डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
शोध लेख/विमर्श
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भाषा केवल संचार का औज़ार नहीं, बल्कि मनुष्यता की आत्मा है। संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश और फिर हिंदी तक की यात्रा हमारे सांस्कृतिक विकास की कहानी है। हिंदी आज विश्व की शीर्ष भाषाओं में है, लेकिन उसकी असली ताक़त आत्मविश्वास और समावेश में है—जहाँ वह तमिल, तेलुगु, बांग्ला, उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं के साथ पुल बनाए। टकराव नहीं, संवाद ही हिंदी का भविष्य है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
Important days
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1947 की आज़ादी ने हमें शासन से मुक्त किया, पर मानसिक गुलामी अब भी जारी है। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा, हिंदी बोलना हीनता क्यों माना जाए? हिंदी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है, फिर भी हम अपनी ही मातृभाषा से संकोच करते हैं। सच्ची आज़ादी पार्ट-टू यही है—हीन भावना की जंजीरें तोड़कर, हिंदी को गर्व और आत्मविश्वास के साथ जीवन में अपनाना।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 8, 2025
शोध लेख/विमर्श
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सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण सिर्फ़ खगोल नहीं, बल्कि खगोलीय कॉमेडी भी हैं। सूर्य बॉस की तरह, पृथ्वी मैनेजरनी और चंद्रमा नखरेबाज़ कवि की तरह बर्ताव करता है। इनकी शक्ति, आकार और वजन जब आपस में भिड़ते हैं, तो ग्रहण बनता है मानो आसमान में ब्रह्मांडीय नौटंकी का लाइव शो!
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 1, 2025
Important days
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कभी मुकुट और महल के स्वामी रहे भर्तृहरि, अंततः साधु की लाठी और तप की गहनता में लीन हो गए। उनकी कथा सिखाती है—श्रृंगार मोहक है, नीति स्थिर है और वैराग्य शाश्वत। यही त्रिवेणी है उनका शतक, जो आज भी जीवन के सत्य का दर्पण है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 29, 2025
Art and Craft
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गणेश झांकी में महारास का आयोजन बचपन की रासलीला की याद दिला गया। परंपरागत पदावली और छंदों की जगह आज डीजे और पैरोडी ने ले ली है। सोचिए—यदि रसखान, नंददास, कुम्भनदास और घनानंद के पद फिर मंचित हों, तो कैसा दिव्य वातावरण बनेगा। इन कवियों ने भक्ति, प्रेम, श्रृंगार और विरह के रंगों से रासलीला को अमर और अनंत माधुरी का अनुभव बना दिया है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 2, 2025
शोध लेख/विमर्श
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"राग दरबारी कोई उपन्यास नहीं, भारतीय लोकतंत्र की एक्स-रे प्लेट है। श्रीलाल शुक्ल की यह कृति व्यवस्था के सड़ांधभरे तंत्र पर तीखा व्यंग्य करती है। शिवपालगंज की गलियों से लेकर विश्वविद्यालयों, संस्थानों, और मीडिया तक—हर जगह इस रचना के पात्र जीवित प्रतीत होते हैं। खन्ना मास्टर, वैद्यजी, रामाधीन — ये नाम नहीं, व्यवस्था के प्रतीक हैं। रचना की वन लाइनर्स आज भी उतनी ही प्रासंगिक और तीखी हैं, जितनी 60 वर्ष पूर्व थीं। ‘राग दरबारी’ हर पीढ़ी के लिए नया पाठ है—हँसाने के बहाने सोचने पर मजबूर करता हुआ।"