वक़्त का पहिया घूमे रे | समय और अभिमान पर रेट्रो बॉलीवुड दार्शनिक गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 27, 2026 Culture 0

“वक़्त का पहिया घूमे रे” समय, सत्ता, शोहरत और अभिमान पर आधारित एक रेट्रो बॉलीवुड दार्शनिक गीत है, जिसे डॉ. मुकेश असीमित ने लिखा है और AI Music Platform पर संगीतबद्ध किया गया है।

मेरे अस्तित्व के आकाश का विश्वास हैं पापा-पिता को समर्पित एक भावपूर्ण गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 15, 2026 Music Songs 0

पिता के प्रेम, त्याग, विश्वास और संस्कारों को समर्पित एक भावपूर्ण गीत।इस भावपूर्ण गीत का संगीतमय रूप हमारे YouTube चैनल पर उपलब्ध है।

किसका विकास ,किसका विनाश

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 4, 2026 कहानी 0

सड़क चौड़ी करने की सरकारी मुहिम में एक टीन की छोटी दुकान उजड़ जाती है। उसके साथ बिखर जाते हैं एक विधवा माँ के सपने, दो पढ़े-लिखे बेरोज़गार बेटों की उम्मीदें और वर्षों की मेहनत। यह व्यंग्य विकास के नाम पर होने वाले मानवीय विस्थापन की संवेदनशील पड़ताल है।

संसदीय गलियारों में दिवंगत कवियों का महासम्मेलन-विषय बजट और बसंत

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 29, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बजट आया, बसंत आया, सत्ता ने इसे बहार कहा, विपक्ष ने पतझड़ और आम आदमी ने अपनी खाली थाली देखी। इसी बीच राष्ट्रपति भवन में दिवंगत कवियों का काल्पनिक महासम्मेलन सजता है, जहाँ हर कवि अपने अंदाज़ में बजट का हिसाब पूछता है।

यूएनओ की माफ़िक: ताकतवर के पक्ष में खड़ी पंचायत पर तीखा व्यंग्य

Ram Kumar Joshi Jun 24, 2026 व्यंग रचनाएं 2

गांव का धन्ना सेठ अमरीक सिंह धन, भय और प्रभाव के बल पर पंचायत को अपने पक्ष में कर चुका था। जब उसके अत्याचारों से त्रस्त ऐनाराम न्याय की उम्मीद लेकर पंचों के सामने पहुंचा, तो फैसला भी उसी शक्तिशाली व्यक्ति के हित में सुनाया गया। यह व्यंग्य-कथा बताती है कि निष्पक्षता का मुखौटा पहनी संस्थाएं किस तरह कमजोर से समर्पण और ताकतवर से शांति की अपेक्षा करती हैं।

राम, बाहर तो निकल! | कोचिंग हादसों और सिस्टम की नाकामी पर तीखा व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 23, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बरसात में कोचिंग के तहखाने पानी से भर जाते हैं, गर्मी में बंद इमारतें आग का गोला बन जाती हैं और जर्जर स्कूलों की छतें बच्चों के सिर पर गिरती हैं। दुर्घटना के बाद मुआवजा, बयान और जाँच समिति तैयार मिलते हैं—सिर्फ जवाबदेही नहीं मिलती। इसी संवेदनहीन व्यवस्था पर करारा प्रहार है व्यंग्य रचना—“राम, बाहर तो निकल!”

बात में वज़न होना चाहिए

डॉ मुकेश 'असीमित' May 29, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज के समय में सिर्फ बात करना काफी नहीं है, बात में वज़न भी होना चाहिए। राजनीति से लेकर मीडिया, ज्योतिष, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा जगत तक हर जगह "भारी" शब्द का बोलबाला है। डॉ. मुकेश असीमित का यह व्यंग्य उसी मानसिकता पर चुटीला कटाक्ष है, जहाँ हल्की बातों की कोई कीमत नहीं और हर चीज़ को खबर बनने के लिए भारी होना ज़रूरी है।

टाइम ट्रैवल: ब्रह्मांड की पुरानी फाइल में नई नोटशीट

डॉ मुकेश 'असीमित' May 28, 2026 ललित निबंध 0

टाइम ट्रैवल का सपना हर आदमी ने कभी-न-कभी देखा है—काश अतीत में जाकर दो-चार गलतियाँ सुधार आते। लेकिन ब्रह्मांड कोई तहसील का बाबू नहीं कि पुरानी फाइल में नई नोटशीट लगाकर मामला निपटा दे।

आम का मौसम : मधुमेही मनुष्य का मीठा महाभारत

डॉ मुकेश 'असीमित' May 27, 2026 ललित निबंध 0

आम कोई आम फल नहीं जी। खासकर हम जैसे डायबिटीज़ के मारे लोगों के लिए आम वैसा है जैसे सामने महबूबा खड़ी हो—महकती, मुस्कराती, रस टपकाती—और हम ग्लूकोमीटर की अदालत में अपराधी की तरह खड़े हों।

मेडिकल कॉन्फ़्रेंस: मेरे संस्मरणों से

डॉ मुकेश 'असीमित' May 18, 2026 संस्मरण 1

मेडिकल कॉन्फ़्रेंस ज्ञान-वृद्धि के लिए होती हैं, ऐसा ब्रोशर कहता है। लेकिन डॉक्टरों, फार्मा स्टॉलों, गिफ्ट बैगों, फूड कोर्ट और फैमिली ज़ोन के बीच ज्ञान बेचारा अक्सर आख़िरी पन्ने पर चिपका हुआ मिलता है। यह संस्मरण उसी अकादमिक मेले का हास्य-व्यंग्यात्मक चित्र है।