जय जगन्नाथ – रथ पर सवार प्रभु आए

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 17, 2026 Culture 0

भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा पर आधारित यह मौलिक भक्ति गीत श्रद्धा, समानता और प्रेम का संदेश देता है। पढ़ें रथयात्रा की कथा और सुनें पूरा गीत।

विश्व पृथ्वी दिवस : चेतना का अंतिम निमंत्रण

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 22, 2026 Culture 0

धरती संकेत दे रही है, पर मनुष्य उन्हें अनसुना कर रहा है। विश्व पृथ्वी दिवस क्या केवल उत्सव बनकर रह गया है या यह आत्मपरीक्षण का अवसर है—यह लेख इसी प्रश्न को गहराई से टटोलता है।

राम तत्व: सत्ता से संवेदना तक – एक आंतरिक यात्रा

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 27, 2026 Culture 0

क्या राम केवल एक ऐतिहासिक पात्र हैं या हमारे भीतर की एक चेतना? यह लेख राम को देह से तत्व तक समझने की एक गहन यात्रा है, जो बताता है कि राम किसी धर्म तक सीमित नहीं बल्कि मानवता की सर्वोच्च संवेदनशील अवस्था हैं।

कृत्रिम मेधा और पारिवारिक जीवन : बच्चों के विकास पर प्रभाव

Dr Shailesh Shukla Mar 26, 2026 Culture 0

आज का बच्चा कहानियों से नहीं, एल्गोरिद्म से सीख रहा है। क्या हम सुविधा के नाम पर उसके भावनात्मक विकास से समझौता कर रहे हैं?

गणगौर  : स्मृतियों के आँगन में सजी एक जीवित परंपरा

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 21, 2026 Culture 0

गणगौर केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन की भावनाओं, आशाओं और सौंदर्य का उत्सव है। गाँव की उन गलियों में, जहाँ गीतों के साथ रिश्ते भी गूंजते थे, यह पर्व सचमुच “जीया” जाता था—न कि केवल निभाया जाता था।

घर: ईंट-पत्थरों से आगे, अपनेपन का निवास

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 6, 2026 Culture 1

घर और मकान के अंतर पर आधारित यह विचारात्मक आलेख बताता है कि घर केवल भौतिक संरचना नहीं, बल्कि रिश्तों, स्मृतियों और अपनत्व की गर्माहट से निर्मित एक जीवित अनुभव है। जब तक उसमें अपने और अपनापन न हो, तब तक सबसे आलीशान मकान भी केवल एक खाली ढांचा रह जाता है।

शिव चतुर्दशी : शिव का अर्थ, शिवत्व का रहस्य और हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 13, 2026 Culture 1

शिव केवल देवता नहीं, एक आंतरिक अवस्था हैं। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त के पार जो शुद्ध प्रेम बचता है, वही शिवत्व है। शिव चतुर्दशी पर पढ़ें — शिव के वास्तविक अर्थ, निराकार-साकार स्वरूप और आत्मसाधना पर एक गहन विचार।

दुनिया ने हिंदुओं को किस नज़र से देखा—और यह नज़र किसने गढ़ी?

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 29, 2026 Art and Craft 0

भारत का उपनिवेशीकरण केवल तलवार और सत्ता का परिणाम नहीं था। उससे पहले और उससे कहीं गहराई तक, यह काम विचारों, इतिहास-लेखन और शिक्षा-नीति के माध्यम से किया जा चुका था। हिंदुओं को दुनिया किस दृष्टि से देखेगी, जाति और ब्राह्मणों को कैसे समझा जाएगा—इन सबकी रूपरेखा युद्धभूमि में नहीं, बल्कि बंद कमरों में तैयार की गई। यह लेख उसी बौद्धिक उपनिवेशवाद की पड़ताल करता है, जहाँ भारतीय समाज को पिछड़ा, जड़ और सुधार-योग्य सिद्ध करना एक औपनिवेशिक आवश्यकता बन गया। जाति व्यवस्था को स्थिर और ब्राह्मणों को स्थायी खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आज भी हमारे सामाजिक विमर्शों में प्रतिध्वनित होती है। लेख का उद्देश्य आरोप नहीं, बल्कि उस दृष्टि को पहचानना है, जो हमें सदियों से दी जाती रही है।