड़क पर उसका ऐसा कब्ज़ा था, मानो वह केवल दुकान नहीं बल्कि भारतीय मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन हो। बाकी आधी सड़क राहगीरों, साइकिलों, रिक्शों और कभी-कभार नगर पालिका की दयाभरी नज़रों के लिए छोड़ दी गई थी। सड़क किनारे बनी पुरानी नाली पर मोटे लोहे के पाटिये डालकर कच्ची-पक्की दीवारें खड़ी कर दी गई थीं। ऊपर टीन की छत थी, जो गर्मियों में तंदूर और बरसात में ढोलक का काम करती थी। आगे टाट-बोरों और प्लास्टिक की चादरों से अतिरिक्त छाया का ऐसा प्रबंध किया गया था, मानो कोई गरीब आदमी अपने सपनों को धूप और बारिश से बचाने की आख़िरी कोशिश कर रहा हो।
उन्हीं छत्र-छायाओं के नीचे दो लकड़ी की बैंचें, लोहे के पेंट के खाली कनस्तर और मुड़ी-तुड़ी सरकंडे की मूढ़ियाँ पड़ी रहती थीं, जिन पर ज़िंदगी के झंझावातों के थपेड़ों से त्रस्त कुछ जिंदगियाँ रोज़ शाम को सुस्ताने आ बैठती थीं। कोई रिक्शेवाला अपनी टूटी कमर सीधी कर रहा होता, कोई दिहाड़ी मज़दूर दिन भर की थकान उतार रहा होता, तो कोई बेरोज़गार नौजवान अपने भविष्य की राख कुरेदता हुआ वहाँ बैठा मिलता।
दुकान क्या थी… छोटा-मोटा मॉल ही समझ लीजिए।
क्या नहीं मिलता था वहाँ!
पंसारी का सामान, फल, सब्ज़ी, नमकीन, चूरन, चटनी, बिस्कुट, टॉफियाँ, कॉन्फेक्शनरी, जर्दा, तंबाकू, सिगरेट, बीड़ी, दारू की बोतलों के लिए प्लास्टिक के गिलास, मोबाइल की सस्ती एक्सेसरीज़, चार्जर, इयरफोन, बच्चों की टूटी-फूटी खिलौना गाड़ियाँ… हर तबके के ग्राहक को आकर्षित करने का पूरा इंतज़ाम। कुछ ऐसा मान लीजिए जैसे गरीबी ने मार्केटिंग का कोई क्रैश कोर्स कर रखा हो और “ग्राहक देवो भव:” का दर्शन बिना MBA किए ही समझ लिया हो।
दुकान चलाते थे तीन सदस्य—एक माँ और उसके दो बेटे।
विधवा अधेड़ उम्र की माँ शायद अपने छह दशक पूरे कर चुकी थी, लेकिन चेहरे पर अभी भी हार मान लेने वाली बूढ़ी उदासी नहीं आई थी। शरीर ज़रूर झुकने लगा था, मगर आँखों में अब भी बच्चों को किसी तरह स्थापित कर देने की बेचैन जीवटता बची हुई थी। दोनों बेटे अब शादी की उम्र के हो चुके थे। माँ इतनी बूढ़ी भी नहीं हुई थी कि जीवन से किनारा कर ले। अभी भी वह ताउम्र बच्चों को पालते रहने का जज़्बा लिए बड़ी फुर्ती से ग्राहकों को संभालती रहती थी।
दोनों लड़कों में से एक शिफ्ट के हिसाब से दुकान पर बैठता। दोनों किसी निजी स्कूल में पार्ट-टाइम नौकरी भी करते थे। बाकी समय बारी-बारी से दुकान संभालते। दुकान में बैठे मिलते तो हाथ में प्रतियोगी परीक्षाओं की कोई किताब होती—कभी सामान्य ज्ञान, कभी रीजनिंग, कभी रेलवे भर्ती बोर्ड, कभी SSC, कभी राजस्थान पुलिस। बीच-बीच में माँ की दुकानदार में हाथ भी बँटाते रहते। ग्राहक आया नहीं कि किताब नीचे, तराज़ू ऊपर।
माँ ग्राहकों को निपटाती रहती। कभी कोई सब्ज़ी वाले से उलझ रहा है, कभी कोई उधार लिखवा रहा है, कभी कोई बच्चा दो रुपए की टॉफी के लिए पाँच मिनट मोलभाव कर रहा है। और कभी-कभार कोई पुलिस वाला हड़कता हुआ आ जाता। कुछ हफ्ता-बंदी का मामला उससे भी माँ ही निपटा देती। सब कुछ एक स्वचालित प्रक्रिया की तरह होता था। न पुलिस वाले को ज़्यादा कुछ कहना पड़ता, न उस विधवा को। दोनों के बीच वर्षों पुराना मौन समझौता था। पुलिस वाला आता, गुटखा मुँह में दबाता, थोड़ा अकड़कर खड़ा होता, और माँ बिना किसी नाटक के चुपचाप कुछ नोट उसकी हथेली में सरका देती। वह ऐसे चला जाता, जैसे कानून-व्यवस्था की बहुत बड़ी समस्या सुलझाकर आया हो।
इसी दुकान के सहारे उसने दोनों बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया था। पढ़ाया-लिखाया था। दोनों ने किसी तरह डिग्रियाँ भी ले ली थीं। अब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे।
“सरकारी नौकरी लग जाए बस…” — यही उस घर का सामूहिक राष्ट्रीय स्वप्न था। उसके बाद शादी हो जाए, फिर जीवन सफल मान लिया जाए। वही टिपिकल भारतीय मध्यवर्गीय सपना—एक बार बच्चों की नौकरी और शादी हो जाए, फिर माँ-बाप गंगा नहा लें।
वे सवर्ण जाति से आते थे, इसलिए आरक्षण पर गुस्सा करने का नैतिक अधिकार भी उनके पास था और बेरोज़गारी झेलने की मजबूरी भी। शाम को दुकान पर बैठे-बैठे कभी-कभी देश की व्यवस्था पर बहस छिड़ जाती। उनमें से एक लड़का कहता—
“मेहनत हम करें, नौकरी कोई और ले जाए…”
दूसरा किताब बंद करके गहरी साँस लेता और फिर अगले ही पल किसी ग्राहक को पाँच रुपए का चूरन तौलने लगता। क्रांति और रोज़गार के बीच उसकी ज़िंदगी पेंडुलम की तरह झूलती रहती थी।
बाप तो था नहीं उनका।
एक बार पूछने पर पता लगा—बाप दोनों बच्चों को पैदा करके सटक लिया। दारू पीने की ऐसी आदत थी कि जीवन उसके लिए बस बोतल और बिस्तर के बीच का सफ़र बनकर रह गया था। जैसे-तैसे साल-डेढ़ साल खुद को घसीटता रहा। साल भर में दो बच्चे सौगात में दिए और छोटा बच्चा दस दिन का भी नहीं हुआ था कि वह दुनिया से कूच कर गया। पीछे छोड़ गया यह टीन की छत, आधी सड़क पर कब्ज़ा करती दुकान, और एक औरत… जिसे अब रोने की भी फुर्सत नहीं थी।
ऐसी दुकानें शहर में बहुत हैं। यह कोई अनोखी दुकान नहीं थी।
फिर मैं इसका ज़िक्र क्यों कर रहा हूँ?
उसका कारण भी है।
वह मेरे घर से थोड़ा दूर थी, लेकिन मेरे ऑफिस के रास्ते में पड़ती थी। शहर का वह हिस्सा अपेक्षाकृत कम बसा हुआ था। जो बसा हुआ था, उसमें ज़्यादातर पुराने रेलवे कर्मचारी या अंग्रेज़ों के ज़माने की कॉलोनी के लोग रहते थे। शहर के मुख्य बाज़ार से थोड़ा कटा हुआ इलाका। शाम ढलते ही वहाँ एक अजीब-सी उदासी उतर आती थी। सड़क पर पीली रोशनी वाले खंभे जल उठते, दूर कहीं कुत्ते भौंकते, और हवा में धूल, बीड़ी और सीलन की मिली-जुली गंध तैरने लगती।
तो जनाब… मैं वहाँ अक्सर शाम को जाया करता था।
“जाया करता था…”
अब “जाता हूँ” नहीं कह सकता।
कैसे छूटा… वह आगे बताऊँगा।
सच तो यह है कि सिगरेट पीने की मेरी आदत मुझे वहाँ खींच ले जाती थी। शहर में खुलेआम सिगरेट पीना एक डॉक्टर के लिए उतना ही जोखिम भरा काम है, जितना किसी नेता का सच बोल देना। लोगों की डॉक्टर से बड़ी अपेक्षाएँ होती हैं। उन्हें लगता है—
“यार, डॉक्टर कम से कम सिगरेट तो नहीं ही पीता होगा। दारू पीता भी होगा तो घर में… पर सार्वजनिक जगह पर? कभी नहीं!”
मैं भी इस भ्रम को टूटने नहीं देना चाहता था।
इसलिए अँधेरे, सुनसान और कम भीड़ वाले इस कोने में आकर अपनी नैतिकता का पोस्टमार्टम कर लिया करता था। दिन भर मरीजों को सलाह देता—
“स्मोकिंग छोड़ दीजिए… फेफड़े खराब हो जाएँगे…”
और शाम को खुद उसी धुएँ में अपने तनावों को धीरे-धीरे फूँकता रहता।
शाम ढलने के बाद वहाँ चेहरे भी ठीक से पहचाने नहीं जाते थे। और अगर कोई पहचानना भी चाहे तो मैं पहचानने नहीं देता था। उससे पहले ही वहाँ से खिसक जाता। कभी पेशाब करने के बहाने सड़क के दूसरे किनारे बने खाली प्लॉट में चला जाता, कभी मोबाइल कान पर लगाकर ऐसे अभिनय करता जैसे कोई अत्यंत आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श चल रहा हो। वहाँ और भी सुरक्षित महसूस होता था।
वहाँ हमेशा कुछ पियक्कड़ किस्म के लोग बैठे मिलते। कोई प्लास्टिक का गिलास खरीद रहा होता, कोई पानी की बोतल, कोई चखना। दुकान से सब मिल जाता। बदले में उन्हें बैठने की जगह मिल जाती। नाली के किनारे बैठकर वे दुनिया-जहान की राजनीति पर चर्चा करते। देश कैसे चलेगा, सरकार क्या कर रही है, पाकिस्तान को कैसे सबक सिखाना चाहिए, क्रिकेट टीम में किसे होना चाहिए—इन सब राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान वहीं बैठकर निकलता था।
और फिर किसी दिन अगर दारू उन्हें घर तक ले जाने में असमर्थ हो जाती, तो पास की वही नाली उन्हें शरण भी दे देती थी। कई बार कोई अधलेटा पड़ा मिलता, एक चप्पल इधर, दूसरी उधर, और मुँह से लोकतंत्र तथा शराब की मिली-जुली सुगंध निकलती रहती।
अधेड़ औरत दिलेर भी थी। ऐसे बेवड़ों को डील करना उसे अच्छी तरह आता था। कौन सिर्फ़ शोर मचाएगा, कौन उधार माँगेगा, कौन बिना पैसे दिए भागेगा और कौन सच में रोने लगेगा—वह चेहरे देखकर पहचान जाती थी। उसकी ज़िंदगी ने उसे दुकानदार से ज़्यादा मनोवैज्ञानिक बना दिया था।
मैं कभी अकेला जाता, कभी मेरा एक हमराज़ डॉक्टर मित्र मेरे साथ होता—मेरे तमाम बुरे कर्मों का वहाँ सूत्रधार भी और सह-आरोपी भी। वह भी डॉक्टर था, इसलिए उसे भी सिगरेट पीने जैसे दुष्कर्म गुप्त रूप से करने पड़ते थे।
धीरे-धीरे यह रोज़मर्रा की जीवनचर्या का हिस्सा बन गया।
पहचान हो गई थी।
मैं पहुँचता नहीं था कि सिगरेट सामने रख दी जाती। माचिस अपने-आप आगे बढ़ा दी जाती। कुछ दिनों बाद हमें “वीआईपी” महसूस कराने के लिए उन्होंने लाइटर भी रख लिया। उनका बड़ा बेटा कई बार बड़े अदब से खुद लाइटर जलाकर हमारी सिगरेट के अग्रभाग पर आग लगाता और उस क्षण हमें ऐसा महसूस होता, मानो हम किसी देसी संस्करण के मोगैंबो हों—बस फर्क इतना कि साम्राज्य की जगह नाली किनारे की बैंच पर बैठे थे।
औपचारिकता में चाय भी पूछ ली जाती—
“सर, चाय ले आऊँ?”
कई बार हम मना कर देते, कई बार उनके आग्रह को टाल नहीं पाते। मैं भी इस उपकार का बदला उनके छोटे-मोटे रोगों में सलाह देकर, कभी बिना फीस ओपीडी में देख लेने से, कभी किसी टेस्ट में डिस्काउंट दिलवा देने जैसी चिकित्सकीय उदारताओं से चुका देता। भारतीय समाज में रिश्ते केवल पैसे से नहीं चलते—थोड़ा एहसान, थोड़ा लिहाज़, थोड़ा स्वार्थ और थोड़ा अपनापन मिलाकर एक अघोषित सामाजिक UPI बना रहता है।
और सबसे दिलचस्प बात—सिगरेट खत्म होने से पहले ही पिपरमिंट, इलायची, मुखवास जैसी पुड़ियाएँ सामने आ जातीं। यह अत्यंत आवश्यक प्रक्रिया थी। क्योंकि यदि सिगरेट की गंध श्रीमती जी तक पहुँच गई, तो घर में वैचारिक आपातकाल लागू हो सकता था।
हालाँकि यह कोई नई बात नहीं है। लगभग हर पत्नी जन्मजात “गृह-खुफिया एजेंसी” लेकर आती है। कमीज़ पर लिपस्टिक का निशान मिले या बाल का एक तिनका—ऐसी संदिग्ध परिस्थितियाँ हमारे साथ कभी नहीं हुईं, लेकिन हमारे हिस्से सिगरेट की गंध से पत्नी के जासूसी तंत्र को सक्रिय करने का गौरव अवश्य आया।
दुकानदार इन सब बातों का विशेष ध्यान रखता था।
खाता चलता था। हिसाब महीने-दो महीने में होता था। तब तक UPI का प्रचलन नहीं आया था। चिल्लर जेब में रह जाए तो भी घर में शक हो जाता था—
“इतने पैसे कहाँ खर्च किए?”
इसलिए हिसाब इकट्ठा ही करना सुरक्षित रहता था। सिगरेट भी गुप्त, भुगतान भी गुप्त, और अपराधबोध भी गुप्त।
जैसा कि हर घर में होता है, कभी-कभी घर में लड़ाई भी हो जाती। बोलचाल बंद हो जाती। तब तो मैं और निडर होकर वहाँ पहुँच जाता। यहाँ तक कि घोषणा करके निकलता—
“हाँ-हाँ, जा रहा हूँ सिगरेट पीने!”
फिर वहाँ बैठकर श्रीमती जी के फोन का इंतज़ार करता।
उधर से आवाज़ आती—
“आ जाओ… अब कुछ नहीं कहूँगी… बस सिगरेट मत पिया करो…”
और मैं विजयी मुस्कान के साथ आख़िरी कश खींचता। उस क्षण मुझे लगता, मानो वैवाहिक लोकतंत्र में मैंने अविश्वास प्रस्ताव जीत लिया हो।
जीवन ऐसे ही चल रहा था।
लेकिन उस दिन कुछ अलग था।
दुकानदार की माँ—जिन्हें मैं आदतन “अम्मा” कहता था—रोज़ की तरह अपना दुखड़ा तो सुना ही रही थीं। एक विशुद्ध भारतीय माँ का दुखड़ा, जो देश के हर राज्य, हर भाषा और हर जाति में लगभग एक जैसा होता है—
“बस बेटों की नौकरी लग जाए… फिर कोई लड़की मिल जाए… फिर गंगा नहा लूँ…”
हम भी सिगरेट के धुएँ में उनके दुख को उड़ा देते थे। मगर उस दिन उनके चेहरे पर कुछ और था। एक अजीब थकान… जैसे भीतर कोई दीवार गिर चुकी हो। जैसे वर्षों से टिके रहने की जिद अचानक जवाब दे गई हो।
मैंने पूछा—
“क्या हुआ अम्मा?”
“कुछ नहीं साहब…”
उन्होंने निगाहें चुरा लीं।
उसी समय उनका बेटा, जो कॉपी में हमारा हिसाब लिख रहा था, बोला—
“सर… छप्पन रुपये हुए।”
मैं हँस पड़ा—
“अरे! आज इतनी जल्दी हिसाब क्यों बता रहे हो? पाँच दिन पहले ही तो हिसाब किया था। तुमसे भाग थोड़े ही रहा हूँ!”
लड़का थोड़ा सकुचाया। जैसे कोई अभियुक्त अदालत में बयान दे रहा हो।
बोला—
“सर… कैश नहीं है तो कोई बात नहीं… अब तो UPI भी लग गया है…”
मैंने कहा—
“वो सब ठीक है… लेकिन बात क्या है?”
तभी अम्मा बोलीं—
“साहब… कल ये दुकान नहीं रहेगी।”
मैं चौंक गया।
“मतलब? कहीं और शिफ्ट हो रहे हो क्या?”
“नहीं साहब…”
उन्होंने बहुत सपाट स्वर में कहा—
“कल नगर निगम वाले आएँगे। सड़क चौड़ी हो रही है ना… तीन दिन पहले निशान लगा गए थे। बोले सामान हटा लो… दुकान टूटेगी।”
मैं कुछ क्षण उन्हें देखता रह गया।
“लेकिन… तुम लोगों के पास पट्टा नहीं है क्या?”
लड़का ऐसे बोला जैसे किसी कोर्ट में अपराध स्वीकार कर रहा हो—
“पट्टा कहाँ से होगा सर? फुटपाथ पर बनी दुकान है। सब अनधिकृत है। किस मुँह से कोर्ट जाएँ?”
मैं स्तब्ध था।
लेकिन दुकानेँ तो और भी थीं…
“सब टूट रही हैं साहब…” अम्मा बोलीं।
“घर कॉलोनी के अंदर है। बस एक कमरा और छोटी-सी रसोई। वहाँ दुकान कैसे लगाएँ? और ठेला लगाने में शर्म आती है सर…”
उस “शर्म” शब्द में भारतीय निम्न-मध्यवर्ग का पूरा समाजशास्त्र छिपा था। भूख बर्दाश्त हो जाती है, लेकिन सामाजिक हैसियत का गिरना नहीं।
क्या वह सिर्फ़ एक अवैध दुकान थी?
वही दुकान जिसने बीस साल तक एक परिवार का पेट भरा…एक विधवा औरत को सहारा दिया…
दो बच्चों को बड़ा किया…उन्हें डिग्रियाँ दिलवाईं…
उस औरत का पति शराब पी-पीकर बहुत पहले मर गया था। दो छोटे बच्चों को छोड़कर। और अब जब बच्चे जवान हुए, तब उनकी दुनिया उजड़ने वाली थी।
सरकार शायद सही थी।सड़क चौड़ी होनी चाहिए।अतिक्रमण हटना चाहिए। विकास होना चाहिए।
शहर सुंदर दिखना चाहिए।
लेकिन मेरे भीतर कोई दूसरा आदमी लगातार पूछ रहा था—
“अगर सरकार लोगों को जीने का वैध साधन नहीं दे सकती, तो क्या उन्हें उजाड़ने का नैतिक अधिकार है?”
बड़े-बड़े उद्योगपति हजारों करोड़ लेकर विदेश भाग जाते हैं। अनधिकृत गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो जाती हैं।
वहाँ कानून को मोतियाबिंद हो जाता है। लेकिन यहाँ…
एक गरीब की टीन की छत को बुलडोज़र बहुत साफ़ देख लेता है। मैं उस दिन भारी मन से वहाँ से लौटा।
ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरे भीतर भी कुछ तोड़ दिया हो।
मैंने जेब टटोली। कोई पाँच सौ रुपये पड़े थे। एक क्षण को लगा—दे दूँ? लेकिन अगले ही क्षण समझ गया, यह मदद कम और उनकी गरीबी का अपमान ज़्यादा लगेगा। वे दया नहीं, बस जीने की जगह चाहते थे।
मैं उनकी कोई मदद भी नहीं कर सकता था।
न कोई पहुँच…न कोई राजनीतिक पहचान…न कोई उपाय…
बस भीतर एक अपराधबोध था।
क्या मेरे लिखने से कुछ बदल सकता था? कदापि नहीं।
लेखन केवल इतना कर सकता है कि बरबादियों के बाद बची हुई पीड़ा को समाज के सामने रख दे। जैसे कोई आदमी मलबे के पास खड़ा होकर बस यह गवाही दे सके कि यहाँ कभी एक घर हुआ करता था।
काश…
लेखन किसी सरकारी फ़रमान की काट होता…काश शब्द बुलडोज़र के सामने दीवार बन सकते…
काश व्यंग्य किसी गरीब की टीन की छत बचा पाता…
दो दिन बाद फिर सिगरेट की तलब हुई।
शायद निकोटिन से ज़्यादा मुझे आदत वहाँ खींच रही थी। शायद मन के किसी कोने में यह उम्मीद भी थी कि कोई चमत्कार हो गया होगा। शायद स्टे आ गया हो… शायद किसी नेता ने फोन कर दिया हो… शायद नगर निगम वालों को दया आ गई हो… शायद दुकान बच गई हो…
भारतीय आदमी अंतिम क्षण तक चमत्कारों पर विश्वास करता है। उसे लगता है—कहीं न कहीं कोई “जुगाड़” निकल ही आएगा। कानून बाद में आता है, उम्मीद पहले।
लेकिन वहाँ पहुँचकर जो देखा, उसने भीतर कुछ और तोड़ दिया।
पूरा इलाका उजड़ चुका था।
टूटी हुई टीनें… बिखरे तख्त… फटे टाट… मुड़े हुए लोहे के एंगल… चकनाचूर काँच की शीशियाँ… नमकीन के खाली पैकेट… मिट्टी और धूल में सनी टूटी प्लास्टिक की बाल्टियाँ… सब सड़क किनारे ऐसे बिखरे पड़े थे जैसे किसी गरीब की पूरी जिंदगी को उठाकर जेसीबी के फावड़े से उलट दिया गया हो।
जहाँ कभी वह दुकान खड़ी रहती थी, वहाँ अब सिर्फ धूल उड़ रही थी।
वही जगह जहाँ शाम को बहसें होती थीं…
जहाँ चाय की भाप उठती थी…
जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें खुलती थीं…
जहाँ पिपरमिंट की पुड़िया सिगरेट के अपराधबोध पर पर्दा डालती थी…
वहाँ अब मलबा था।
बुलडोज़र अब भी चल रहे थे।
और अजीब बात यह थी कि वे मुझे सिर्फ मशीनें नहीं लग रहे थे। उनके भीतर एक उन्माद था। जैसे विध्वंस में भी सत्ता को कोई विचित्र आनंद मिलता हो। उनका लोहे का पंजा जब किसी टीन की छत पर गिरता होगा , तो क्या आवाज किसी धातु के रगड़ने की ही आएगी l नहीं..! जैसे किसी की बरसों की जद्दोजहद चरमराकर बिखर रही हो।
मुझे लग रहा था जैसे किसी चिड़िया का घोंसला मेरी आँखों के सामने रौंदा जा रहा हो।
पास ही कुछ लोग खड़े तमाशा देख रहे थे। कोई वीडियो बना रहा था। कोई कह रहा था—
“अरे भाई, सड़क तो चौड़ी होनी ही चाहिए…”
कोई दूसरा बोलता—
“पहले ही कहा था, अतिक्रमण है…”
मेरे पास उस परिवार का कोई फोन नंबर भी नहीं था। मैं चाहकर भी उन्हें ढूँढ नहीं सकता था। वर्षों तक वहाँ सिगरेट पी, चाय पी, जीवन के छोटे-बड़े दुख साझा किए—लेकिन रिश्ता इतना भी नहीं बना था कि उनके उजड़ने के बाद मैं उन्हें खोज सकूँ।
यह एहसास भीतर कहीं चुभ गया।
हम अक्सर जिन लोगों के बीच रोज़ बैठते हैं, उनके जीवन में वास्तव में होते ही कहाँ हैं?
सिर्फ दूर खड़ा देख सकता था।
और उसी क्षण मुझे अपने ऊपर घृणा हुई।
मैं यहाँ क्यों आया?
क्या मैं भी उन्हीं तमाशबीनों में शामिल हो गया था, जो दूसरों का घर उजड़ता देखकर भीड़ लगा लेते हैं?
क्या मनुष्य के भीतर कहीं न कहीं यह क्रूर जिज्ञासा छिपी रहती है कि—
“चलो देखें, किसी और पर क्या बीत रही है…”
क्या दुःख भी मनोरंजन बन सकता है?
टीवी चैनलों पर बाढ़, दंगे, दुर्घटनाएँ, युद्ध… सब देखकर जो भीतर हल्की-सी सनसनी पैदा होती है, क्या वही सनसनी मुझे यहाँ खींच लाई थी?
मैं खुद से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
बहुत देर तक वहाँ खड़ा रहा।
धूल लगातार उड़ रही थी। जेसीबी की आवाज़ें हवा में लोहे की तरह बज रही थीं। एक टूटी हुई बैंच दूर पड़ी थी—शायद वही, जिस पर बैठकर मैंने न जाने कितनी सिगरेटें पी थीं। पास में पिपरमिंट की कुछ कुचली हुई पुड़ियाएँ भी मिट्टी में दबी दिखाई दे रही थीं। मुझे लगा जैसे वे मेरी ही कोई पुरानी आदतें थीं, जो अब मलबे के नीचे दब गई हों।
और अजीब बात…
सिगरेट पीने की तलब अब कोसों दूर तक नहीं थी।
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