मर्दानी -बड़े साहब के बाद बीबी जी और भी बड़ी निकलीं!

रिटायरमेंट से ऐन पहले बडे़ साहब रिश्वत कांड में पकड़े गए और गिरफ्तार होते ही धरती पर धम से ऐसे बैठे कि फिर कभी नहीं उठे। पुलिस हाॅस्पीटल ले गई पर तब तक बड़े साहब की जीवनी चिड़िया उड़ चुकी थी। भ्रष्टाचार निरोधक पुलिस वालों के हाथ के तोते उड़ गए। अभी तक जो बलवान बने हुए अकड़ दिखा रहे थे, मिमियाने लग गये। नियमानुसार बंगले की तलाशी होनी थी, वह भी अटक गई।

पुलिस पर हत्या तक के आरोप लग गये। बडे़ साहब के ससुराल वालों समेत स्टाफ भी आगे आया । जब तक कोर्ट में नियमानुसार करोड़ रुपए का मुआवजा जमा नहीं होगा, तबतक बड़े साहब के मृत शरीर का पोस्ट मार्टम नही करने देंगे, यही मुख्य मांग थी।
बडे़ साहब का लड़का इंजीनियरिंग पढ़कर तीन साल से घर बैठा था। वह स्वयं अपने आप से भलीभांति परिचित था कि कंपीटिशन की दुनिया में इम्तहान पास कर नौकरी लगना दुनिया में एक और अजूबा घोषणा जैसा होगा। आज उसको भी आशा जगी।

स्व. बडे़ साहब वर्षों से अपने गृह जिले में नौकरी कर रहे थे। लक्ष्मी जी की पूजा आरती व भारी सिफारिश की बदौलत उन्हें बड़ा वाला सरकारी बंगला एलाॅट हो गया था। वर्षों से उसी में निवास होने के कारण उसे अपनी जागीर समझ ली थी। कई सरकारें आईं और गईं पर बड़े साहब के पेट का पानी तक नहीं हिला।

नौकरी के शुरुआती दिनों में नई नवेली पत्नी के साथ उनके दो-तीन बरस कैसे निकल गये, ख्याल ही नही रहा। पत्नी बड़े घर से आईं थी, गहनों का शौक़ था।

“पत्नियों की नज़र में वो पतिदेव निकम्मा कहलाता है जो शाम को ऑफिस से खाली हाथ लौटें।”
इसी गंभीर विषय पर एक दिन बड़े साहब से घर में कहासुनी हो गई, सो बैडरूम में लगे पंखे से साड़ी को बांध लटक पड़ी। ये तो ऊपर वाले के साथ ठेकेदार की इनायत थी सो पंखे समेत छत पर लगा हुक नीचे आ गिरा। गिरते वक्त साड़ी कुछ इस तरह से सिर से लिपटी कि बीबीजी को बचा गई। वस्तुत वह साड़ी पिछले महीने ही पीहर से आई थी। इस बहाने उन्होंने बड़े साहब को रुपये पैसे का पाठ पढ़ा दिया।

बडे़ साहब के लिए वह बंगला बड़ा सौभाग्यशाली निकला। अंग्रेज़ी जमाने के बाद बना था इसलिए पंखे का हुक भी कमजोर लगाया गया था।
पहली बात तो आजकल बंगले बनते ही नही और सरकारी आवास बनते हैं तो फ्लैट कल्चर वाले। आज कौन घर आया और किसके यहां ठेकेदार, सप्लायर्स आते हैं सब ख़बरें बाहर आ जाती है। आवास की फ्लेट व्यवस्था से ऑफिस जीवन की गोपनीयता को दंश लग गया है। अब एकाधिकार नही रहा। बांटकर खाना और बैंकुंठ जाना ही एकमात्र रास्ता बचा है।

बडे़ साहब के बंगले में यह सुविधा भरपूर थी। गोपनीयता को कोई खतरा नहीं था। वैसे बड़े साहब अपने सप्लायर्स से इतने खुले हुए थे कि गोपनीयता की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

जैसे स्मगलिंग के धंधे में ईमानदारी अपना वजन रखती हैं वैसे ही अण्डर टेबल ट्रांजेक्शन में भी सत्यता का बड़ा सहारा होता है। इस मामले में बड़े साहब बहुत स्पष्टवादी थे।
ऑफिस की फुसफुसाहट यहां तक थी कि – बड़े साहब अपना स्वयं का मेडिकल या यात्रा भत्ता बिल भी बिना कमीशन लिए हस्ताक्षर नही करते होंगे। एक हाथ दे और एक हाथ ले, औरों की बात ही कुछ और होती थी।

फील्ड ड्यूटी वालों को कई बार ताना मारते कहते भी थे कि ट्यूर में तुम कौन-सी अपने जेब की दारु और मुर्गा मीट खाते हो, मुझे सब मालूम है। पहली बात तो साईट पर जाते ही नही हो,और जाते हो तो डाक बंगले का इंचार्ज तुम्हारा ख़र्च उठाता है।
टीए डीए को अकेले हड़पा नहीं जा सकता।
इस टेबल का हिस्सा तो देना ही होगा। यही शिष्टाचार है। हिसाब अपने बाप से भी। नियम सबके लिए बराबर है।

लंच टाइम में चाय पीते हुए कई बार उन्हें कहते सुना गया कि आजकल के लौंडे अपने अधिकारों की बात ज्यादा करते हैं और कर्तव्य की कम। अरे-आगे जीवन पड़ा है कमाने खाने के लिए। अभी तो हम बड़े बुजुर्गो का ख्याल रखों, इसी में बरकत होगी। आशीर्वाद से ही यह विशेष धन पचता है।

कई बार लाइट मूड में हो, कहते भी थे- अंग्रेजों के समय भ्रष्टाचार निरोधक विभाग नाम की चिड़िया भी नहीं थी तो भ्रष्टाचार भी नही था। एक्शन रिऐक्सन वाला न्यूटन का नियम यही तो कहता है। समाज विज्ञानी बनकर इस विभाग को ताला लगा दो, यह बीमारी स्वत: ठीक हो जायेगी। बांस से ही तो बांसुरी बनती है। बांस ही नहीं होगा तो बांसुरी की पीऽऽ कैसे बजेगी!

देख लो पुराने रेलवे की बिल्डिंग- पुलिया आदि। मजाल है जो कोई कील भी ठोक सके और अब नये निर्माण देखलो, कील ठोकते ही दीवाल का सारा प्लास्टर धरती पर।
एक बात और थी कि जब भी राजधानी से कोई अफसर -आडिट टीम आती थी उनका सारा खर्च वे स्वयं ओढ़ते थे। उनको गिफ्ट समर्पण के साथ दारु पार्टी के बिना जाने नही देते थे। ऐसे ख़र्च कैसे एडजस्ट करते थे ये विधा उनके साथ ही गोपनीय अध्याय बन नष्ट हो गई। उनके जाने बाद स्टाफ को नये तरीके खोजने व सीखने होंगे।

बर्फ़ की सिल्लियां के मध्य रखा बड़े साहब का शरीर ज्यों ज्यों ठंडा पड़ता गया त्यों-त्यों लोगों में गर्मी बढ़ती गई। विज्ञान के सिद्धांत का पालन करते हुए बात गर्म होकर उपर के अधिकारियों तक पहुंची। जिन अफसरों ने बड़े साहब की पार्टियों का स्वाद चखा था वे सब एकपक्षीय हो गये। पुराने ऋण को उतारने का मौका भी था।

स्व. बडे़ साहब की पत्नी की क्रांतिकारी भूमिका को देखकर आज स्टाफ को ज्ञात होगया कि जैसे हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है यही अपने आफिस में तक में सत्य साबित होगया।

बडे़ साहब के मरते ही वो समझ गई कि यदि आम देशी औरत की तरह रोने धोने में रह गई तो सरकार से कुछ नही मिलेगा। जिसने की शर्म, उसके फ़ूटे करम। अखबार से लेकर सोशल मीडिया पर बड़े साहब के फोटो के साथ रोते धोते, कृत्रिम बेहोशी आदि के फोटो जारी कर दिए।

पीहर वालों से चर्चा कर डिमांड चार्टर तक जारी हो गया। बडे़ साहब के चरित्र हनन एवं जानबूझकर इज्जत खराब करने के एवज में एक करोड़ के मुआवजे के साथ एक शर्त और जोड़ दी गई कि बड़े साहब ने जीवन पर्यन्त सरकार की सेवा की है, उन्होंने अपना मकान तक नही बनाया। इसलिए इस सरकारी आवास को पत्नी के मृत्यु पर्यन्त रहने के लिए आवंटित किया जाय। अन्य परिलाभ के साथ अनुकम्पा नियुक्ति तो नियमानुसार देनी ही होगी।

उधर भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के डिप्टी रात्रि में आकर बीबी जी से एकांत में मिले और उनपर हत्या के आरोप को हटाने का आग्रह किया। उन सबकी नौकरी पर काली छाया मंडराने लगी थी। इस हेतु वजनदार कागज़ों भरे बैग सौपे गए। हत्या का आरोप, वज़न के नीचे दब कर सपाट हो गया।

सरकार सबकुछ कर सकती है पर बदनामी सहन नहीं कर सकती और वह भी बेचारी विधवा द्वारा आरोपित हो। सर्व समाज की सहानुभूति ने अबतक संवेदना उत्पन्न करदी थी।
इधर बड़े साहब का ज्वलनशील नश्वर शरीर ख़राब हो रहा था। सरकार को डर था कि यदि मुर्दा कोटरी के चूहों ने कहीं कुतर दिया तो फिर नये विषय का हंगामा खड़ा हो जायेगा। एवज में कुछ और देना पड़ सकता है।

अतः सरकार के प्रतिनिधि ने पहल करते हुए सारी मांगों को मान हस्ताक्षर युक्त समझौता पत्र दिया व पब्लिक में इसकी घोषणा तक कर दी जिसमें भ्रष्टाचार व हत्या जैसे शब्द ही नहीं थे। आमजन ने सरकार की संवेदनशीलता की भूरि भूरि प्रशंसा भी की।
स्टाफ समेत जानकारों का कहना था कि बीबी जी, बड़े साहब से हर मामले में तगड़ी सिद्ध हुई।

Ram Kumar Joshi

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डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल…

डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल मार्ग, बाड़मेर (राज) rkjoshi1601@gmail.com

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