डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 15, 2025
हिंदी कविता
2
एक धनाढ्य व्यक्ति, जिसने माँ के लिए महल जैसा घर बनाया था, आज बेसुध विलाप कर रहा है। माँ की हल्की करवट पर जाग जाने वाली वही माँ, महल की ऊँची दीवारों में पुकारते-पुकारते खो गई। उसकी पीड़ा यही थी—“काश ये दीवारें बोल उठतीं।” यह कहानी महज़ शोक नहीं, आधुनिक सुविधाओं में खोई मानवीय संवेदनाओं और मौन की त्रासदी का सजीव प्रतीक है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
शोध लेख/विमर्श
0
हिंदी का भविष्य केवल भावनाओं से तय नहीं होगा, बल्कि छह खानों में इसकी ताक़त और चुनौतियाँ दिखती हैं—संस्कृति, व्यापार, न्याय, शिक्षा, मीडिया और सद्भाव। बोलचाल और मनोरंजन में हिंदी मज़बूत है, पर न्याय-व्यवस्था और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व चुनौती बना हुआ है। समाधान है मातृभाषा-आधारित शिक्षा, द्विभाषिक पुल, देवनागरी-प्रथम मानक और अंतरभाषिक सम्मान। हिंदी तभी लोकतांत्रिक धड़कन बनेगी जब आत्म-सम्मान और समावेशन साथ चलेंगे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
शोध लेख/विमर्श
0
भाषा केवल संचार का औज़ार नहीं, बल्कि मनुष्यता की आत्मा है। संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश और फिर हिंदी तक की यात्रा हमारे सांस्कृतिक विकास की कहानी है। हिंदी आज विश्व की शीर्ष भाषाओं में है, लेकिन उसकी असली ताक़त आत्मविश्वास और समावेश में है—जहाँ वह तमिल, तेलुगु, बांग्ला, उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं के साथ पुल बनाए। टकराव नहीं, संवाद ही हिंदी का भविष्य है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
Important days
0
1947 की आज़ादी ने हमें शासन से मुक्त किया, पर मानसिक गुलामी अब भी जारी है। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा, हिंदी बोलना हीनता क्यों माना जाए? हिंदी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है, फिर भी हम अपनी ही मातृभाषा से संकोच करते हैं। सच्ची आज़ादी पार्ट-टू यही है—हीन भावना की जंजीरें तोड़कर, हिंदी को गर्व और आत्मविश्वास के साथ जीवन में अपनाना।
Mahadev Prashad Premi
Sep 4, 2025
Book Review
3
यह संग्रह महादेव प्रसाद ‘प्रेमी’ की कुण्डलियों का संकलन है, जिसे डॉ. मुकेश असीमित ने संपादित व प्रस्तुत किया है। इसमें प्रत्येक कुण्डली के साथ चित्रात्मक अभिव्यक्ति जोड़ी गई है। यह प्रयास लोकविधा कुण्डलिया को पुनर्जीवित करते हुए पाठकों तक उसकी लय, रस, हास्य और नीति का संपूर्ण अनुभव पहुँचाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 23, 2025
व्यंग रचनाएं
5
“मैं और मेरा मोटापा – एक प्रेमकथा” में तोंद और इंसान का रिश्ता मोहब्बत जैसा दिखाया गया है। पड़ोसी शर्मा जी की खीझ, रिश्तेदारों की चेतावनी, सरकार की घोषणाएँ—सब बेअसर! मोटापा हर वक्त साथ है, जैसे जीवन-संगिनी। चेतावनी बोर्ड उखाड़कर समोसे खाने की जिद और गोल फिगर को भी गौरव मानना—यह व्यंग्य सिर्फ़ शरीर नहीं, पूरे समाज की मानसिकता पर कटाक्ष है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 9, 2025
Poems
1
रक्षा सूत्र का संकल्प सिर्फ परंपरा नहीं, यह भय के अंधेरों में जलती प्रतिज्ञा की मशाल है। नाज़ुक धागे में बंधा विश्वास, समाज की दरारों में फैली दरिंदगियों को राख कर, नए जीवन की नींव रखता है। यह वादा है — ढाल बनने का, साथ खड़े रहने का।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 2, 2025
व्यंग रचनाएं
0
"रेवड़ी की सिसकियां" एक व्यंग्यात्मक संवाद है उस 'जनकल्याणकारी नीति' की आत्मा से, जिसे अब राजनैतिक मुफ्तखोरी की देवी बना दिया गया है। लेख में रेवड़ी देवी स्वयं अपने नाम पर हो रहे राजनैतिक तमाशे से व्यथित हैं — उन्हें ग़रीबों की सहायक बनने के बजाय वोट हथियाने का औज़ार बना दिया गया है। मुफ्त योजनाओं की बाढ़ में मेहनत, करदाता और योग्यता हाशिए पर चले गए हैं। लेख एक गहन कटाक्ष है उस लोकतांत्रिक दिशा पर, जहां वादों की फेहरिस्त में 'काम' नहीं, 'फ्री' है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 2, 2025
शोध लेख/विमर्श
1
"राग दरबारी कोई उपन्यास नहीं, भारतीय लोकतंत्र की एक्स-रे प्लेट है। श्रीलाल शुक्ल की यह कृति व्यवस्था के सड़ांधभरे तंत्र पर तीखा व्यंग्य करती है। शिवपालगंज की गलियों से लेकर विश्वविद्यालयों, संस्थानों, और मीडिया तक—हर जगह इस रचना के पात्र जीवित प्रतीत होते हैं। खन्ना मास्टर, वैद्यजी, रामाधीन — ये नाम नहीं, व्यवस्था के प्रतीक हैं। रचना की वन लाइनर्स आज भी उतनी ही प्रासंगिक और तीखी हैं, जितनी 60 वर्ष पूर्व थीं। ‘राग दरबारी’ हर पीढ़ी के लिए नया पाठ है—हँसाने के बहाने सोचने पर मजबूर करता हुआ।"
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 15, 2025
Book Review
3
डॉ. मुकेश असीमित का व्यंग्य संग्रह ‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ न केवल भाषा की रवानगी दिखाता है, बल्कि विसंगतियों की गहरी पड़ताल भी करता है। समकालीन व्यंग्य की धारा में यह संग्रह एक उम्मीद की रेखा खींचता है।